क्या बांकीपुर उपचुनाव लड़ेंगे प्रशांत किशोर? जीतें या हारें, जन सुराज को होगा बड़ा राजनीतिक फायदा!

पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा जिस सीट की हो रही है, वह है पटना की प्रतिष्ठित बांकीपुर विधानसभा सीट। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष Nitin Nabin के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर होने वाले उपचुनाव ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि क्या Prashant Kishor खुद चुनाव मैदान में उतरेंगे?

अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक उपचुनाव नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की दिशा तय करने वाली लड़ाई बन सकती है।

30 साल से भाजपा का अभेद्य किला है बांकीपुर

बांकीपुर सीट पर भाजपा का तीन दशक से अधिक समय से कब्जा रहा है। नितिन नवीन 2006 से लगातार यहां से विधायक रहे और अब राज्यसभा सदस्य बनने के बाद सीट खाली हो गई है।

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अगले कुछ महीनों में यहां उपचुनाव होना तय है। ऐसे में सभी दल अपनी रणनीति बनाने में जुट गए हैं।

क्या प्रशांत किशोर को चाहिए यह राजनीतिक मौका?

जन सुराज को 2025 विधानसभा चुनाव में लगभग साढ़े तीन प्रतिशत वोट मिले, लेकिन पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी। चुनाव के बाद पार्टी को नए राजनीतिक उत्साह और मजबूत मंच की जरूरत है।

ऐसे में यदि प्रशांत किशोर खुद बांकीपुर से चुनाव लड़ते हैं तो:

  • कार्यकर्ताओं में नया जोश आएगा।
  • पार्टी को लगातार चर्चा में बने रहने का मौका मिलेगा।
  • जन सुराज को विधानसभा में प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना बनेगी।
  • बिहार की राजनीति में तीसरे विकल्प की बहस मजबूत होगी।

जीत गए तो क्या होगा?

अगर प्रशांत किशोर चुनाव जीत जाते हैं तो यह जन सुराज के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होगी।

वे:

  • विधानसभा में पार्टी का चेहरा बनेंगे।
  • विपक्ष के खिलाफ और सरकार के खिलाफ मुखर आवाज बन सकते हैं।
  • 2030 के चुनाव की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं।
  • बिहार में तीसरे राजनीतिक ध्रुव की संभावना मजबूत कर सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा में पहुंचने के बाद प्रशांत किशोर अपनी राजनीतिक पकड़ और तेजी से मजबूत कर सकते हैं।

हार गए तो क्या नुकसान होगा?

राजनीति में हार हमेशा अंत नहीं होती।

देश के कई बड़े नेता चुनाव हार चुके हैं:

  • Atal Bihari Vajpayee
  • Ram Manohar Lohia
  • Lalu Prasad Yadav
  • Rabri Devi
  • Nitish Kumar

चुनाव हारना राजनीति का अंत नहीं माना जाता। लेकिन चुनाव मैदान से दूर रहना कई बार राजनीतिक कमजोरी माना जाता है।

इसी कारण कई लोग मानते हैं कि प्रशांत किशोर के लिए चुनाव लड़ना, न लड़ने से बेहतर विकल्प हो सकता है।

क्या महागठबंधन देगा समर्थन?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि महागठबंधन भाजपा को हराने के लिए प्रशांत किशोर का समर्थन कर सकता है।

हालांकि इसकी संभावना कम दिखाई देती है।

क्योंकि अगर प्रशांत किशोर जीतकर विधानसभा पहुंचते हैं तो वे सीधे विपक्ष की राजनीति में एक नए केंद्र के रूप में उभर सकते हैं। ऐसे में महागठबंधन के लिए उन्हें मजबूत करना आसान फैसला नहीं होगा।

भाजपा के लिए भी आसान नहीं होगी लड़ाई

यदि प्रशांत किशोर चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा के लिए यह उपचुनाव प्रतिष्ठा की लड़ाई बन जाएगा।

बांकीपुर भाजपा का पारंपरिक गढ़ जरूर है, लेकिन पीके की उम्मीदवारी चुनाव को पूरी तरह हाई-प्रोफाइल बना सकती है।

अंतिम फैसला पीके को करना है

फिलहाल प्रशांत किशोर या जन सुराज की ओर से कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन इतना तय है कि अगर वे बांकीपुर उपचुनाव लड़ते हैं तो बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू होगी।

जीतें या हारें, चुनाव लड़ने से जन सुराज को राजनीतिक ऑक्सीजन जरूर मिलेगी। अब नजर इस बात पर है कि क्या प्रशांत किशोर भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक में उतरने का जोखिम उठाते हैं या नहीं।

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