बरारी घाट पर जीविका दीदियों की मिसाल: 50 रुपये में भरपेट भोजन, लिट्टी-चोखा से सत्तू तक मिल रहा ‘बिहार का स्वाद’

भागलपुर। गंगा किनारे बसे बरारी घाट की पहचान अब सिर्फ धार्मिक आस्था और गंगा स्नान तक सीमित नहीं रह गई है। यहां अब आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तिकरण और सेवा भावना की एक नई कहानी भी लिखी जा रही है। बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी ‘जीविका’ योजना से जुड़ी महिलाओं ने बरारी घाट पर ऐसी अनूठी पहल शुरू की है, जिसने श्रद्धालुओं, राहगीरों और स्थानीय लोगों का दिल जीत लिया है। घाट पर शुरू की गई सामुदायिक रसोई में बेहद कम कीमत पर स्वादिष्ट, पौष्टिक और स्वच्छ भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।

गंगा किनारे आने वाले लोगों को अब महंगे होटलों या अस्वच्छ ठेलों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा। जीविका दीदियों द्वारा संचालित इस रसोई में मात्र 50 रुपये में भरपेट भोजन मिल रहा है। यही वजह है कि शुरुआत के कुछ ही दिनों में यह रसोई लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बन गई है।

बरारी घाट भागलपुर का एक महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। यहां हर दिन बड़ी संख्या में लोग गंगा स्नान, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पहुंचते हैं। गर्मी के मौसम में भी श्रद्धालुओं की भीड़ बनी रहती है। लेकिन घाट पर आने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या सस्ते और साफ-सुथरे भोजन की रहती थी। बाहर से आने वाले लोगों को अक्सर अधिक पैसे खर्च करने पड़ते थे, जबकि कई बार खाने की गुणवत्ता भी संतोषजनक नहीं होती थी। इसी समस्या को देखते हुए जीविका समूह की महिलाओं ने इस दिशा में कदम बढ़ाया।

‘गंगा जीविका स्वयं सहायता समूह’ की सदस्य लक्ष्मी देवी और उनकी टीम इस रसोई का संचालन कर रही हैं। लक्ष्मी देवी बताती हैं कि उनका उद्देश्य केवल व्यवसाय करना नहीं, बल्कि लोगों की सेवा करना भी है। उन्होंने कहा कि जीविका के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास लगातार किया जा रहा है और यह रसोई उसी दिशा में एक मजबूत पहल है।

उन्होंने बताया कि यहां तैयार होने वाला भोजन पूरी तरह घरेलू तरीके से बनाया जाता है। साफ-सफाई और गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि लोगों को स्वाद के साथ स्वास्थ्य भी मिल सके। रसोई में काम करने वाली महिलाएं सुबह से ही भोजन तैयार करने में जुट जाती हैं और हर सामग्री को ताजा रखा जाता है।

इस रसोई की सबसे बड़ी खासियत इसका बेहद किफायती मेनू है। महंगाई के इस दौर में जहां सामान्य होटल में एक थाली के लिए 100 से 150 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं, वहीं यहां सिर्फ 50 रुपये में पूरा भोजन उपलब्ध है। इस थाली में चावल, दाल, मौसमी सब्जी, पापड़ और सलाद शामिल होता है। भोजन की मात्रा भी इतनी होती है कि व्यक्ति भरपेट खाना खा सके।

भोजन के अलावा यहां बिहार के पारंपरिक व्यंजनों का भी विशेष इंतजाम किया गया है। बिहार की पहचान बन चुके लिट्टी-चोखा को यहां बेहद कम दाम में उपलब्ध कराया जा रहा है। मात्र 20 रुपये में दो पीस लिट्टी और स्वादिष्ट चटनी लोगों को दी जा रही है। घाट पर आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इस व्यंजन का खूब आनंद ले रहे हैं।

इसके अलावा चूड़ा फ्राई और घुघनी जैसी स्थानीय लोकप्रिय डिश भी मेनू में शामिल हैं। 30 रुपये प्रति प्लेट की दर से मिलने वाला यह नाश्ता लोगों को खासा पसंद आ रहा है। शाम के समय घाट पर आने वाले लोगों के लिए गरमा-गरम प्याज पकौड़े भी बनाए जा रहे हैं। पांच पीस पकौड़ों की प्लेट की कीमत सिर्फ 25 रुपये रखी गई है।

गर्मी को देखते हुए यहां सत्तू का शरबत भी उपलब्ध कराया जा रहा है। बिहार का पारंपरिक पेय माना जाने वाला सत्तू लोगों के लिए राहत का काम कर रहा है। मात्र 20 रुपये में एक गिलास सत्तू का शरबत उपलब्ध है। इसके अलावा 10 रुपये में चाय भी दी जा रही है। पानी की बोतल, बिस्किट और भुजिया जैसी जरूरत की चीजें भी एमआरपी दर पर उपलब्ध कराई जा रही हैं।

घाट पर लगाए गए मेनू बोर्ड में सभी वस्तुओं की कीमत साफ-साफ लिखी गई है। इससे लोगों को पारदर्शिता का भरोसा मिल रहा है और किसी तरह की अधिक वसूली की शिकायत नहीं हो रही। आमतौर पर धार्मिक स्थलों और घाटों पर खाने-पीने की चीजों के दाम अधिक वसूले जाते हैं, लेकिन जीविका की इस पहल ने लोगों को राहत दी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जीविका दीदियों की यह पहल समाज के लिए प्रेरणादायक है। इससे न केवल लोगों को सस्ता भोजन मिल रहा है, बल्कि महिलाओं को रोजगार और सम्मान भी मिल रहा है। कई लोगों ने कहा कि पहले घाट पर खाने की सुविधा सीमित थी, लेकिन अब परिवार के साथ आने पर भी आसानी से भोजन मिल जाता है।

जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं के लिए यह पहल आत्मनिर्भरता की नई राह खोल रही है। जो महिलाएं कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, वे अब कारोबार संभाल रही हैं, ग्राहकों से संवाद कर रही हैं और आर्थिक रूप से मजबूत बन रही हैं। इससे उनके आत्मविश्वास में भी काफी वृद्धि हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह के मॉडल को अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भी लागू किया जाए तो इससे महिला रोजगार को बढ़ावा मिलेगा और आम लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी। बरारी घाट की यह पहल आने वाले समय में दूसरे जिलों के लिए भी उदाहरण बन सकती है।

स्थानीय प्रशासन ने भी इस पहल की सराहना की है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि जीविका समूह की महिलाएं समाज में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं। घाट पर स्वच्छता और अनुशासन बनाए रखने में भी इन महिलाओं की भूमिका सराहनीय है।

बरारी घाट पर आने वाले श्रद्धालु अब गंगा स्नान के बाद जीविका दीदियों के हाथों का स्वाद चखना नहीं भूलते। घाट पर भोजन की खुशबू, महिलाओं की मेहनत और लोगों की संतुष्टि इस पहल को खास बना रही है।

यह पहल केवल एक रसोई नहीं, बल्कि महिलाओं के संघर्ष, आत्मनिर्भरता और सेवा भावना की मिसाल बन चुकी है। गंगा किनारे शुरू हुई यह छोटी सी कोशिश अब समाज में बड़े बदलाव का संदेश दे रही है कि यदि अवसर और सहयोग मिले, तो महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।

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