कॉम्फेड ने तय समय से पहले बनाया रिकॉर्ड, 2000 नई दुग्ध सहकारी समितियों का लक्ष्य पूरा

बिहार में डेयरी सेक्टर को मजबूत करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। बिहार स्टेट मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड यानी ने वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में निर्धारित 2,000 नई दुग्ध सहकारी समितियों के गठन का लक्ष्य समय सीमा से पहले ही पूरा कर लिया है। इस उपलब्धि को राज्य में दुग्ध उत्पादन, पशुपालन और ग्रामीण रोजगार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। बिहार सरकार ने इसे राज्य के डेयरी नेटवर्क विस्तार की दिशा में बड़ी सफलता बताया है।

डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग के सचिव ने इस उपलब्धि की जानकारी देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के सात निश्चय-3 कार्यक्रम के तहत राज्य में डेयरी क्षेत्र का व्यापक विस्तार किया जा रहा है। इसी योजना के अंतर्गत पशुपालकों को संगठित दुग्ध व्यवसाय से जोड़ने का अभियान चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप पहली तिमाही में ही 2,000 नई समितियों का गठन संभव हो सका।

उन्होंने बताया कि यह सफलता केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की आर्थिक प्रगति से सीधे जुड़ी हुई है। नई दुग्ध सहकारी समितियों के गठन से राज्य के दूर-दराज गांवों में रहने वाले पशुपालकों को एक संगठित बाजार मिला है। पहले जहां कई छोटे पशुपालकों को दूध बेचने के लिए निजी व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ता था, वहीं अब सहकारी व्यवस्था के माध्यम से उन्हें अधिक पारदर्शी और स्थिर व्यवस्था मिल रही है।

नई समितियों के जरिए किसानों और पशुपालकों को कई प्रकार के लाभ मिलेंगे। इनमें दूध का उचित मूल्य, समय पर भुगतान, तकनीकी मार्गदर्शन और पशुपालन से जुड़ी आधुनिक सुविधाएं प्रमुख हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि दूध उत्पादन तो होता है, लेकिन उचित बाजार और मूल्य नहीं मिलने के कारण पशुपालकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। कॉम्फेड की नई पहल इस अंतर को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

बिहार में डेयरी उद्योग लंबे समय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम आधार रहा है। राज्य के लाखों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दुग्ध उत्पादन से जुड़े हुए हैं। ऐसे में सहकारी समितियों का विस्तार केवल दूध संग्रहण बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण रोजगार सृजन और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को तेज करने में भी सहायक है।

सचिव ने कहा कि दुग्ध सहकारी समितियां ग्रामीण विकास का प्रभावी मॉडल बन चुकी हैं। जब गांव स्तर पर पशुपालक एक संगठित संरचना से जुड़ते हैं तो उत्पादन, संग्रहण, वितरण और भुगतान की पूरी प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो जाती है। इससे किसानों का भरोसा बढ़ता है और वे अधिक निवेश करने के लिए प्रेरित होते हैं। इसका सीधा असर दूध उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर पड़ता है।

इस उपलब्धि का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भी है। बड़ी संख्या में महिला पशुपालक नई दुग्ध सहकारी समितियों से जुड़ रही हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण को नई गति मिली है। कई गांवों में महिलाएं दुग्ध उत्पादन और समिति संचालन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, जिससे परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है। आर्थिक भागीदारी बढ़ने से महिलाओं का सामाजिक निर्णयों में योगदान भी मजबूत हो रहा है।

ग्रामीण बिहार में डेयरी सेक्टर महिलाओं के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित हो रहा है क्योंकि पशुपालन अक्सर घरेलू स्तर पर संचालित किया जाता है। ऐसे में सहकारी मॉडल महिलाओं को घर के पास ही आय का स्थायी स्रोत उपलब्ध कराता है। सरकार का मानना है कि डेयरी सेक्टर के जरिए महिला उद्यमिता को और अधिक बढ़ावा दिया जा सकता है।

कॉम्फेड द्वारा हासिल यह लक्ष्य राज्य सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत बिहार के प्रत्येक गांव तक सहकारी डेयरी नेटवर्क पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक पशुपालक औपचारिक दुग्ध बाजार से जुड़ें ताकि उन्हें बिचौलियों पर निर्भर न रहना पड़े। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि राज्य की डेयरी क्षमता भी मजबूत होगी।

पहली तिमाही में 2,000 समितियों के गठन की सफलता के बाद सरकार ने अगले चरण के लिए और बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। आगामी तिमाही में 3,000 नई दुग्ध सहकारी समितियों के गठन का लक्ष्य तय किया गया है। विभाग और कॉम्फेड प्रबंधन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए रणनीतिक रूप से कार्य कर रहे हैं। जिला स्तर पर अधिकारियों और फील्ड कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया गया है ताकि अधिक से अधिक गांव इस नेटवर्क से जुड़ सकें।

विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में डेयरी सेक्टर में अपार संभावनाएं हैं। यदि संगठित सहकारी मॉडल का विस्तार इसी गति से जारी रहा तो आने वाले वर्षों में राज्य दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू सकता है। इससे राज्य की अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा।

सरकार इस पहल को केवल उत्पादन वृद्धि के रूप में नहीं देख रही, बल्कि इसे व्यापक ग्रामीण विकास मॉडल के रूप में आगे बढ़ा रही है। डेयरी सेक्टर में बढ़ता निवेश रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहा है। पशु आहार, दुग्ध परिवहन, प्रसंस्करण और वितरण जैसी सहायक गतिविधियों में भी रोजगार बढ़ने की संभावना है।

सचिव ने कहा कि 2,000 नई दुग्ध सहकारी समितियों का गठन केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है। यह ग्रामीण बिहार में आर्थिक समृद्धि, रोजगार सृजन और श्वेत क्रांति के नए चरण की मजबूत शुरुआत है। राज्य सरकार इसे श्वेत क्रांति-2 की दिशा में एक निर्णायक कदम मान रही है।

आत्मनिर्भर बिहार के निर्माण के लक्ष्य को हासिल करने में डेयरी सेक्टर की भूमिका लगातार बढ़ रही है। कॉम्फेड की यह उपलब्धि दर्शाती है कि यदि योजनाओं का क्रियान्वयन समयबद्ध और समन्वित तरीके से किया जाए तो बड़े लक्ष्य भी तय समय से पहले हासिल किए जा सकते हैं। आने वाले समय में यह पहल लाखों ग्रामीण परिवारों के जीवन में स्थायी आर्थिक बदलाव ला सकती है।

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