
भागलपुर। भागलपुर की लाइफलाइन कहे जाने वाले विक्रमशिला महासेतु के क्षतिग्रस्त होने के बाद अब गंगा के दोनों छोरों के बीच का संपर्क केवल नावों और सरकारी फेरी सेवा के भरोसे रह गया है। लेकिन बरारी घाट पर जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे किसी बड़े हादसे की आहट जैसी हैं। शुक्रवार दोपहर के करीब 2:45 बजे हैं। सूरज सिर पर है और उमस भरी गर्मी के बीच बरारी घाट पर जनसैलाब उमड़ा हुआ है। बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर उतनी भीड़ नहीं दिखती, जितनी आज बरारी घाट की सीढ़ियों पर नजर आ रही है। गंगा के दूसरे किनारे यानी छारण की तरफ से आ रहा सरकारी नि:शुल्क फेरी सेवा वाला जहाज जैसे ही किनारे की ओर बढ़ता है, घाट पर पिछले ढाई-तीन घंटों से इंतजार कर रहे यात्रियों के बीच एक अजीब सी हलचल और अफरा-तफरी मच जाती है। दहियार के रहने वाले किसान हों, सिर पर सब्जियों की टोकरी रखे विक्रेता हों या फिर कॉलेज जाने वाले छात्र—हर कोई बस एक ही जद्दोजहद में है कि कैसे भी करके इस जहाज पर पैर रखने की जगह मिल जाए।
ढाई घंटे का इंतजार और 10 मिनट का तांडव
जहाज जैसे ही घाट के किनारे पर अपना लंगर डालता है, भीड़ किसी बांध के टूटने की तरह उस पर टूट पड़ती है। सुरक्षा के नाम पर वहां आपदा मित्र और पुलिस के जवान तैनात तो हैं, लेकिन इस बेकाबू भीड़ के सामने वे पूरी तरह बेबस नजर आते हैं। हैरानी की बात यह है कि इतनी संवेदनशील स्थिति होने के बावजूद प्रशासन ने वहां कतार (लाइन) लगाने की कोई व्यवस्था नहीं की है। जहाज पर चढ़ने की यह होड़ किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं लगती। सैकड़ों लोग अपने सामान, बोरियों और साइकिलों के साथ एक-दूसरे को धकेलते हुए आगे बढ़ रहे हैं। मात्र 10 मिनट के अंदर वह विशाल जहाज खचाखच भर जाता है। जहाज के इंजन की गूँज और लोगों का शोर वातावरण में एक तनाव पैदा कर देता है। जब जहाज की क्षमता पूरी हो गई और चढ़ने की जगह रत्ती भर भी नहीं बची, तब जाकर सुरक्षाकर्मियों ने बल प्रयोग कर भीड़ को रोका और जहाज को आगे बढ़ाया। जो लोग पीछे छूट गए, उनके चेहरों पर अगली फेरी तक के इंतजार की हताशा साफ देखी जा सकती थी।
सुरक्षा मानकों का सरेआम उल्लंघन: न लाइफ जैकेट, न हिदायत
बरारी घाट पर जो सबसे डरावनी बात नजर आई, वह है सुरक्षा के प्रति घोर लापरवाही। शुक्रवार को इस जहाज पर सैकड़ों लोगों के साथ करीब 100 मोटर साइकिलें भी लाद दी गई थीं। वजन का संतुलन और जहाज की निर्धारित क्षमता का शायद ही किसी को ख्याल था। प्रशासन ने बचाव के जो भी दावे किए हों, लेकिन धरातल पर किसी भी यात्री के पास लाइफ जैकेट नहीं था। न तो जहाज पर लाइफ जैकेट रखे दिखे और न ही किसी यात्री को इन्हें पहनने की हिदायत दी गई। गंगा की गहराई और बहाव को देखते हुए यह एक बड़ी चूक है।
