मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब बिहार विधान परिषद के साथ-साथ राज्यसभा के सदस्य भी बन गए हैं। संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक साथ दो सदनों का सदस्य नहीं रह सकता। प्रोहिबिशन ऑफ सिमुल्टेनियस मेंबरशिप रूल्स 1950 के तहत दो सदनों के सदस्य चुने जाने पर 14 दिनों के भीतर किसी एक सदन की सदस्यता छोड़ना अनिवार्य है।
क्या है नियम?
राज्यसभा और विधान परिषद दोनों की सदस्यता पाने पर नीतीश कुमार को 14 दिन के भीतर विधान परिषद से इस्तीफा देना होगा। हालांकि मुख्यमंत्री के पद पर रहने के लिए संविधान में छह महीने का प्रावधान है। यानी बिना किसी सदन के सदस्य रहते हुए भी छह महीने तक वह मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
राजनीतिक विशेषज्ञ अरुण पांडे का कहना है कि नीतीश कुमार और बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन दोनों 16 मार्च को राज्यसभा के लिए चुने गए हैं, इसलिए उन्हें 30 मार्च तक विधान परिषद की सदस्यता छोड़नी होगी।
विशेषज्ञ भोलानाथ कहते हैं कि नीतीश कुमार समाजवादी और नैतिक नेता हैं, इसलिए राज्यसभा में शपथ लेने के बाद विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देने के साथ ही मुख्यमंत्री पद भी जल्द छोड़ सकते हैं।
14 दिन में इस्तीफा देना जरूरी है या नहीं?
कुछ चर्चा यह भी है कि 14 दिन की समय सीमा निर्वाचन के दिन से नहीं, बल्कि गजट में नोटिफिकेशन के दिन से मानी जाती है। इससे पहले 2006 में भी नीतीश कुमार एक समय दो सदनों के सदस्य चुने गए थे और उन्होंने विधान परिषद के सदस्य बनने के 56 दिन बाद लोकसभा की सदस्यता छोड़ी थी।
इस्तीफा कब दे सकते हैं?
कयास लगाए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री समृद्धि यात्रा के बाद, यानी 26 मार्च के बाद, वह विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे सकते हैं। इसके बाद अप्रैल में राज्यसभा की सदस्यता ले ली जाएगी। ऐसे में अप्रैल में बिहार में राजनीतिक बदलाव की संभावना बनी हुई है।


