​सबौर कृषि विश्वविद्यालय: बिहार में सिंदूर की खेती शुरू; किसानों की बढ़ेगी आय

भागलपुर/सबौर। बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में नवाचार और पारंपरिक ज्ञान के संगम से एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। भागलपुर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर ने एक ऐसी फसल की व्यावसायिक खेती की शुरुआत की है, जो अब तक केवल बगीचों या जंगलों तक सीमित थी। यहाँ अब ‘सिंदूर’ (कमला या सिंदूरी का पौधा) की वैज्ञानिक तरीके से खेती शुरू की गई है, जो आने वाले समय में बिहार के किसानों के लिए मुनाफे का एक बड़ा और स्थायी विकल्प बनकर उभर सकता है। वर्तमान में जब किसान पारंपरिक फसलों जैसे धान और गेहूं के अनिश्चित बाजार भाव से जूझ रहे हैं, तब विश्वविद्यालय की यह पहल ‘धरोहर से व्यापार’ के सिद्धांत को धरातल पर उतारने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम मानी जा रही है। 22 अप्रैल 2026 को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, सिंदूर की खेती न केवल धार्मिक और सौंदर्य प्रसाधन के क्षेत्र में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) बाजार में भी अपनी पैठ बनाने के लिए तैयार है।

वैज्ञानिक मार्गदर्शन: सौंदर्य से लेकर स्वाद तक का सफर

​सबौर कृषि विश्वविद्यालय में इस अनूठी खेती का नेतृत्व प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. वी शाजिदा बानू कर रही हैं। उनकी देखरेख में सिंदूर के पौधों की वृद्धि और उनके औषधीय गुणों पर गहन शोध किया जा रहा है। डॉ. वी शाजिदा बानू का मानना है कि सिंदूर के बारे में आम लोगों और यहाँ तक कि किसानों की जानकारी काफी सीमित है। अधिकांश लोग इसे केवल महिलाओं के श्रृंगार या धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसका औद्योगिक महत्व कहीं अधिक व्यापक है।

​वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार, सिंदूर के बीज (जिसे अन्नाटो के नाम से भी जाना जाता है) से प्राप्त होने वाला प्राकृतिक रंग स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। डॉ. वी शाजिदा बानू ने बताया कि वैश्विक बाजार में सिंथेटिक रंगों के प्रति बढ़ती अरुचि के कारण प्राकृतिक रंगों की मांग तेजी से बढ़ी है। सिंदूर का उपयोग मक्खन, पनीर, कन्फेक्शनरी और विभिन्न खाद्य पदार्थों को सुरक्षित और आकर्षक रंग देने में किया जाता है। इसके अलावा, दवाओं के कोटिंग (Capsule Coating) और वस्त्र उद्योग में भी इसका बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। सबौर में शुरू हुई यह खेती इसी ‘मल्टी-परपज’ उपयोग को ध्यान में रखकर की जा रही है ताकि किसानों को एक ही फसल से कई बाजारों तक पहुँच मिल सके।

कुलपति का विजन: ‘धरोहर से व्यापार’ की नई रणनीति

​विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने इस परियोजना को बिहार की कृषि गरिमा से जोड़ते हुए एक बड़ा विजन साझा किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य ‘धरोहर से व्यापार’ (Heritage to Trade) है। बिहार की धरती पर कई ऐसे पौधे और संसाधन मौजूद हैं, जिन्हें हमारे पूर्वज पारंपरिक रूप से उपयोग करते थे, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में वे कहीं पीछे छूट गए। सिंदूर भी ऐसा ही एक पौधा है जो बिहार की जलवायु में आसानी से पनप सकता है।

​डॉ. डी.आर. सिंह के अनुसार, सिंदूर की खेती को बढ़ावा देने के पीछे दोहरा मकसद है—पहला, अपने पारंपरिक संसाधनों और धरोहर को संरक्षित करना और दूसरा, किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना। उनका मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तकनीक को अपनाकर इस प्रकार की गैर-पारंपरिक खेती से जुड़ते हैं, तो उनकी आय में कई गुना वृद्धि संभव है। विश्वविद्यालय का लक्ष्य है कि आने वाले समय में यहाँ से उन्नत बीजों और पौधों का वितरण किया जाए, जिससे बिहार सिंदूर उत्पादन के मामले में देश का एक प्रमुख केंद्र बन सके।

