बेगूसराय का ‘सांपों का गांव’: नागपंचमी पर बलान नदी से निकाले जाते हैं सैकड़ों ज़हरीले सर्प, निभाई जाती है तीन सौ साल पुरानी परंपरा

बेगूसराय, 15 जुलाई 2025।देशभर में नागपंचमी पर जहां लोग सांपों को दूध पिलाकर पूजा करते हैं, वहीं बेगूसराय जिले के मंसूरचक प्रखंड के नवटोल गांव में इस दिन की तस्वीर बिल्कुल अलग होती है। यहाँ सैकड़ों ज़हरीले सांपों को नदी से पकड़कर गले में डाल कर मंदिर तक जुलूस निकाला जाता है, जिसे देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ती है।

बलान नदी से निकलते हैं सांप, मंदिर तक पहुंचते हैं श्रद्धालु

मंगलवार को नागपंचमी के अवसर पर नवटोल गांव में सैकड़ों लोग बलान नदी में कूद पड़े और कुछ ही देर में सैकड़ों सांपों को पकड़कर गले में डाल मंदिर की ओर चल पड़े। डोल की थाप पर झूमते हुए श्रद्धालुओं का यह जुलूस किसी अद्भुत और रोमांचकारी दृश्य से कम नहीं था।

“लोग सांप को देखकर डरते हैं, लेकिन यहां श्रद्धालु उन्हें गले लगाते हैं, जैसे वो उनका साथी हो।”

तीन सौ वर्षों से निभाई जा रही परंपरा

स्थानीय लोगों के अनुसार यह परंपरा करीब तीन सौ साल पुरानी है, जिसकी शुरुआत गांव के रौबी दास ने की थी। वे भगवती मंदिर के बड़े भक्त माने जाते थे। आज भी उनके वंशज और गांव के लोग इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हैं।

ग्रामीण रघुबंश चौधरी बताते हैं कि

“हमारे पूर्वजों की मान्यता रही है कि सभी जीवों में ईश्वर का अंश है। सर्प पूजा सनातन संस्कृति की वह धारा है, जिसमें प्रकृति, जीव और मानव का सह-अस्तित्व दर्शाया जाता है।”

नागपंचमी पर आस्था और अद्भुत दृश्य का संगम

नवटोल गांव को अब लोग ‘सांपों का गांव’ कहने लगे हैं। इस दिन सांपों का मेला जैसा दृश्य होता है। पूजा में शामिल होने वाले ‘भगत’ डोल-नगाड़े पर नाचते-गाते मंदिर पहुंचते हैं। वहां भगवती मंदिर में सांपों की पूजा की जाती है। कोई सांपों को सिर पर रखता है, तो कोई गले में डालकर मंत्रोच्चार करता है।

विज्ञान, आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम

ग्रामीणों का मानना है कि सांप प्राकृतिक मिथेन गैस का अवशोषण करते हैं, इसलिए वे पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि भगवान शिव से लेकर तंत्र-साधकों तक के साथ सर्प की उपस्थिति गहन प्रतीकात्मकता रखती है।


नवटोल गांव की यह अनोखी परंपरा सिर्फ एक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जगत के प्रति सम्मान की अद्भुत मिसाल है। जहां आधुनिकता के युग में परंपराएं फीकी पड़ती जा रही हैं, वहीं यह गांव आज भी अपने मूल संस्कारों को जीवंत रखे हुए है।

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