
पटना। बिहार में गर्भवती महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को मजबूत बनाने की दिशा में चलाए जा रहे प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) ने अपने दस वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस महत्वपूर्ण अवसर पर 9 जून 2026 को पूरे राज्य में विशेष कार्यक्रमों और स्वास्थ्य जांच शिविरों का आयोजन किया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में सभी चिकित्सा महाविद्यालयों, जिला अस्पतालों और जिला प्रशासन को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं ताकि अभियान की 10वीं वर्षगांठ को प्रभावी तरीके से मनाया जा सके।
इस वर्ष अभियान की थीम “प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के 10 वर्ष: सुरक्षित गर्भावस्था, स्वस्थ माँ, सशक्त भारत” रखी गई है। स्वास्थ्य विभाग का उद्देश्य इस अवसर पर अधिक से अधिक गर्भवती महिलाओं तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना और उन्हें प्रसव पूर्व जांच के महत्व के प्रति जागरूक करना है।
मातृ स्वास्थ्य को मजबूत बनाने में अभियान की बड़ी भूमिका
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने बिहार में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में अहम योगदान दिया है। अभियान के तहत गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान, विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श और समय पर उपचार सुनिश्चित किया जाता है। इससे गर्भावस्था के दौरान होने वाली जटिलताओं को शुरुआती चरण में पहचानने और उनका समाधान करने में मदद मिलती है।
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि अभियान के कारण राज्य में सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा मिला है और महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त हो रही हैं। इससे मातृ मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर में कमी लाने के प्रयासों को भी मजबूती मिली है।
77 लाख से अधिक महिलाओं को मिला लाभ
विभागीय आंकड़ों के अनुसार जून 2016 से अप्रैल 2026 तक बिहार में कुल 77 लाख 05 हजार 820 गर्भवती महिलाएं प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के माध्यम से लाभान्वित हुई हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि राज्य में अभियान व्यापक स्तर पर प्रभावी ढंग से संचालित हो रहा है।
वर्तमान समय में बिहार के 1,277 स्वास्थ्य संस्थानों में यह कार्यक्रम नियमित रूप से चलाया जा रहा है। इनमें जिला अस्पताल, अनुमंडलीय अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और अन्य सरकारी स्वास्थ्य संस्थान शामिल हैं। इन संस्थानों में हर महीने गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य जांच, आवश्यक परामर्श और जोखिम की पहचान की जाती है।
पहली तिमाही में जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-6, 2023-24) के आंकड़े भी बिहार में प्रसव पूर्व जांच सेवाओं की स्थिति में सुधार का संकेत देते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार गर्भावस्था की पहली तिमाही में जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
एनएफएचएस-5 (2019-21) में जहां पहली तिमाही में प्रसव पूर्व जांच कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 52.9 था, वहीं एनएफएचएस-6 में यह बढ़कर 63.9 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह दर्शाता है कि महिलाओं में समय पर स्वास्थ्य जांच कराने के प्रति जागरूकता बढ़ी है और स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच पहले की तुलना में अधिक हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में जांच कराना बेहद महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसी दौरान कई स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों की पहचान संभव होती है। समय पर उपचार मिलने से मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है।
चार या उससे अधिक जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या में भी वृद्धि
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया है कि गर्भावस्था के दौरान कम से कम चार बार प्रसव पूर्व जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
एनएफएचएस-5 में जहां यह प्रतिशत 25.2 था, वहीं एनएफएचएस-6 में बढ़कर 37.6 प्रतिशत हो गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार नियमित जांच से एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कुपोषण और अन्य जटिलताओं का समय रहते पता लगाया जा सकता है। इससे सुरक्षित प्रसव की संभावना बढ़ती है और जटिलताओं का खतरा कम होता है।
9 जून को राज्यभर में लगेंगे विशेष शिविर
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान की 10वीं वर्षगांठ के अवसर पर 9 जून को बिहार के सभी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में विशेष स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाएंगे। इन शिविरों का मुख्य उद्देश्य पहली तिमाही की गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच सुनिश्चित करना है।
स्वास्थ्य विभाग ने सभी जिलों को निर्देश दिया है कि अधिक से अधिक महिलाओं को इन शिविरों से जोड़ा जाए। आशा कार्यकर्ता, एएनएम और अन्य स्वास्थ्यकर्मी गर्भवती महिलाओं को शिविरों तक लाने और उन्हें आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में सहयोग करेंगे।
शिविरों में रक्तचाप जांच, वजन मापन, रक्त परीक्षण, पोषण संबंधी परामर्श और अन्य आवश्यक स्वास्थ्य जांच की सुविधाएं उपलब्ध रहेंगी। साथ ही महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में भी जानकारी दी जाएगी।
विशेषज्ञ चिकित्सकों से मिलेगा परामर्श
दूसरी और तीसरी तिमाही में पहुंच चुकी गर्भवती महिलाओं को विशेष रूप से अनुमंडलीय अस्पतालों, जिला अस्पतालों और फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) में लाया जाएगा। यहां उन्हें विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श, विस्तृत जांच और आवश्यक चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य है कि जिन महिलाओं में किसी प्रकार का स्वास्थ्य जोखिम दिखाई दे, उन्हें तुरंत उचित चिकित्सा सहायता और रेफरल सुविधा उपलब्ध कराई जाए ताकि गर्भावस्था और प्रसव के दौरान किसी प्रकार की जटिलता उत्पन्न न हो।
उच्च जोखिम वाली गर्भवतियों पर रहेगा विशेष फोकस
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान और निगरानी है। इसके तहत ऐसी महिलाओं को चिन्हित किया जाता है जिन्हें गर्भावस्था के दौरान विशेष चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है।
एक्सटेंडेड प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के अंतर्गत उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान के बाद उनकी लगातार निगरानी की जाती है। प्रसव के बाद भी 45 दिनों तक उनकी ट्रैकिंग और स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखी जाती है। इससे किसी भी संभावित खतरे को समय रहते नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
सुरक्षित मातृत्व की दिशा में बड़ा कदम
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने बिहार में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दी है। नियमित जांच, समय पर पहचान और विशेषज्ञ उपचार की सुविधा ने लाखों महिलाओं को सुरक्षित गर्भावस्था और स्वस्थ प्रसव का अवसर प्रदान किया है।
अभियान की 10वीं वर्षगांठ केवल एक उपलब्धि नहीं बल्कि यह याद दिलाने का अवसर भी है कि सुरक्षित मातृत्व किसी भी समाज के समग्र विकास की आधारशिला है। राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग आने वाले वर्षों में भी इस अभियान को और अधिक प्रभावी बनाने तथा हर गर्भवती महिला तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।


