कांग्रेस–टीएमसी विलय की सियासी सुगबुगाहट तेज! सोनिया गांधी का ऑफर, ममता बनर्जी की शर्तों ने बढ़ाई हलचल

नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक बड़ी चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच संभावित विलय को लेकर सियासी गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म है। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच हुई कथित बातचीत ने नए राजनीतिक समीकरणों की संभावना को हवा दे दी है।

हालांकि अभी तक किसी भी दल की ओर से इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

सोनिया गांधी का कथित ऑफर

सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी ने टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी से फोन पर बातचीत के दौरान कांग्रेस में विलय का प्रस्ताव दिया था। इस प्रस्ताव में कहा गया कि यदि टीएमसी कांग्रेस में शामिल होती है तो ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जा सकता है।

इसके साथ ही अभिषेक बनर्जी को कांग्रेस में महासचिव पद दिए जाने की भी चर्चा सामने आई है।

ममता बनर्जी की शर्तें

रिपोर्ट्स के अनुसार, ममता बनर्जी ने इस प्रस्ताव के जवाब में कुछ अहम शर्तें रखी हैं। इनमें प्रमुख रूप से—

  • टीएमसी के 12 मौजूदा सांसदों को राज्यसभा में बनाए रखना
  • राज्यसभा में विपक्ष के नेता का पद टीएमसी को देना

बताया जा रहा है कि इन शर्तों पर अभी चर्चा जारी है और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है।

“भाजपा के दबाव” का भी जिक्र

सूत्रों का यह भी दावा है कि बातचीत के दौरान यह तर्क दिया गया कि विपक्षी दलों को भाजपा के बढ़ते राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में मजबूत गठबंधन या संभावित विलय पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि टीएमसी और कांग्रेस दोनों ही ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

90 मिनट की अहम बैठक का दावा

जानकारी के अनुसार, 8 और 9 जून को 10 जनपथ स्थित सोनिया गांधी के आवास पर हुई मुलाकातों के बाद इस चर्चा ने गति पकड़ी। इसके बाद राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी के बीच लगभग 90 मिनट लंबी बैठक भी हुई, जिसे बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सियासत में बढ़ी हलचल

इन खबरों के सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक दोनों दलों की ओर से आधिकारिक बयान नहीं आता, तब तक इसे केवल राजनीतिक अटकलें ही माना जाएगा।

फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चर्चा किसी बड़े राजनीतिक बदलाव में बदलती है या सिर्फ सियासी अफवाह बनकर रह जाती है।

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