मुफ्त इलाज के मंदिर में 40 हजार की ‘बोली’: मायागंज अस्पताल में ऑपरेशन के नाम पर वसूली का खेल, राजद नेता ने खोला मोर्चा

नाथनगर की माला देवी से मांगी गई मोटी रकम, हड़कंप मचने के बाद बदली गई यूनिट; अधीक्षक से दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग

भागलपुर। बिहार के स्वास्थ्य ढांचे की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां गरीब आदमी बीमारी से कम और अस्पताल के सिस्टम से ज्यादा डरता है। भागलपुर का जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (मायागंज), जो पूरे पूर्वी बिहार का ‘लाइफलाइन’ कहा जाता है, एक बार फिर भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के गंभीर आरोपों के घेरे में है। ताजा मामला मानवता को शर्मसार करने वाला है, जहां एक गरीब महिला के ऑपरेशन के नाम पर 40 हजार रुपये की मांग की गई। यह घटना केवल एक अस्पताल की अव्यवस्था नहीं है, बल्कि उस सरकारी दावे की पोल खोलती है जिसमें ‘मुफ्त और सुलभ इलाज’ का दम भरा जाता है। मंगलवार, 7 अप्रैल 2026 को इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब स्थानीय राजनीति और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अस्पताल के गलियारों में पीड़ितों की आवाज बुलंद की।

​मामले की जड़ में नाथनगर विधानसभा क्षेत्र के बैजलपुर पंचायत स्थित कुरपट गांव की रहने वाली माला देवी हैं। माला देवी को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण मायागंज अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों ने बड़ी उम्मीद के साथ उन्हें यहां लाया था कि सरकारी अस्पताल होने के नाते यहां बिना किसी आर्थिक बोझ के इलाज हो जाएगा। लेकिन अस्पताल के भीतर बैठे सफेदपोश सौदागरों ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन की तारीख तय करने और सर्जरी की प्रक्रिया शुरू करने के एवज में उनसे 40 हजार रुपये की मांग की गई।

​गरीबी पर प्रहार: 40 हजार का वह ‘अदृश्य’ बिल

​कुरपट जैसे सुदूर गांव से आने वाले परिवार के लिए 40 हजार रुपये की राशि किसी पहाड़ जैसी चुनौती से कम नहीं है। माला देवी के परिजनों ने बताया कि अस्पताल के कुछ कर्मियों और बिचौलियों ने उन्हें साफ कह दिया कि यदि समय पर ऑपरेशन चाहिए, तो इस रकम का इंतजाम करना होगा। सरकारी अस्पताल में जहां सुई से लेकर दवा और बेड तक मुफ्त होने का प्रावधान है, वहां इतनी बड़ी राशि की मांग ने परिजनों के होश उड़ा दिए। वे दर-दर भटकते रहे, लेकिन सिस्टम की बहरी दीवारों ने उनकी सिसकियां नहीं सुनीं।

​यह कोई पहली बार नहीं है जब मायागंज अस्पताल में इस तरह के आरोप लगे हों। यहां अक्सर ‘दलालों’ का एक ऐसा मकड़जाल सक्रिय रहता है जो अशिक्षित और भोले-भाले ग्रामीणों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। कभी दवा के नाम पर, तो कभी जांच रिपोर्ट जल्दी दिलाने के नाम पर वसूली आम बात हो गई है। लेकिन इस बार सीधे ऑपरेशन के लिए 40 हजार रुपये की मांग ने अस्पताल प्रशासन की साख पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

​राजद नेता का हस्तक्षेप और वार्डों में मचा हड़कंप

​जब इस अवैध वसूली की खबर नाथनगर विधानसभा से राजद के पूर्व प्रत्याशी जेड हसन तक पहुंची, तो उन्होंने इसे गंभीरता से लिया। जेड हसन मंगलवार को खुद जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचे और सीधे उस वार्ड में गए जहां माला देवी और उनके परिजन बेबसी के आंसू बहा रहे थे। उन्होंने मरीज से मुलाकात की और पूरी घटना का क्रमवार ब्यौरा लिया। परिजनों की आंखों में दिखा खौफ और लाचारी इस बात का सबूत थी कि अस्पताल के भीतर कुछ बहुत गलत हो रहा है।

​जेड हसन ने मौके पर ही प्रशासनिक मुस्तैदी दिखाई। उन्होंने तुरंत हड्डी रोग विभाग (ऑर्थोपेडिक्स) के विभागाध्यक्ष से फोन पर बात की और पूरी स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि एक गरीब मरीज से इस तरह की मांग करना न केवल अपराध है, बल्कि यह सरकार की छवि को भी धूमिल कर रहा है। राजद नेता के हस्तक्षेप और मामले के तूल पकड़ने के बाद अस्पताल प्रशासन तुरंत हरकत में आया। आनन-फानन में माला देवी को पुरानी यूनिट से हटाकर दूसरी यूनिट में शिफ्ट किया गया और उनके लिए एक बेहतर बेड की व्यवस्था सुनिश्चित की गई।

​क्या यूनिट बदलने से खत्म हो जाएगा भ्रष्टाचार?

