
पटना। बिहार सरकार ने प्रशासनिक खर्चों में कटौती, ऊर्जा संरक्षण और राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार ने अगले छह महीने तक सरकारी खर्च पर अधिकारियों की विदेश यात्रा पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों को हर तीन महीने में अपने परिवार के साथ बिहार के पर्यटन स्थलों का भ्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
सरकार की नई नीति के अनुसार अधिकारियों को शुक्रवार और शनिवार के दिन परिवार के साथ किसी पर्यटन स्थल पर रुकना होगा। इस दौरान उनके प्रवास को ड्यूटी माना जाएगा। इतना ही नहीं, भ्रमण के बाद संबंधित अधिकारियों को अपनी रिपोर्ट और तस्वीरें जिला प्रशासन को सौंपनी होंगी। सरकार का मानना है कि इस पहल से बिहार के पर्यटन क्षेत्र को नई पहचान मिलेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस योजना को ‘लोकल फॉर वोकल’ की अवधारणा से जोड़ते हुए कहा है कि बिहार के लोग यदि अपने ही राज्य के पर्यटन स्थलों को प्राथमिकता देंगे, तो इससे स्थानीय रोजगार और व्यापार को सीधा लाभ मिलेगा। सरकार चाहती है कि अधिकारी खुद राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जाएं, वहां की सुविधाओं को देखें और कमियों की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाएं।
सरकारी आदेश के मुताबिक अगले छह महीने तक किसी भी अधिकारी की सरकारी खर्च पर विदेश यात्रा नहीं होगी। केवल बेहद जरूरी और विशेष परिस्थितियों में ही इस पर विचार किया जाएगा। सरकार का कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों और आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए खर्चों में नियंत्रण जरूरी है। इसलिए विभागों को निर्देश दिया गया है कि अनावश्यक यात्राओं से बचा जाए और अधिकतर बैठकों का आयोजन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से किया जाए।
इसके साथ ही राज्य सरकार ने सरकारी कार्यालयों में ऊर्जा बचत और संसाधनों के बेहतर उपयोग को लेकर भी सख्त निर्देश जारी किए हैं। सभी विभागों में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा, जो बिजली, एयर कंडीशनर और अन्य संसाधनों के उपयोग पर नजर रखेगा। अनावश्यक बिजली खर्च और संसाधनों की बर्बादी रोकने के लिए विशेष निगरानी रखी जाएगी।
सरकार ने कारपूलिंग सिस्टम को भी बढ़ावा देने का फैसला किया है। अधिकारियों और कर्मचारियों को एक ही वाहन का सामूहिक उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को भी प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि ईंधन की बचत हो और प्रदूषण कम किया जा सके।
नई पर्यटन नीति के तहत अधिकारियों को बिहार के किसी भी पर्यटन स्थल का चयन करने की छूट होगी। हर तीन महीने में कम से कम एक बार उन्हें परिवार के साथ वहां जाना होगा। सरकार की ओर से TA/DA यानी यात्रा और दैनिक भत्ता दिया जाएगा, जबकि परिवार या रिश्तेदारों के अतिरिक्त खर्च संबंधित अधिकारी को स्वयं उठाना होगा।
सरकार का कहना है कि इस पहल से तीन बड़े उद्देश्य पूरे होंगे। पहला, बिहार के ऐसे पर्यटन स्थल जो वर्षों से उपेक्षित हैं, उन्हें पहचान मिलेगी और घरेलू पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। दूसरा, अधिकारी जब उन स्थलों पर जाएंगे तो वहां की वास्तविक स्थिति सामने आएगी। यदि किसी जगह सड़क, सफाई, सुरक्षा, बिजली, पानी या ठहरने जैसी सुविधाओं की कमी होगी तो सरकार उसे दूर करने के लिए कदम उठाएगी।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि बिहार के लोग अपने ही राज्य में घूमने के लिए प्रेरित हों। सरकार का मानना है कि यदि लोग बिहार के पर्यटन स्थलों पर अधिक संख्या में जाएंगे, तो स्थानीय होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, भोजन और छोटे व्यवसायों को बड़ा फायदा होगा। इससे हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना है।
सूत्रों के मुताबिक सरकार जल्द ही पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जोड़ने के लिए होमस्टे और इको-टूरिज्म मॉडल पर भी काम शुरू कर सकती है। इसके लिए अलग-अलग जिलों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की तैयारी चल रही है। ये अधिकारी स्थानीय स्तर पर पर्यटन सुविधाओं को विकसित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने में मदद करेंगे।
बिहार में पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन को लेकर सरकार लगातार प्रयास कर रही है। बोधगया, राजगीर, नालंदा, वैशाली, विक्रमशिला, वाल्मीकि नगर और ककोलत जैसे कई पर्यटन स्थल देश-विदेश के पर्यटकों के बीच लोकप्रिय रहे हैं। हालांकि अभी भी कई ऐसे स्थान हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण पर्यटकों की संख्या कम रहती है। सरकार चाहती है कि अधिकारी खुद इन स्थानों पर जाएं और वहां की स्थिति का आकलन करें।
राजनीतिक और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि सरकार का यह फैसला केवल खर्चों में कटौती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक सोच में बदलाव का संकेत भी है। एक ओर सरकार सरकारी खर्चों को नियंत्रित करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर राज्य के अंदर पर्यटन और स्थानीय व्यापार को मजबूत करने की दिशा में भी काम कर रही है।
हालांकि विपक्ष ने इस फैसले पर सवाल भी उठाने शुरू कर दिए हैं। कुछ नेताओं का कहना है कि सरकार को पहले पर्यटन स्थलों की आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाना चाहिए। वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि अधिकारियों के नियमित दौरे से ही कमियां सामने आएंगी और सुधार की प्रक्रिया तेज होगी।
फिलहाल बिहार सरकार का यह फैसला प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस नई व्यवस्था से राज्य के पर्यटन क्षेत्र और स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितना फायदा मिलता है और क्या यह मॉडल दूसरे राज्यों के लिए भी उदाहरण बन पाता है।


