आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर अश्विनी कुमार चौबे की तीन बड़ी मांगें, दिल्ली विधानसभा के समक्ष उपवास आंदोलन का ऐलान

नई दिल्ली: भारत में लगाए गए आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर लोकतंत्र सेनानी संघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोगों के सम्मान और आपातकाल के इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की मांग को लेकर बड़ा अभियान शुरू किया है। लोकतंत्र सेनानी संघ के संरक्षक और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के समक्ष तीन प्रमुख राष्ट्रीय मांगें रखी हैं। साथ ही उन्होंने घोषणा की है कि 5 जून 2026 को दिल्ली विधानसभा के समक्ष एक दिवसीय सांकेतिक उपवास आंदोलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें देशभर से लोकतंत्र सेनानी और आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले लोग भाग लेंगे।

दिल्ली में आयोजित एक संवाद कार्यक्रम के दौरान अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि वर्ष 1975 में लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि उस दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए, राजनीतिक विरोधियों को जेलों में बंद किया गया और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव की स्थिति बनी। ऐसे समय में हजारों लोगों ने लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष किया, लेकिन आज भी उनके योगदान को वह सम्मान नहीं मिल पाया है जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा 25 जून को “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मान्यता देना एक महत्वपूर्ण और स्वागतयोग्य कदम है। हालांकि उनका मानना है कि केवल प्रतीकात्मक घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सेनानियों के सम्मान, उनके योगदान के दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी को इतिहास से परिचित कराने के लिए व्यापक और ठोस पहल की आवश्यकता है।

लोकतंत्र सेनानी संघ की पहली प्रमुख मांग शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी हुई है। संघ चाहता है कि वर्ष 1975 से 1977 के बीच लागू आपातकाल के इतिहास को देशभर के स्कूल पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। इसके लिए सीबीएसई, आईसीएसई, एनसीईआरटी, एससीईआरटी और विभिन्न राज्यों के शिक्षा बोर्डों के कक्षा 8 से 12 तक के पाठ्यक्रम में एक विस्तृत अध्याय जोड़े जाने की मांग की गई है। संघ का मानना है कि वर्तमान पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए किस प्रकार संघर्ष किया गया था और संविधान की मूल भावना को बनाए रखने के लिए किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।

चौबे ने कहा कि इतिहास का अध्ययन केवल अतीत को जानने के लिए नहीं बल्कि भविष्य को बेहतर बनाने के लिए भी आवश्यक होता है। यदि युवाओं को आपातकाल के दौरान हुई घटनाओं की जानकारी होगी तो वे लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक संस्थाओं के महत्व को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि आने वाली पीढ़ियां इतिहास से सीख लें और स्वतंत्रता तथा अधिकारों की रक्षा के प्रति सजग रहें।

दूसरी मांग के तहत लोकतंत्र सेनानी संघ ने आपातकाल से जुड़ी घटनाओं की व्यापक जांच की मांग की है। संघ का कहना है कि इस उद्देश्य के लिए एक उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग का गठन किया जाना चाहिए। आयोग यह जांच करे कि आपातकाल लागू करने, मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) जैसे कानूनों के तहत गिरफ्तारियां कराने, प्रेस पर सेंसरशिप लागू करने तथा विभिन्न संस्थाओं पर दबाव बनाने में किन-किन व्यक्तियों और अधिकारियों की क्या भूमिका रही थी।

संघ का मानना है कि आपातकाल के दौरान हुई घटनाओं का निष्पक्ष और व्यापक अध्ययन होना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने आई चुनौतियों का दस्तावेजीकरण हो सके। इससे भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने में भी मदद मिलेगी। चौबे ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि मजबूत संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की रक्षा से भी संचालित होता है।

तीसरी मांग लोकतंत्र सेनानियों के सम्मान और कल्याण से संबंधित है। लोकतंत्र सेनानी संघ ने दिल्ली में रहने वाले आपातकाल पीड़ितों और लोकतंत्र सेनानियों को सम्मान निधि तथा आधिकारिक मान्यता प्रदान करने की मांग उठाई है। चौबे ने कहा कि देश के कई राज्यों में लोकतंत्र सेनानियों को सम्मान राशि, चिकित्सा सुविधाएं और अन्य सहायता प्रदान की जा रही हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अभी तक ऐसी कोई प्रभावी व्यवस्था लागू नहीं हो पाई है।

उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार की ओर से पहले लोकतंत्र सेनानियों के लिए सम्मान निधि देने की घोषणा की गई थी, लेकिन अब तक इसके संबंध में कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं हुआ है। संघ की मांग है कि इस घोषणा को शीघ्र प्रभाव से लागू किया जाए ताकि वर्षों तक लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को सम्मान मिल सके। इसके अलावा पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में भी ऐसी योजनाएं लागू करने की आवश्यकता बताई गई है।

लोकतंत्र सेनानी संघ ने घोषणा की है कि 5 जून को दिल्ली विधानसभा के समक्ष आयोजित सांकेतिक उपवास आंदोलन के दौरान देशभर से आए लोकतंत्र सेनानी अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाएंगे। इस अवसर पर 10 हजार से अधिक हस्ताक्षरों वाला एक ज्ञापन दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री को सौंपा जाएगा। इस ज्ञापन में आपातकाल पीड़ितों, उनके परिवारों तथा दिवंगत लोकतंत्र सेनानियों के परिजनों के हस्ताक्षर शामिल हैं।

संघ का कहना है कि यह केवल किसी एक संगठन का कार्यक्रम नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए चलाया जा रहा राष्ट्रीय जनजागरण अभियान है। इस अभियान का उद्देश्य लोगों को यह याद दिलाना है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए अतीत में अनेक लोगों ने त्याग और संघर्ष किया था। उन योगदानों को सम्मानित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम में लोकतंत्र सेनानी संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी और विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधि शामिल होंगे। संगठन का दावा है कि इस अवसर पर लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की जाएगी तथा भविष्य की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

लोकतंत्र सेनानी संघ ने सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों, पत्रकारों और जागरूक नागरिकों से इस अभियान में सहयोग करने की अपील की है। संगठन का कहना है कि लोकतंत्र की रक्षा किसी एक दल या विचारधारा का विषय नहीं बल्कि पूरे देश की साझा जिम्मेदारी है। आपातकाल के इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में समझना और उससे सबक लेना भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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