
बिहार में रेलवे अवसंरचना को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी पहल करते हुए भारतीय रेलवे ने मानसी-सहरसा रेलखंड के दोहरीकरण (डबलिंग) परियोजना को मंजूरी दे दी है। इस परियोजना पर कुल ₹499 करोड़ की लागत आएगी और इसके तहत पूर्व मध्य रेलवे के अंतर्गत आने वाले 44.40 किलोमीटर लंबे मानसी-सहरसा सेक्शन को सिंगल लाइन से डबल लाइन में बदला जाएगा। इस फैसले को बिहार के रेल नेटवर्क, यात्री सुविधा और माल परिवहन क्षमता बढ़ाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार यह परियोजना न केवल वर्तमान रेल परिचालन पर सकारात्मक प्रभाव डालेगी, बल्कि आने वाले वर्षों में बढ़ते यात्री और माल यातायात के दबाव को भी कम करेगी। वर्तमान समय में यह रेलखंड बिहार के सबसे व्यस्त रेल कॉरिडोर में से एक माना जाता है, जहां सिंगल लाइन होने के कारण ट्रेनों के संचालन में लगातार दबाव बना रहता है।
मानसी-सहरसा रेलखंड पूर्व मध्य रेलवे के मानसी-सारायगढ़ मार्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सेक्शन उत्तर बिहार और कोसी क्षेत्र के लिए जीवनरेखा की तरह काम करता है। इस मार्ग से प्रतिदिन बड़ी संख्या में यात्री आवाजाही करते हैं, जबकि कृषि और औद्योगिक उत्पादों की ढुलाई भी इसी रूट से होती है। यही कारण है कि लंबे समय से इस रेलखंड के दोहरीकरण की मांग उठ रही थी।
वर्तमान में यह पूरा सेक्शन सिंगल लाइन कॉरिडोर के रूप में संचालित हो रहा है। एक ही ट्रैक पर दोनों दिशाओं में ट्रेनों का संचालन होने के कारण कई बार ट्रेनों को क्रॉसिंग के लिए लंबे समय तक स्टेशनों पर रुकना पड़ता है। इससे ट्रेनों की समयपालन क्षमता प्रभावित होती है और परिचालन में बाधाएं उत्पन्न होती हैं।
रेलवे के आंकड़ों के अनुसार इस सेक्शन पर दोनों दिशाओं में प्रतिदिन 24 जोड़ी यात्री ट्रेनें संचालित होती हैं। यात्री ट्रेनों के अलावा इस मार्ग पर बड़ी मात्रा में मालगाड़ियों का भी संचालन होता है। गेहूं, मक्का, बैलास्ट, उसना चावल, सीमेंट, उर्वरक, नमक, रेत, पत्थर और चीनी जैसी आवश्यक वस्तुओं का परिवहन इसी मार्ग से किया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी रेलखंड की क्षमता का सबसे बड़ा संकेतक उसकी लाइन क्षमता उपयोग (Line Capacity Utilisation) होती है। मानसी-सहरसा सेक्शन में यह उपयोग पहले ही 108.11 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इसका अर्थ यह है कि रेलखंड अपनी आदर्श क्षमता से अधिक दबाव झेल रहा है। अनुमान है कि 2028-29 तक यह क्षमता उपयोग बढ़कर 119.34 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
ऐसी स्थिति में अतिरिक्त लाइन क्षमता विकसित करना अनिवार्य हो गया था। रेलवे द्वारा स्वीकृत डबलिंग परियोजना इसी जरूरत को पूरा करेगी। दोहरीकरण के बाद ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुगम होगी और परिचालन संबंधी बाधाएं काफी हद तक कम हो जाएंगी। इससे यात्रियों को बेहतर सेवा मिलने की संभावना बढ़ेगी।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार परियोजना पूरी होने के बाद यात्री ट्रेनों की समयपालन क्षमता में बड़ा सुधार आएगा। ट्रेनों के लेट होने की समस्या कम होगी और संचालन में लचीलापन बढ़ेगा। वर्तमान में सिंगल लाइन होने के कारण कई ट्रेनों को क्रॉसिंग के लिए इंतजार करना पड़ता है, जिससे समय बर्बाद होता है। डबल लाइन बनने के बाद यह समस्या काफी कम हो जाएगी।
यह परियोजना माल परिवहन क्षेत्र के लिए भी बड़ी राहत लेकर आएगी। अतिरिक्त लाइन क्षमता बनने से मालगाड़ियों की आवाजाही तेज और व्यवस्थित होगी। रेलवे का अनुमान है कि परियोजना पूरी होने के बाद प्रतिवर्ष अतिरिक्त 1.764 मिलियन टन माल परिवहन संभव हो सकेगा। यह बिहार की कृषि, निर्माण और औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा समर्थन साबित हो सकता है।
कोसी और सीमांचल क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं। यहां बड़ी मात्रा में धान, गेहूं, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों का उत्पादन होता है। बेहतर रेल संपर्क से किसानों और व्यापारियों को बाजार तक पहुंचने में आसानी होगी। इससे लॉजिस्टिक्स लागत घट सकती है और कृषि उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हो सकती है।
निर्माण क्षेत्र को भी इस परियोजना से लाभ मिलने की उम्मीद है। सीमेंट, रेत, पत्थर और अन्य निर्माण सामग्री की तेज ढुलाई से अधोसंरचना परियोजनाओं को गति मिलेगी। बिहार में सड़क, पुल, आवास और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए निर्माण सामग्री की बढ़ती मांग को देखते हुए यह रेल क्षमता विस्तार बेहद अहम माना जा रहा है।
रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि डबलिंग परियोजनाएं केवल ट्रैक बढ़ाने तक सीमित नहीं होतीं। इनके माध्यम से पूरे रेल नेटवर्क की दक्षता बेहतर होती है। अधिक लाइन क्षमता का अर्थ है—कम जाम, अधिक ट्रेनें, बेहतर समयपालन और बढ़ी हुई सुरक्षा। इससे यात्रियों और उद्योग दोनों को दीर्घकालिक लाभ मिलता है।
मानसी-सहरसा रेलखंड का दोहरीकरण उत्तर बिहार के कई जिलों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को इससे सीधे लाभ मिलने की संभावना है। लंबे समय से इन क्षेत्रों में बेहतर रेल संपर्क की मांग उठती रही है। नई परियोजना इस दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।
भारतीय रेलवे पिछले कुछ वर्षों से हाई-डिमांड रूट्स पर क्षमता विस्तार पर विशेष ध्यान दे रहा है। सरकार की प्राथमिकता ऐसे मार्गों को मजबूत करना है जहां यात्री और माल यातायात दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं। मानसी-सहरसा परियोजना भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर रेल अवसंरचना क्षेत्रीय विकास को गति देती है। जहां रेल संपर्क मजबूत होता है वहां व्यापार, उद्योग, पर्यटन और रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। इस दृष्टि से यह परियोजना केवल परिवहन सुधार नहीं बल्कि क्षेत्रीय आर्थिक विकास का भी आधार बन सकती है।
कुल मिलाकर, ₹499 करोड़ की लागत वाली मानसी-सहरसा डबलिंग परियोजना बिहार के लिए एक बड़ी रेल सौगात साबित होने जा रही है। 44.40 किलोमीटर लंबे इस रेलखंड का दोहरीकरण यात्री सुविधा, माल परिवहन और परिचालन दक्षता को नई ऊंचाई देगा। परियोजना पूरी होने के बाद बिहार के रेल नेटवर्क को मजबूती मिलेगी और उत्तर बिहार के विकास को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है।


