विश्व बौद्धिक संपदा दिवस पर बीएयू में IPR मंथन, कृषि नवाचार को बाजार और किसानों से जोड़ने पर जोर

भागलपुर (सबौर): विश्व बौद्धिक संपदा दिवस 2026 के अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में कृषि नवाचार को नई दिशा देने के उद्देश्य से एक व्यापक और उच्चस्तरीय विचार-विमर्श सत्र का आयोजन किया गया। निदेशालय अनुसंधान (DoR) में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता निदेशक अनुसंधान डॉ. ए.के. सिंह ने की। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्य, विभागाध्यक्ष, वैज्ञानिक और शोधकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) को कृषि विकास के साथ जोड़ने के विभिन्न पहलुओं पर गहन चर्चा की।

कार्यक्रम की शुरुआत में यह स्पष्ट किया गया कि विश्व बौद्धिक संपदा दिवस केवल कानूनी अधिकारों तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह कृषि अनुसंधान और नवाचार को संरक्षित संपदा में बदलकर उसे आर्थिक मूल्य, प्रतिस्पर्धात्मकता और सतत आजीविका से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस वर्ष के आयोजन का मुख्य फोकस “कृषि अनुसंधान एवं नवाचार में IPR पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाना” रहा, जिसमें वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम में विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) द्वारा निर्धारित वैश्विक थीम “IP and Sports: Ready, Set, Innovate” को भी विशेष रूप से जोड़ा गया। विशेषज्ञों ने खेल और कृषि के बीच समानताओं को रेखांकित करते हुए बताया कि दोनों ही क्षेत्रों में अनुशासन, नवाचार, सटीकता और निरंतर प्रदर्शन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिस तरह खेलों में नई तकनीक और रणनीति प्रदर्शन को बेहतर बनाती है, उसी तरह कृषि में नवाचार उत्पादकता और गुणवत्ता को बढ़ाता है। दोनों क्षेत्रों में IPR इन नवाचारों को सुरक्षा और पहचान प्रदान करता है।

विचार-विमर्श के दौरान बीएयू की बौद्धिक संपदा से जुड़ी उपलब्धियों का भी विस्तृत प्रस्तुतीकरण किया गया। विश्वविद्यालय ने अब तक 23 पेटेंट, 24 कॉपीराइट, एक ट्रेडमार्क और पांच भौगोलिक संकेतक (GI) हासिल किए हैं, जो कृषि क्षेत्र में उसकी बढ़ती नवाचार क्षमता का प्रमाण हैं। इन उपलब्धियों को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि कृषि क्षेत्र में संभावनाओं के विस्तार के रूप में देखा गया।

विशेषज्ञों ने IPR की पूरी प्रक्रिया को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसमें आविष्कार की पहचान और प्रकटीकरण, पूर्व कला (Prior Art) का विश्लेषण, उच्च गुणवत्ता वाले पेटेंट दावों का लेखन, त्वरित परीक्षण प्रक्रिया, लाइसेंसिंग और स्टार्टअप्स के माध्यम से बाजार तक पहुंच जैसे चरण शामिल हैं। इस प्रक्रिया को मजबूत करने से न केवल नवाचारों की सुरक्षा होगी, बल्कि उन्हें व्यावसायिक रूप से उपयोग में लाकर किसानों और उद्यमियों को लाभ पहुंचाया जा सकेगा।

अपने संबोधन में निदेशक अनुसंधान डॉ. ए.के. सिंह ने कहा कि भविष्य का कृषि अनुसंधान IPR आधारित, बाजार उन्मुख और प्रभाव केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि नवाचार केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहे, बल्कि खेतों तक पहुंचे और किसानों की आय में वृद्धि करे। इसके लिए टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल (TRL), उद्योगों के साथ सहयोग और इनक्यूबेशन तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने अपने संदेश में कहा कि कृषि अनुसंधान की वास्तविक शक्ति तब सामने आती है, जब नवाचार को स्वामित्व, मूल्य और प्रभाव में परिवर्तित किया जाता है। उन्होंने कहा कि एक मजबूत IPR पारिस्थितिकी तंत्र न केवल नवाचारों की सुरक्षा करेगा, बल्कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देगा, कृषि आधारित स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करेगा और किसानों तक आर्थिक लाभ सुनिश्चित करेगा।

कार्यक्रम के दौरान यह भी चर्चा हुई कि IPR को कृषि मूल्य श्रृंखला के साथ जोड़ना अत्यंत आवश्यक है। विशेष रूप से GI आधारित उत्पादों की ब्रांडिंग और बाजार उन्मुख अनुसंधान पर बल दिया गया, ताकि स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

प्रतिभागियों ने इस बात पर भी जोर दिया कि IPR के लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचने चाहिए, खासकर छोटे और सीमांत किसानों तक। इसके लिए समावेशी नीति और सामाजिक उत्तरदायित्व को ध्यान में रखते हुए नवाचारों को लागू करना जरूरी है। कृषि क्षेत्र में तकनीकी विकास तभी सफल माना जाएगा, जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. मंकेश कुमार ने कुशलतापूर्वक किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चंदा कुशवाहा ने प्रस्तुत किया। पूरे आयोजन के दौरान वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के बीच सक्रिय संवाद देखने को मिला, जिसने इसे एक सार्थक और प्रभावी मंच बना दिया।

कार्यक्रम के समापन पर यह संकल्प लिया गया कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय को IPR संचालित कृषि नवाचार का अग्रणी केंद्र बनाया जाएगा। विश्वविद्यालय न केवल नवाचारों को संरक्षित करेगा, बल्कि उन्हें व्यावसायिक रूप से विकसित कर किसानों की समृद्धि और कृषि क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

इस आयोजन ने स्पष्ट कर दिया कि आने वाले समय में कृषि और बौद्धिक संपदा का संबंध और मजबूत होगा। IPR के माध्यम से न केवल वैज्ञानिकों को उनके कार्य का उचित सम्मान मिलेगा, बल्कि किसानों को भी इसका सीधा लाभ प्राप्त होगा, जिससे कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति का मार्ग प्रशस्त होगा।

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