​मरीज को दूसरी यूनिट में शिफ्ट कर देना और बेड उपलब्ध करा देना एक तात्कालिक समाधान तो हो सकता है, लेकिन जेड हसन ने इसे नाकाफी बताया। उन्होंने अस्पताल के अधीक्षक से सीधा संवाद किया और उन कर्मियों की पहचान करने को कहा जिन्होंने 40 हजार रुपये की मांग की थी। जेड हसन ने जिला प्रशासन को भी इस पूरे मामले की जानकारी दी और मांग की कि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

​उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना गरीब का संवैधानिक अधिकार है। यदि डॉक्टर या स्वास्थ्य कर्मी अपनी सेवा के बदले निजी तौर पर पैसे मांग रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर लूट है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आरोपी कर्मियों के खिलाफ केवल खानापूर्ति वाली कार्रवाई की गई, तो राजद इस मुद्दे पर बड़ा आंदोलन छेड़ेगा। जेड हसन का तर्क था कि माला देवी तो खुशकिस्मत थीं कि उनकी बात उन तक पहुंच गई, लेकिन उन हजारों मरीजों का क्या होता होगा जिनकी आवाज अस्पताल की दीवारों के बाहर नहीं निकल पाती?

​मायागंज की पुरानी बीमारी: बिचौलियों का ‘पेरलल सिस्टम’

​मायागंज अस्पताल में अवैध वसूली की जड़ें बहुत गहरी हैं। यहां एक ‘समानांतर तंत्र’ (Parallel System) काम करता है। इसमें निचले स्तर के कुछ कर्मचारी, निजी एंबुलेंस चालक और बाहर की दवा दुकानों के एजेंट शामिल होते हैं। ये लोग उन विभागों को निशाना बनाते हैं जहां सर्जरी की आवश्यकता होती है, जैसे हड्डी रोग विभाग, प्रसूति विभाग या न्यूरो सर्जरी। यहां वेटिंग लिस्ट लंबी दिखाई जाती है और फिर ‘शॉर्टकट’ के नाम पर पैसों का खेल शुरू होता है।

​माला देवी के मामले में भी यही पैटर्न देखने को मिला। उन्हें शायद यह डराया गया होगा कि अगर पैसे नहीं दिए गए, तो ऑपरेशन में महीनों लग सकते हैं। जेड हसन ने अस्पताल प्रबंधन से मांग की है कि पूरे अस्पताल परिसर में सीसीटीवी कैमरों की निगरानी बढ़ाई जाए और एक प्रभावी शिकायत निवारण केंद्र स्थापित किया जाए जहां मरीज बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें।

​मुफ्त इलाज के दावे और जमीनी हकीकत का टकराव

​बिहार सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के जरिए गरीबों को मुफ्त इलाज का भरोसा दिया जाता है। लेकिन माला देवी जैसी घटनाएं यह बताती हैं कि योजनाओं का लाभ लाभार्थी तक पहुंचने से पहले ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। मायागंज अस्पताल भागलपुर प्रमंडल का सबसे बड़ा केंद्र है, यहां बांका, मुंगेर, और गोड्डा (झारखंड) तक के मरीज आते हैं। अगर यहां 40 हजार रुपये की ‘बोली’ लगती है, तो स्वास्थ्य विभाग के लिए यह डूब मरने वाली बात है।

​जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के वरीय अधिकारियों को इस मामले में केवल अधीक्षक की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्हें स्वतंत्र जांच एजेंसियों के माध्यम से यह पता लगाना चाहिए कि क्या अस्पताल के भीतर कोई संगठित गिरोह काम कर रहा है। जेड हसन ने स्पष्ट किया है कि वे इस मामले का पीछा तब तक करेंगे जब तक कि माला देवी का ऑपरेशन पूरी तरह सफल और निशुल्क नहीं हो जाता।

​निष्कर्ष: जवाबदेही तय करने का समय

​7 अप्रैल 2026 की यह घटना भागलपुर के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। मायागंज अस्पताल की व्यवस्था में सुधार के लिए केवल नई मशीनों या नए भवनों की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वहां काम करने वाले लोगों की नैतिकता में सुधार की जरूरत है। माला देवी को न्याय मिलना चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि भविष्य में किसी अन्य ‘माला देवी’ से उसके इलाज की कीमत न मांगी जाए।

​राजद नेता जेड हसन की सक्रियता ने एक बार फिर यह साबित किया है कि जब राजनीतिक नेतृत्व जनता के बीच होता है, तो सुस्त पड़े तंत्र में भी जान आ जाती है। अब गेंद अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के पाले में है। क्या वे उन भ्रष्ट कर्मियों को सलाखों के पीछे भेजेंगे या फिर मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा? ‘द वॉइस ऑफ बिहार’ इस मामले की हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर नजर बनाए रखेगा, क्योंकि स्वास्थ्य सेवा कोई व्यापार नहीं, बल्कि जीवन बचाने का संकल्प है।

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