वर्दी में फरिश्ता: 35 साल से बेसहारा और मानसिक रूप से बीमार लोगों की सेवा कर रहे दरोगा, 200 से ज्यादा जिंदगी को दिया सहारा

गया, बिहार: आज के दौर में जहां लोग सड़क किनारे पड़े बेसहारा और मानसिक रूप से बीमार लोगों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाते हैं, वहीं बिहार पुलिस के एक दरोगा मानवता की अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं। गया जिले के कोठी थाना में तैनात सब-इंस्पेक्टर सच्चिदानंद राय पिछले 35 वर्षों से मानसिक रूप से विक्षिप्त और लावारिस लोगों की सेवा में जुटे हैं। अब तक वे 200 से अधिक लोगों की जिंदगी बदलने का प्रयास कर चुके हैं।

उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी सच्चिदानंद राय वर्ष 1993 में बिहार पुलिस में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे। कई पदोन्नतियों के बाद वे वर्तमान में सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। लेकिन मानव सेवा का उनका यह सफर पुलिस नौकरी से भी पहले शुरू हो चुका था।

सच्चिदानंद राय बताते हैं कि बचपन से ही सड़क किनारे भटकते मानसिक रूप से बीमार लोगों को देखकर उनका मन व्यथित हो जाता था। यही संवेदना धीरे-धीरे उनके जीवन का मिशन बन गई।

उनकी सेवा केवल भोजन और कपड़े देने तक सीमित नहीं है। वे ऐसे लोगों को नहलाते हैं, उनके बाल और नाखून कटवाते हैं, साफ कपड़े पहनाते हैं, भोजन उपलब्ध कराते हैं और जरूरत पड़ने पर अस्पताल में भर्ती कराकर उनका इलाज भी करवाते हैं। इसके साथ ही वे उनके परिवार की तलाश करने का प्रयास भी करते हैं।

हाल ही में उन्होंने सड़क किनारे बेसहारा अवस्था में पड़े एक वृद्ध व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया, उसका इलाज करवाया और बाद में एक आश्रम में सुरक्षित ठहराने की व्यवस्था भी की। आश्रम में भेजने के बाद भी वे समय-समय पर उनकी स्थिति की जानकारी लेते रहते हैं और जरूरत पड़ने पर आर्थिक सहायता भी करते हैं।

सच्चिदानंद राय का कहना है कि पुलिस की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं है, बल्कि समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों की मदद करना भी उसका महत्वपूर्ण दायित्व है। उनके इस मानवीय कार्य को पुलिस विभाग और वरिष्ठ अधिकारियों का भी भरपूर समर्थन मिला है।

सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी वे इस सेवा कार्य को जारी रखना चाहते हैं। उन्होंने अपनी पेंशन का बड़ा हिस्सा बेसहारा और मानसिक रूप से बीमार लोगों की मदद में खर्च करने का संकल्प लिया है।

स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि सच्चिदानंद राय को इंसानियत की जीवंत मिसाल मानते हैं। उनका मानना है कि ऐसे समय में जब लोग अपने ही बुजुर्गों और जरूरतमंदों से दूरी बना लेते हैं, तब एक पुलिस अधिकारी का इस तरह मानवता के लिए समर्पित होना पूरे समाज के लिए प्रेरणा है।

 

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