केवल सरकारी जहाज ही नहीं, बल्कि घाट पर लगी 50 से अधिक छोटी-बड़ी निजी नावों का हाल भी यही था। कई महिलाएं अपनी गोद में छोटे बच्चों को लेकर नाव के बिल्कुल किनारे पर बैठी दिखीं। नाविकों को बस सवारियां भरने से मतलब था, उन्हें डूबने के खतरे या सुरक्षा उपकरणों की कोई चिंता नहीं थी। प्रशासनिक कर्मियों की मौजूदगी के बावजूद किसी ने भी इन खतरनाक स्थितियों को टोकने या सुधारने की जहमत नहीं उठाई। अगर बीच मझधार में कोई छोटी सी भी गड़बड़ी होती है, तो यह भीड़ एक बड़ी त्रासदी में तब्दील हो सकती है।
आर्थिक मजबूरी और ‘मुफ्त’ का आकर्षण
घाट पर गंगा पार करने के लिए विकल्पों की कमी नहीं है। सरकारी जहाज के बगल में ही दर्जनों निजी नावें खड़ी हैं, लेकिन वहां भीड़ कम है। इसकी वजह सीधी है—जेब पर पड़ने वाला बोझ। निजी नाव वाले प्रति व्यक्ति 50 रुपये किराया वसूल रहे हैं। दिहाड़ी मजदूर, छोटे सब्जी विक्रेता और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए रोज 100 रुपये (आना-जाना) खर्च करना मुमकिन नहीं है। यही कारण है कि लोग घंटों चिलचिलाती धूप में खड़े होकर सरकारी फेरी सेवा का इंतजार करते हैं।
यात्रियों ने बताया कि शुक्रवार सुबह एक ट्रिप चली, उसके बाद जहाज को दूसरे किनारे पर ले जाकर खड़ा कर दिया गया। घंटों तक कोई हलचल नहीं हुई, जिससे घाट पर भीड़ जमा होती गई। लोगों का तर्क वाजिब है कि अगर प्रशासन पूरे दिन नियमित अंतराल पर जहाज के फेरे लगवाता रहे, तो एक साथ इतनी भीड़ जमा ही नहीं होगी। अफरा-तफरी तभी मचती है जब लोगों को लगता है कि पता नहीं अगला जहाज कब आएगा। आपदा मित्रों ने चढ़ने के दौरान गिरे हुए दो-तीन लोगों को संभाला तो जरूर, लेकिन उनके पास भी भीड़ प्रबंधन की कोई ठोस रणनीति नहीं दिखी।
प्रशासनिक दावे बनाम जमीनी हकीकत
विक्रमशिला सेतु के टूटने के बाद से ही जिला प्रशासन लगातार व्यवस्थाएं बेहतर करने की बात कह रहा है। एसडीओ विकास कुमार का कहना है कि शुरुआत से अब तक जिन चीजों की जरूरत महसूस हुई है, उन्हें उपलब्ध कराया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि जो कमियां दिख रही हैं, उन पर अविलंब सुधार कराया जा रहा है और एक कंट्रोल रूम भी सक्रिय है। लेकिन बरारी घाट पर शुक्रवार को जो दृश्य दिखा, वह इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।
एक तरफ कंट्रोल रूम और आपदा प्रबंधन की टीमें हैं, तो दूसरी तरफ बिना किसी सुरक्षा कवच के गंगा की लहरों पर जिंदगी का जुआ खेलते हजारों लोग। कतार की व्यवस्था न होना, लाइफ जैकेट का नदारद रहना और ओवरलोडिंग पर रोक न लग पाना प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े करता है। यात्रियों की मांग है कि जहाजों की संख्या बढ़ाई जाए और घाट पर बैरिकेडिंग कर कतार प्रणाली लागू की जाए ताकि चढ़ने के दौरान होने वाली धक्का-मुक्की और गिरने की घटनाओं को रोका जा सके। जब तक पुल की मरम्मत नहीं हो जाती, तब तक बरारी घाट ही उत्तर और दक्षिण बिहार के बीच का एकमात्र सेतु बना रहेगा, और इसकी सुरक्षा के प्रति बरती गई कोई भी लापरवाही महंगी पड़ सकती है।


