मुंगेर में अनोखी शवयात्रा बनी चर्चा का विषय, 95 वर्षीय बुजुर्ग महिला को धूमधाम से दी गई अंतिम विदाई

मुंगेर। आमतौर पर शवयात्रा गम, सन्नाटे और आंसुओं से जुड़ी होती है, लेकिन बिहार के मुंगेर में एक शवयात्रा इन सभी परंपरागत धारणाओं को तोड़ती नजर आई। यहां 95 वर्षीय बुजुर्ग महिला की शवयात्रा में मातमी माहौल के बजाय उत्सव जैसा दृश्य देखने को मिला। डीजे की धुन, भोजपुरी गीत, घोड़े और सैकड़ों लोगों की मौजूदगी ने इस अंतिम यात्रा को चर्चा का विषय बना दिया।

धूमधाम से निकली बुधिया देवी की शवयात्रा

मुंगेर नगर निगम क्षेत्र के वार्ड संख्या 43 स्थित हेरुदियारा की रहने वाली 95 वर्षीय बुधिया देवी का गुरुवार शाम निधन हो गया था। इसके बाद शुक्रवार, 2 जनवरी को उनके परिजनों ने धूमधाम से शवयात्रा निकाली। इस अनोखी शवयात्रा में करीब 250 से अधिक लोग शामिल हुए। कोई पैदल चलता नजर आया तो कोई घोड़े और अन्य वाहनों पर सवार दिखा। पूरे रास्ते डीजे बजता रहा और लोग भोजपुरी गीतों पर झूमते नजर आए।

बेटे ने बताया वजह

मृतका के बेटे योगेंद्र यादव ने बताया कि उनकी मां ने लंबा और संतोषजनक जीवन जिया था। उन्होंने कहा कि मां के जाने का दुख जरूर है, लेकिन यह सोचकर शवयात्रा को उत्सव के रूप में मनाया गया कि उन्होंने अपना पूरा जीवन सफलतापूर्वक जी लिया।

उन्होंने कहा,
“हम खुशी से पूरे परिवार के साथ मां की शवयात्रा निकाले। हमारे सामर्थ्य के अनुसार डीजे, घोड़ा और सभी इंतजाम किए गए। करीब 250 लोग शवयात्रा में शामिल हुए।”

बहू और पोते ने भी जताई भावना

मृतका की बहू संहिता देवी ने बताया कि बुधिया देवी के छह बेटे और तीन बेटियां हैं। उनके 12 पोते और छह पोतियां हैं। उन्होंने कहा कि सास ने परिवार को जो दिया, उसी का सम्मान करते हुए खुशी-खुशी उन्हें विदा किया गया।

वहीं, पोते सोनू कुमार ने कहा कि दादी ने पूरे जीवन परिवार को एकजुट रखा और कभी किसी से भेदभाव नहीं किया। यह भव्य शवयात्रा उनकी अंतिम इच्छा और परिवार की ओर से सम्मान का प्रतीक थी।

उन्होंने कहा,
“दादी के जाने का दुख है, लेकिन सभी ने मिलकर उनकी इच्छा पूरी करने का फैसला लिया। इसलिए डीजे, घोड़ा और निर्गुण के साथ धूमधाम से शवयात्रा निकाली गई।”

नए साल के पहले दिन अनोखी विदाई

95 वर्ष की उम्र में नए साल के पहले दिन बुधिया देवी के निधन के बाद जिस तरह से उनकी शवयात्रा निकाली गई, उसने स्थानीय लोगों को हैरान भी किया और सोचने पर मजबूर भी। यह शवयात्रा न सिर्फ परंपराओं से अलग थी, बल्कि जीवन को उत्सव के रूप में देखने की एक अलग सोच को भी दर्शाती है।


 

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