
भागलपुर। जिले के जगदीशपुर प्रखंड अंतर्गत सैनों मौजा स्थित सरकारी गैरमजरूआ भतोखर पोखर पर कथित अवैध कब्जे और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जमीन की खरीद-बिक्री का मामला सामने आया है। इस संबंध में स्थानीय ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को आवेदन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी तालाब की भूमि को रिकॉर्ड में कथित रूप से हेरफेर कर निजी संपत्ति के रूप में दर्शाया गया और बाद में उसकी खरीद-बिक्री भी कर दी गई।
ग्रामीणों द्वारा दिए गए आवेदन में कहा गया है कि जगदीशपुर प्रखंड के मौजा सैनों, थाना संख्या-429, खाता संख्या-261 तथा खेसरा संख्या-633, 634 और 635 में दर्ज भतोखर पोखर वर्षों से सरकारी गैरमजरूआ तालाब के रूप में दर्ज है। उनका दावा है कि यह पोखर सरकारी अभिलेखों में स्पष्ट रूप से तालाब के रूप में अंकित है और लंबे समय से स्थानीय लोगों तथा किसानों के उपयोग में रहा है।
आवेदनकर्ताओं ने यह भी कहा है कि जिला मत्स्य पदाधिकारी की जलकर बंदोबस्ती सूची में भी भतोखर पोखर शामिल है। ग्रामीणों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2026-27 तक इस पोखर से संबंधित राजस्व सरकार के खाते में जमा होने का रिकॉर्ड मौजूद है। इससे यह स्पष्ट होता है कि संबंधित भूमि निजी नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति है।
ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 1966-67 के रिविजनल सर्वे खतियान में उक्त भूमि पोखर के रूप में दर्ज होने के बावजूद बाद के वर्षों में अभिलेखों में कथित रूप से छेड़छाड़ की गई। उनका कहना है कि इसी हेरफेर के जरिए निजी रैयती खाता तैयार कराया गया और बाद में केवाला के माध्यम से भूमि की खरीद-बिक्री कर दी गई।
ग्रामीणों ने अपने आवेदन में स्पष्ट कहा है कि बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 लागू होने के बाद सरकारी गैरमजरूआ तालाब की बिक्री का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। ऐसे में यदि सरकारी तालाब की भूमि किसी व्यक्ति के नाम दर्ज हुई है या उसकी बिक्री की गई है, तो इसकी गहन जांच आवश्यक है। उनका कहना है कि सरकारी संपत्ति को निजी स्वामित्व में बदलने की प्रक्रिया कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
आवेदन में वर्ष 1950 के न्यायालय के आदेश का भी हवाला दिया गया है। साथ ही कस्टोडियल सर्वे खतियान और रिविजनल सर्वे अभिलेखों का उल्लेख करते हुए ग्रामीणों ने दावा किया कि सभी रिकॉर्ड इस भूमि को सरकारी तालाब साबित करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 1979 में अंचलाधिकारी द्वारा इसी पोखर में मछली पकड़ने के मामले में कार्रवाई की गई थी, जो इस बात का प्रमाण है कि प्रशासन भी उस समय इसे सरकारी संपत्ति मानता था।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि बांका जिले के रजौन थाना क्षेत्र निवासी लक्ष्मण पासवान ने वर्ष 2005 में कई केवाला के माध्यम से उक्त भूमि की खरीद की। आवेदनकर्ताओं का कहना है कि जिन लोगों ने भूमि बेची, उनके पास इस सरकारी तालाब पर स्वामित्व का कोई वैध दस्तावेज नहीं था। इसके बावजूद कथित रूप से जमीन की खरीद-बिक्री कर दी गई।
आरोप यह भी लगाया गया है कि खरीद-बिक्री के दस्तावेजों में पोखर की वास्तविक प्रकृति को छिपाने का प्रयास किया गया। ग्रामीणों के अनुसार दस्तावेजों में भूमि को ‘पोखर’ के बजाय ‘चौरमय’ दिखाया गया, जिससे सरकारी रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में अंतर पैदा हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि सुनियोजित हेरफेर का मामला प्रतीत होता है।
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि यह मुद्दा नया नहीं है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2017 में भी इस मामले की शिकायत अंचलाधिकारी सहित अन्य अधिकारियों से की गई थी। इसके अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय को भी आवेदन भेजकर हस्तक्षेप की मांग की गई थी। हालांकि ग्रामीणों का आरोप है कि इतने वर्षों के बाद भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
ग्रामीणों में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि लगातार शिकायतों के बावजूद मामला लंबित पड़ा हुआ है। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने प्रभावी कार्रवाई की होती, तो आज सरकारी तालाब पर अवैध कब्जे जैसी स्थिति नहीं बनती। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण विवाद लगातार बढ़ता गया।
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। उन्होंने अनुरोध किया है कि राजस्व अभिलेखों, पुराने सर्वे रिकॉर्ड, जलकर बंदोबस्ती दस्तावेज और बिक्री से जुड़े सभी कागजात की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए। साथ ही यदि किसी स्तर पर रिकॉर्ड से छेड़छाड़ पाई जाती है तो संबंधित लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि सरकारी भतोखर पोखर को अवैध कब्जे और अतिक्रमण से मुक्त कराया जाए। उनका कहना है कि यह पोखर केवल सरकारी संपत्ति ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के किसानों के लिए जीवनरेखा के समान है। लंबे समय से यह पोखर सिंचाई का प्रमुख स्रोत रहा है और खेती-किसानी में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
किसानों का कहना है कि यदि पोखर को संरक्षित और पुनर्जीवित किया जाए तो आसपास के कृषि क्षेत्र को बड़ा लाभ मिल सकता है। जल संरक्षण और सिंचाई की दृष्टि से भी इस पोखर का महत्व काफी अधिक है। ग्रामीणों का मानना है कि सरकारी तालाबों और जल स्रोतों की रक्षा करना पर्यावरण संरक्षण के लिए भी जरूरी है।
यह मामला सरकारी भूमि की सुरक्षा, राजस्व अभिलेखों की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है। अब सभी की नजर जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि निष्पक्ष जांच के बाद सच्चाई सामने आएगी और सरकारी संपत्ति को अवैध कब्जे से मुक्त कर न्याय सुनिश्चित किया जाएगा।


