सरकारी स्कूलों से घटा छात्रों का भरोसा! दो साल में 86 लाख कम हुए नामांकन, UDISE+ रिपोर्ट में बिहार समेत देशभर की तस्वीर

पटना।देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी UDISE+ (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस) 2025-26 रिपोर्ट ने कई अहम संकेत दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो शैक्षणिक वर्षों के दौरान सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि निजी गैर-सहायता प्राप्त विद्यालयों में नामांकन लगातार बढ़ा है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच सरकारी स्कूलों से करीब 86 लाख छात्र कम हुए हैं, जबकि इसी अवधि में निजी स्कूलों में 88 लाख से अधिक नए विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। शिक्षा विशेषज्ञ इस बदलाव को देश की शिक्षा व्यवस्था में तेजी से बदलती प्राथमिकताओं का संकेत मान रहे हैं।

UDISE+ रिपोर्ट देशभर के सरकारी और निजी विद्यालयों से जुड़े नामांकन, शिक्षकों, आधारभूत सुविधाओं, विद्यालयों की संख्या और शैक्षणिक स्थिति का आधिकारिक डेटाबेस मानी जाती है। इसी वजह से इसमें शामिल आंकड़ों को शिक्षा क्षेत्र की नीतियां तय करने के लिए महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार देश में फाउंडेशन स्तर से लेकर माध्यमिक स्तर तक कुल छात्र नामांकन में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2023-24 में जहां कुल नामांकन 24.80 करोड़ था, वहीं 2025-26 में यह घटकर 24.72 करोड़ रह गया। हालांकि कुल नामांकन में कमी अपेक्षाकृत कम है, लेकिन सरकारी और निजी स्कूलों के बीच छात्रों के स्थानांतरण का रुझान काफी स्पष्ट दिखाई देता है।

सरकारी स्कूलों में वर्ष 2023-24 के दौरान लगभग 12.75 करोड़ छात्र नामांकित थे। दो वर्षों के भीतर यह संख्या घटकर लगभग 11.89 करोड़ रह गई। इसका अर्थ है कि करीब 86 लाख विद्यार्थियों ने सरकारी विद्यालयों से दूरी बनाई। दूसरी ओर निजी गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त विद्यालयों में छात्रों की संख्या 9 करोड़ से बढ़कर लगभग 9.89 करोड़ पहुंच गई। यानी दो वर्षों में 88 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने निजी स्कूलों का रुख किया।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अभिभावकों की बदलती सोच, अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की बढ़ती लोकप्रियता, निजी स्कूलों का तेजी से विस्तार, बेहतर बुनियादी सुविधाओं की अपेक्षा और प्रतिस्पर्धी शिक्षा की मांग इस बदलाव के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ अब ग्रामीण इलाकों में भी निजी विद्यालयों की संख्या बढ़ने से अभिभावकों के पास अधिक विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि देश में विद्यालयों की कुल संख्या में मामूली कमी आई है। वर्ष 2023-24 में देशभर में लगभग 14.72 लाख स्कूल थे, जो 2025-26 में घटकर करीब 14.67 लाख रह गए। इसके बावजूद शिक्षकों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पहली बार देश में स्कूल शिक्षकों की संख्या 1 करोड़ 2 लाख 73 हजार से अधिक पहुंच गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाने पर लगातार काम कर रही है।

शिक्षकों की संख्या बढ़ने का सकारात्मक प्रभाव छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) पर भी दिखाई दिया है। पहले जहां औसतन 25 छात्रों पर एक शिक्षक उपलब्ध था, अब यह अनुपात सुधरकर 24 छात्रों पर एक शिक्षक हो गया है। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार बेहतर छात्र-शिक्षक अनुपात से कक्षाओं में व्यक्तिगत मार्गदर्शन की संभावना बढ़ती है और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। देशभर में शून्य नामांकन वाले विद्यालयों की संख्या में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। पहले ऐसे स्कूलों की संख्या लगभग 12,954 थी, जो अब घटकर 5,663 रह गई है। इसी तरह केवल एक शिक्षक के भरोसे चलने वाले विद्यालयों की संख्या भी कम हुई है। पहले ऐसे स्कूलों की संख्या 1.11 लाख थी, जो अब घटकर लगभग 1.01 लाख रह गई है। इससे शिक्षा व्यवस्था में संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की तस्वीर सामने आती है।

