सेवा ही सबसे बड़ा सम्मान: 100 वर्ष के हुए पद्मश्री डॉ. दिलीप कुमार सिंह, गरीबों की सेवा को बताया जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य

भागलपुर जिले के पीरपैंती की धरती ने देश को एक ऐसे चिकित्सक दिए हैं, जिनका पूरा जीवन मानव सेवा, समर्पण और करुणा की मिसाल बन गया। पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ चिकित्सक ने अपने जीवन के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। शतायु होने के इस विशेष अवसर पर उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण जीवन, चिकित्सा सेवा और समाज के प्रति समर्पण की यादों को साझा करते हुए कहा कि गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा से बड़ा कोई सम्मान नहीं हो सकता। उनका मानना है कि जीवन की वास्तविक सफलता पद, प्रतिष्ठा या धन में नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक मदद पहुंचाने में छिपी होती है।

26 जून 1926 को जन्मे डॉ. दिलीप कुमार सिंह का जीवन स्वतंत्र भारत के सामाजिक परिवर्तन और स्वास्थ्य सेवा के संघर्षों का जीवंत दस्तावेज माना जाता है। एक ऐसे दौर में जब ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग नगण्य थीं, उन्होंने चिकित्सा सेवा को पेशा नहीं बल्कि मिशन के रूप में अपनाया। उनकी पहचान केवल एक चिकित्सक के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने वाले जनसेवक के रूप में भी स्थापित हुई।

डॉ. सिंह ने बताया कि चिकित्सा शिक्षा पूरी करने के बाद उनके सामने विदेशों में बेहतर अवसर मौजूद थे। उन्हें आधुनिक संसाधनों और सुविधाओं के बीच कार्य करने का अवसर मिल सकता था, लेकिन उन्होंने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि विदेश में करियर बनाना संभव था, लेकिन उनका मन हमेशा अपनी जन्मभूमि और वहां के लोगों के बीच ही रहा। इसी भावना ने उन्हें वापस पीरपैंती लौटने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विदेश छोड़कर गांव लौटना उनके जीवन का सबसे सही और सबसे संतोषजनक फैसला साबित हुआ।

उनके अनुसार, राष्ट्रपिता , और के विचारों ने उनके जीवन की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई। इन महान व्यक्तित्वों की शिक्षाओं से उन्होंने सीखा कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाना ही सच्ची राष्ट्रसेवा है। यही सोच उन्हें गांव-गांव जाकर गरीबों के बीच स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए प्रेरित करती रही।

समाज सेवा के इसी अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2021 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल उनकी चिकित्सा उपलब्धियों का नहीं, बल्कि दशकों तक किए गए निःस्वार्थ सामाजिक कार्यों का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान माना गया। उनके लिए यह सम्मान व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों मरीजों की दुआओं का परिणाम है, जिनकी जिंदगी उन्होंने बेहतर बनाई।

डॉ. सिंह को लोग प्यार से “पोलियो मैन” के नाम से भी जानते हैं। उन्होंने बताया कि भारत का पहला पोलियो शिविर भागलपुर के पीरपैंती क्षेत्र में आयोजित किया गया था। उस समय पोलियो जैसी बीमारी बच्चों के भविष्य के लिए बड़ी चुनौती थी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाया और हजारों बच्चों तक उपचार तथा परामर्श पहुंचाया। उनके प्रयासों ने कई परिवारों को नई उम्मीद दी।

पोलियो उन्मूलन के अलावा कुष्ठ रोगियों की सेवा भी उनके जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय रही। समाज में लंबे समय तक कुष्ठ रोगियों को उपेक्षा और भेदभाव का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में डॉ. सिंह ने इन मरीजों का उपचार केवल चिकित्सकीय दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ किया। उन्होंने बताया कि बापू की प्रेरणा से उन्होंने यह संकल्प लिया कि समाज से अलग-थलग पड़े लोगों तक सम्मानपूर्वक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाई जाए। इस मिशन के तहत उन्होंने हजारों कुष्ठ रोगियों का निःस्वार्थ इलाज किया।

उनका योगदान केवल रोग उपचार तक सीमित नहीं रहा। मोतियाबिंद उन्मूलन अभियान में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। ग्रामीण क्षेत्रों में आंखों की बीमारियों से पीड़ित अनेक बुजुर्गों को उन्होंने उपचार और सर्जरी के माध्यम से नई रोशनी दी। इसके साथ ही नशा मुक्ति आंदोलन में भी उन्होंने समाज को जागरूक करने का काम किया। उनका मानना रहा कि स्वस्थ समाज केवल अस्पतालों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों से बनता है।

अपने 100वें जन्मदिवस पर डॉ. सिंह ने स्वतंत्रता के बाद के संघर्षपूर्ण वर्षों को याद किया। उन्होंने कहा कि उस समय संसाधनों की भारी कमी थी। सड़क, बिजली, दवाइयां और चिकित्सकीय उपकरण तक सीमित थे। बावजूद इसके यदि सेवा का संकल्प मजबूत हो, तो बड़े बदलाव संभव हैं। उन्होंने कहा कि इच्छाशक्ति और समर्पण किसी भी कमी को पीछे छोड़ सकते हैं।

इस अवसर पर उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से अपील की कि गरीबों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को और अधिक सुलभ, सस्ता और प्रभावी बनाया जाए। उनका कहना था कि आज भी ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने की बड़ी चुनौती मौजूद है। यदि प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किया जाए तो लाखों लोगों को बेहतर इलाज मिल सकता है।

डॉ. सिंह के पुत्र ने कहा कि पिता की सेवा करना उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि 100 वर्ष पूरे होने पर पिता का आशीर्वाद मिलना किसी भी पुरस्कार से कम नहीं। परिवार के लिए यह गर्व का क्षण है कि उन्होंने एक ऐसे व्यक्तित्व के साथ जीवन बिताया, जिनका हर दिन सेवा और अनुशासन की मिसाल रहा।

शिशु रोग विशेषज्ञ ने कहा कि डॉ. दिलीप कुमार सिंह चिकित्सा जगत के लिए प्रेरणा हैं। उनके अनुभव, सेवा भावना और समर्पण से नई पीढ़ी के डॉक्टरों को सीख लेनी चाहिए कि चिकित्सा केवल पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम है।

वहीं पूर्व विधायक ने कहा कि डॉ. सिंह जैसे लोग समाज की अमूल्य धरोहर हैं। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा।

पीरपैंती से निकले इस महान चिकित्सक की कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि सेवा, संघर्ष और मानवता की ऐसी गाथा है जो समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जाएगी। 100 वर्ष की आयु में भी उनका संदेश स्पष्ट है— यदि जीवन में कुछ स्थायी छोड़ना है, तो वह लोगों के दिलों में सेवा और संवेदना की छाप होनी चाहिए। यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उनकी विरासत भी।

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