
भागलपुर: बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में युवा शोधार्थियों की वैज्ञानिक सोच, शोध क्षमता और प्रभावी संचार कौशल को नई दिशा देने के उद्देश्य से दो दिवसीय ‘4 मिनट रिसर्च फाइंडिंग्स (4MRF) प्रतियोगिता-2026’ का आयोजन शुरू हुआ। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह के नेतृत्व में आयोजित इस प्रतियोगिता का उद्देश्य स्नातकोत्तर एवं पीएचडी के विद्यार्थियों को अपनी शोध उपलब्धियों और निष्कर्षों को मात्र चार मिनट में सरल, स्पष्ट, वैज्ञानिक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करना है।
विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी) की ओर से आयोजित इस प्रतियोगिता में राज्य के विभिन्न कृषि महाविद्यालयों के शोधार्थी भाग ले रहे हैं। आयोजन का मुख्य उद्देश्य केवल शोध प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि युवा वैज्ञानिकों में वैज्ञानिक संचार कौशल विकसित करना, शोध परिणामों को आम लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की क्षमता बढ़ाना तथा अकादमिक जगत में गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान को प्रोत्साहित करना भी है।
कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय परिसर में दोपहर 12:30 बजे हुआ। उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न संकायों के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा आमंत्रित अतिथि बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक स्वागत के साथ हुई, लेकिन इस बार आयोजन में पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सहभागिता का विशेष संदेश भी देखने को मिला।
अतिथियों का स्वागत पारंपरिक पुष्पगुच्छ के साथ-साथ सूखे फूलों से तैयार हस्तनिर्मित शुभकामना कार्ड भेंट कर किया गया। इन आकर्षक कार्डों को बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा गोद लिए गए कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, सबौर की छात्राओं ने तैयार किया था। इस पहल की सभी अतिथियों ने सराहना की और इसे पर्यावरण संरक्षण तथा छात्राओं की रचनात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देने वाला प्रयास बताया।
आईक्यूएसी के निदेशक डॉ. तीर्थार्थ चट्टोपाध्याय ने स्वागत भाषण में सभी अतिथियों, संकाय सदस्यों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि आज के समय में केवल अच्छा शोध करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध का वास्तविक महत्व तब बढ़ता है जब उसकी जानकारी सरल भाषा में समाज और संबंधित हितधारकों तक पहुंचाई जा सके।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष आयोजित प्रतियोगिता में विश्वविद्यालय के विभिन्न घटक महाविद्यालयों से कुल 55 विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया है। इनमें बिहार कृषि महाविद्यालय, सबौर, नालंदा उद्यान महाविद्यालय, नूरसराय, मंडन भारती कृषि महाविद्यालय, सहरसा, डॉ. कलाम कृषि महाविद्यालय, किशनगंज तथा वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय, डुमरांव के शोधार्थी शामिल हैं। इससे प्रतियोगिता को राज्यस्तरीय स्वरूप मिला है।
प्रतियोगिता में भाग लेने वाले विद्यार्थी कृषि विज्ञान के विभिन्न विषयों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इनमें आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन, आणविक जीवविज्ञान एवं जैव प्रौद्योगिकी, मृदा विज्ञान, सस्य विज्ञान, प्रसार शिक्षा, कृषि अर्थशास्त्र, कृषि सांख्यिकी, कटाई उपरांत प्रबंधन, सब्जी विज्ञान, फल विज्ञान, कीट विज्ञान, पादप रोग विज्ञान तथा पुष्प विज्ञान एवं भूदृश्य निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।
बिहार कृषि महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. रूबी रानी ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी शोध की सफलता केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं होती। यदि शोधार्थी अपने निष्कर्षों को स्पष्ट, संक्षिप्त और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत कर सके, तभी उसका व्यापक प्रभाव समाज और वैज्ञानिक समुदाय पर पड़ता है। उन्होंने विद्यार्थियों से इस मंच का पूरा लाभ उठाने और अपनी प्रस्तुति कौशल को बेहतर बनाने का आग्रह किया।
निदेशक अनुसंधान शिक्षा-सह-अधिष्ठाता, स्नातकोत्तर अध्ययन डॉ. संजय कुमार ने आईक्यूएसी की इस पहल को अत्यंत सराहनीय बताया। उन्होंने कहा कि शोध केवल नई जानकारी प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि उसे समाज के सामने वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा और आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्रतिभागियों को अपने शोध के प्रत्येक पहलू को स्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करने की सलाह दी।
निदेशक अनुसंधान डॉ. ए.के. सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि कृषि अनुसंधान का अंतिम उद्देश्य किसानों और समाज को लाभ पहुंचाना होना चाहिए। उन्होंने शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे अपनी प्रस्तुतियों में केवल वैज्ञानिक तथ्यों तक सीमित न रहें, बल्कि यह भी बताएं कि उनके शोध का व्यावहारिक उपयोग किसानों, कृषि क्षेत्र और समाज के लिए किस प्रकार लाभकारी हो सकता है। उन्होंने नवाचार, उपयोगिता और सामाजिक प्रभाव जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान देने की बात कही।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने कहा कि आधुनिक समय में वैज्ञानिकों के लिए केवल अनुसंधान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शोध के परिणामों को आम लोगों, नीति निर्माताओं और किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि चार मिनट की सीमित अवधि में जटिल वैज्ञानिक विषय को सरल भाषा में प्रस्तुत करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है और यही प्रतियोगिता प्रतिभागियों के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट शोध तभी सार्थक माना जाएगा जब उसके निष्कर्ष किसानों, वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और समाज तक आसानी से पहुंच सकें। इसलिए वैज्ञानिक संचार कौशल विकसित करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। कुलपति ने प्रतिभागियों से वैज्ञानिक नैतिकता, शोध की गुणवत्ता और नवाचार पर विशेष ध्यान देने का भी आह्वान किया।
उद्घाटन सत्र के बाद एमएससी के विद्यार्थियों के लिए तकनीकी सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने अपनी शोध परियोजनाओं और शोध निष्कर्षों को निर्धारित चार मिनट की समय सीमा के भीतर प्रस्तुत करना शुरू किया। प्रत्येक प्रतिभागी ने अपने शोध का उद्देश्य, पद्धति, प्रमुख निष्कर्ष और उसके व्यावहारिक महत्व को संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। निर्णायक मंडल ने प्रस्तुति की स्पष्टता, वैज्ञानिक गुणवत्ता, संचार कौशल, समय प्रबंधन और विषय की उपयोगिता जैसे मानकों के आधार पर मूल्यांकन किया।
विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि इस प्रकार की प्रतियोगिताएं शोधार्थियों के आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने शोध को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए भी तैयार करती हैं। इससे विद्यार्थियों में नवाचार की सोच विकसित होती है और वे शोध को केवल अकादमिक उपलब्धि न मानकर समाज की समस्याओं के समाधान का माध्यम समझने लगते हैं।
दो दिवसीय इस प्रतियोगिता का समापन 10 जुलाई 2026 को होगा। समापन समारोह में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को सम्मानित किया जाएगा। विश्वविद्यालय को उम्मीद है कि यह आयोजन युवा शोधार्थियों को वैज्ञानिक उत्कृष्टता, प्रभावी संचार और नवाचार आधारित कृषि अनुसंधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा तथा बिहार कृषि विश्वविद्यालय को शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