स्कूल छोड़ने वाले बच्चों यानी ड्रॉपआउट दर में भी सुधार दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार प्रारंभिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 2.3 प्रतिशत से घटकर 1.8 प्रतिशत रह गई है। वहीं माध्यमिक स्तर पर यह 8.2 प्रतिशत से घटकर 7 प्रतिशत हो गई। शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं, मध्याह्न भोजन, मुफ्त पाठ्यपुस्तक, यूनिफॉर्म और अन्य प्रोत्साहन कार्यक्रमों का सकारात्मक असर इस सुधार के रूप में दिखाई दे रहा है।

छात्र प्रतिधारण यानी रिटेंशन रेट में भी सुधार दर्ज किया गया है। मिडिल स्तर पर यह 82.8 प्रतिशत से बढ़कर 83.7 प्रतिशत पहुंच गया है। वहीं माध्यमिक स्तर पर रिटेंशन 47.2 प्रतिशत से बढ़कर 51.9 प्रतिशत हो गया। विशेषज्ञों का कहना है कि माध्यमिक विद्यालयों की संख्या बढ़ने, परिवहन सुविधाओं में सुधार और छात्रों की स्कूल तक आसान पहुंच ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

रिपोर्ट के अनुसार सेकेंडरी स्तर का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) भी बढ़ा है। यह 68.5 प्रतिशत से बढ़कर 71.7 प्रतिशत हो गया है। इसका अर्थ है कि अब पहले की तुलना में अधिक छात्र उच्च कक्षाओं तक अपनी पढ़ाई जारी रख रहे हैं। इसे शिक्षा क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

यदि बिहार की बात करें तो राज्य अब भी सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या के मामले में देश के सबसे बड़े राज्यों में शामिल है। UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार बिहार के सरकारी स्कूलों में 1 करोड़ 66 लाख 83 हजार 588 से अधिक छात्र नामांकित हैं। हालांकि पिछले वर्षों की तुलना में यहां भी सरकारी विद्यालयों में नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है। दूसरी ओर स्कूलों की संख्या, शिक्षकों की उपलब्धता और शैक्षणिक संसाधनों में सुधार के प्रयास जारी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में निजी विद्यालयों की बढ़ती संख्या, अंग्रेजी माध्यम शिक्षा की मांग, रोजगार आधारित शिक्षा को लेकर अभिभावकों की अपेक्षाएं और शहरों की ओर बढ़ता पलायन सरकारी स्कूलों के नामांकन को प्रभावित कर रहे हैं। इसके अलावा कई परिवार अब बच्चों को शुरुआती स्तर से ही निजी विद्यालयों में पढ़ाना पसंद कर रहे हैं।

ड्रॉपआउट के मामले में भी कुछ राज्यों की स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। पिछले वर्षों के रुझानों के आधार पर बिहार, झारखंड, असम, मेघालय, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है। वहीं केरल, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों ने इस मामले में बेहतर प्रदर्शन किया है और वहां ड्रॉपआउट दर अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई है।

सरकारी विद्यालयों में कुल छात्र नामांकन के आधार पर सबसे कम संख्या वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लक्षद्वीप, लद्दाख, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह, चंडीगढ़ तथा दादरा एवं नगर हवेली-दमन एवं दीव शामिल हैं। वहीं बड़े राज्यों में गोवा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में सरकारी विद्यालयों में नामांकन अपेक्षाकृत कम है। इसके विपरीत बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश आज भी सरकारी स्कूलों में सबसे अधिक छात्रों वाले राज्यों में गिने जाते हैं।

UDISE+ 2025-26 की रिपोर्ट यह स्पष्ट संकेत देती है कि देश की शिक्षा व्यवस्था तेजी से बदल रही है। एक ओर सरकारी स्कूलों में नामांकन घट रहा है, तो दूसरी ओर शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता, छात्र प्रतिधारण और ड्रॉपआउट दर जैसे कई मानकों में सुधार भी देखने को मिल रहा है। आने वाले वर्षों में सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकारी विद्यालयों में अभिभावकों का विश्वास बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने और छात्रों को सरकारी शिक्षा प्रणाली से जोड़कर रखने की होगी।

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