
पटना | 02 मार्च, 2026: बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला उद्यमियों के लिए एक ऐतिहासिक खबर सामने आई है। राज्य सरकार ने ‘बिहार ग्रामीण परिवर्तन परियोजना’ के तीसरे चरण, यानी बीआरटीपी-जीविका-3 को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और विश्व बैंक के सहयोग से चलने वाली यह महत्वाकांक्षी योजना अगले छह वर्षों में बिहार के गाँवों की सूरत बदलने का दम रखती है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य न केवल उत्पादकता बढ़ाना है, बल्कि स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँचाना भी है।
₹3,000 करोड़ का निवेश और विश्व बैंक का साथ
ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव पंकज कुमार द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, इस विशाल परियोजना की कुल लागत 3,000 करोड़ रुपये निर्धारित की गई है। इस निवेश का 70 फीसदी हिस्सा विश्व बैंक वहन करेगा, जबकि 30 फीसदी राशि राज्य सरकार द्वारा दी जाएगी। यह परियोजना वित्तीय वर्ष 2026-27 से प्रभावी होगी और अगले छह वर्षों तक यानी 2031-32 तक इसके तहत विभिन्न विकास कार्य किए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य है कि इसके जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएं।
खेत से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक: एक वृहद विजन
बीआरटीपी-जीविका-3 केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण ‘इकोसिस्टम’ तैयार करने की योजना है। इसके तहत कृषि उत्पादों, पशुधन और गैर-कृषि सेवाओं के लिए एक मजबूत बाजार तैयार किया जाएगा।
- ब्रैंडिंग और मार्केटिंग: जीविका दीदियों के उत्पादों की उचित ब्रैंडिंग की जाएगी ताकि उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान मिल सके।
- डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर: अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य (International Trade) की राह आसान बनाने के लिए डिजिटल और वित्तीय आधारभूत संरचनाओं का विकास किया जाएगा।
- विविध उद्योग: इस योजना के तहत सोलर मार्ट, सामाजिक वानिकी, मत्स्य पालन, डेयरी, कुक्कुट, और मधुमक्खी पालन जैसे व्यवसायों को नई पहचान और तकनीकी सहायता दी जाएगी।
गाँवों में ही बनेगा कोल्ड स्टोरेज और सीड प्लांट
ग्रामीण उद्यमियों की सबसे बड़ी समस्या उत्पादों के रखरखाव और बाजार तक पहुँच की होती है। जीविका-3 के तहत इस समस्या का जमीनी समाधान निकाला गया है। परियोजना के तहत ग्रामीण स्तर पर गोदाम, कोल्ड स्टोरेज, सीड प्लांट और चिलिंग प्लांट स्थापित किए जाएंगे। इसके अलावा, हैचरी और प्रसंस्करण इकाइयों (Processing Units) का विकास किया जाएगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से ये ग्रामीण उद्यमी अब सीधे निजी क्षेत्र के बड़े साझेदारों के साथ मिलकर काम कर सकेंगे, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और मुनाफा सीधे महिलाओं के हाथ में आएगा।
1,000 संकुल संगठनों को स्वावलंबी बनाने का लक्ष्य
परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संकुल स्तरीय संगठनों (CLOs) को आत्मनिर्भर बनाना है। सरकार ने 1,000 संकुल संगठनों को इस तरह विकसित करने की तैयारी की है कि वे अपने दम पर सामाजिक और वित्तीय सेवाएं प्रदान कर सकें। इन संगठनों को होने वाले लाभ के एक हिस्से को वापस सामुदायिक सेवाओं में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे न केवल मोबाइल बैंकिंग और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि ग्रामीण स्तर पर वित्तीय स्थिरता भी आएगी।
छह वर्षों का खर्च विवरण: कब, कितना होगा निवेश?
परियोजना को चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए बजट का आवंटन भी तय कर दिया गया है:
- 2026-27: ₹300 करोड़
- 2027-28: ₹450 करोड़
- 2028-29: ₹600 करोड़
- 2029-30: ₹900 करोड़ (सर्वाधिक निवेश)
- 2030-31: ₹450 करोड़
- 2031-32: ₹300 करोड़
मंत्री का संदेश: “क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत”
ग्रामीण विकास एवं परिवहन मंत्री श्रवण कुमार ने इस मंजूरी को जीविका परिवार के लिए एक मील का पत्थर बताया है। उन्होंने कहा, “बिहार ग्रामीण परिवर्तन परियोजना जीविका समूहों के विकास में एक क्रांतिकारी बदलाव लाएगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे-बड़े उद्योगों को मजबूती मिलेगी और लाखों रोजगार के अवसर बनेंगे। विशेषकर महिला सशक्तिकरण की दिशा में राज्य में यह एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।”
ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।


