
गया: जब पूरी दुनिया FIFA World Cup Final 2026 के रोमांच में डूबी हुई है, उसी समय बिहार का गया जिला भी अपनी एक अनोखी पहचान की वजह से चर्चा में है। बोधगया प्रखंड का मियां बिगहा गांव ऐसा गांव है, जहां फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि करीब 100 साल पुरानी विरासत है। महादलित बस्ती के इस गांव में लगभग हर घर से कोई न कोई फुटबॉल खिलाड़ी निकलता है और बच्चे बचपन से ही गेंद के साथ बड़े होते हैं।
100 साल से जिंदा है फुटबॉल की परंपरा
करीब 200 घरों और लगभग एक हजार की आबादी वाले मियां बिगहा में फुटबॉल पीढ़ी दर पीढ़ी खेला जाता रहा है। गांव के बुजुर्गों से लेकर युवा और अब लड़कियां भी इस खेल को अपनी पहचान मानती हैं। मजदूरी, राजमिस्त्री, मैकेनिक या छोटे-मोटे रोजगार करने वाले ग्रामीण शाम होते ही फुटबॉल मैदान का रुख करते हैं।
हर शाम मैदान में जुटते हैं खिलाड़ी
बोधगया का कालचक्र मैदान गांव के खिलाड़ियों का नियमित अभ्यास स्थल बन चुका है। दिनभर काम करने के बाद युवा घंटों अभ्यास करते हैं। स्थानीय टूर्नामेंट से लेकर जिला, राज्य और झारखंड तक की प्रतियोगिताओं में गांव के खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखा चुके हैं।
क्रिकेट के दौर में भी फुटबॉल का जुनून कायम
देश में क्रिकेट की लोकप्रियता लगातार बढ़ी है, लेकिन मियां बिगहा ने फुटबॉल की अपनी पहचान कभी नहीं छोड़ी। गांव के युवाओं का कहना है कि यहां क्रिकेट खेलने वालों से ज्यादा फुटबॉल खेलने वाले मिल जाएंगे। स्थानीय टूर्नामेंट में खिलाड़ी अर्जेंटीना और पुर्तगाल की जर्सी पहनकर मैदान में उतरते हैं।
“हम बुद्धा क्लब मियां बिगहा की टीम से खेलते हैं। हमारी टीम पटना, जहानाबाद, अरवल और झारखंड तक खेल चुकी है। सरकार का सहयोग मिले तो यहां से राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकल सकते हैं।”
– आनंदी दास, फुटबॉल खिलाड़ी
मेसी और रोनाल्डो हैं गांव के युवाओं की प्रेरणा
FIFA वर्ल्ड कप के दौरान गांव का माहौल पूरी तरह फुटबॉलमय हो जाता है। युवा नियमित रूप से मैच देखते हैं, खिलाड़ियों की रणनीति सीखते हैं और अपने पसंदीदा सितारों की तरह खेलने का सपना देखते हैं। कई घरों में लियोनेल मेसी, क्रिस्टियानो रोनाल्डो और पेले की तस्वीरें लगी हुई हैं।
“हम लोग फीफा वर्ल्ड कप देखकर काफी सीखते हैं। हमारे यहां 100 साल से फुटबॉल खेला जा रहा है। अगर सरकार ध्यान दे तो यहां से बड़े खिलाड़ी निकल सकते हैं।”
– अमर मांझी, ग्रामीण
प्रतिभा है, लेकिन सुविधाओं का अभाव
ग्रामीणों का कहना है कि गांव से कई खिलाड़ी जिला और राज्य स्तर तक पहुंचे, लेकिन उचित प्रशिक्षण, मैदान, कोचिंग और सरकारी सहयोग नहीं मिलने से उनका सफर आगे नहीं बढ़ सका। कई खिलाड़ी दूसरे क्लबों के लिए ‘बोरो प्लेयर’ के रूप में भी खेलते रहे हैं।
अब बेटियां भी संभाल रही हैं फुटबॉल की विरासत
मियां बिगहा में अब लड़कियां भी फुटबॉल मैदान में उतर रही हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यदि उन्हें बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलें तो वे भी राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर गांव का नाम रोशन कर सकती हैं।
“फुटबॉल हमारे गांव की पहचान है। अगर सरकार क्रिकेट की तरह फुटबॉल को भी सुविधाएं दे, तो यहां से अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकल सकते हैं।”
– बंटी कुमार, स्थानीय खिलाड़ी
बड़े सपनों का छोटा गांव
FIFA World Cup 2026 के बीच मियां बिगहा यह साबित करता है कि बड़े खिलाड़ी सिर्फ बड़े शहरों से नहीं निकलते। सीमित संसाधनों के बावजूद इस गांव ने एक सदी से फुटबॉल की परंपरा को जिंदा रखा है। अब गांव के लोगों की सिर्फ एक ही मांग है—प्रतिभा को मंच मिले, ताकि मियां बिगहा का कोई खिलाड़ी एक दिन भारत की जर्सी पहनकर अंतरराष्ट्रीय मैदान पर देश का नाम रोशन कर सके।