किसानों के लिए मुनाफे का गणित: कम लागत, अधिक लाभ

​कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सिंदूर की खेती बिहार के उन क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो सकती है, जहाँ सिंचाई के साधन कम हैं या जमीन कम उपजाऊ है। सिंदूर का पौधा कठोर प्रकृति का होता है और इसे बहुत अधिक देखभाल या रासायनिक खाद की आवश्यकता नहीं होती।

मुनाफे के प्रमुख कारण:

  • न्यूनतम निवेश: एक बार पौधा लगाने के बाद यह कई वर्षों तक फसल देता है, जिससे बीज और जुताई का बार-बार का खर्च बचता है।
  • बाजार की मांग: कॉस्मेटिक इंडस्ट्री और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स प्राकृतिक सिंदूर के लिए अच्छी कीमत चुकाने को तैयार रहती हैं।
  • पशुओं से सुरक्षा: सिंदूर के पौधों को मवेशी नुकसान नहीं पहुँचाते, जिससे बाड़ लगाने का अतिरिक्त खर्च भी कम हो जाता है।
  • मूल्य संवर्धन (Value Addition): किसान केवल बीज बेचने के बजाय यदि इसका पाउडर या रंग बनाकर बेचें, तो मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है।

​बीएयू सबौर के वैज्ञानिक अब इस दिशा में काम कर रहे हैं कि सिंदूर के पौधों से अधिकतम उपज कैसे प्राप्त की जाए और बीजों से रंग निकालने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए छोटी मशीनें कैसे विकसित की जाएं।

बिहार की कृषि संभावनाओं के नए द्वार

​सबौर विश्वविद्यालय की यह पहल प्रदेश में नई कृषि संभावनाओं के द्वार खोलने वाली है। अब तक बिहार के किसान मखाना, केला और लीची जैसे उत्पादों के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब ‘अन्नाटो’ (सिंदूर) इस सूची में नया नाम होगा। विश्वविद्यालय की इस पहल से उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में सिंदूर की खेती बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में एक लाभकारी विकल्प के रूप में स्थापित होगी।

​विशेष रूप से भागलपुर और आसपास के जिलों में, जहाँ की मिट्टी और जलवायु इस फसल के लिए अनुकूल है, वहां इसका रकबा बढ़ाने की योजना है। डॉ. डी.आर. सिंह और डॉ. वी शाजिदा बानू की यह जोड़ी अब इस प्रोजेक्ट को ‘लैब से लैंड’ (Lab to Land) तक पहुँचाने में जुटी है। किसानों को इस खेती के प्रति जागरूक करने के लिए प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित किए जाएंगे।

वॉयस ऑफ बिहार (VOB) का विश्लेषण: आत्मनिर्भरता की ओर कदम

​बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की यह कोशिश केवल एक फसल उगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम है। भारत अपनी सिंदूर और प्राकृतिक रंगों की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा अब भी अन्य राज्यों या आयातों से पूरा करता है। यदि बिहार के किसान बड़े पैमाने पर इसे अपनाने लगते हैं, तो राज्य न केवल अपनी जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि दूसरे राज्यों और देशों को भी निर्यात करने में सक्षम होगा।

​2026 के इस दौर में, जहाँ ‘ऑर्गेनिक’ और ‘नेचुरल’ शब्द केवल नारे नहीं बल्कि बड़े बाजार बन चुके हैं, सिंदूर की खेती बिहार के किसानों को उस वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बना सकती है। कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह के नेतृत्व में सबौर विश्वविद्यालय का यह ‘हेरिटेज मॉडल’ निश्चित रूप से बिहार के कृषि परिदृश्य को एक नई चमक प्रदान करेगा। आने वाले वर्षों में सिंदूर के लाल रंग से किसानों की तकदीर का रंग भी सुनहरा होने की प्रबल संभावना है।

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