थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए बिहार सरकार की बड़ी राहत, 43 बच्चों का सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट

बिहार सरकार ने थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे बच्चों के इलाज को लेकर बड़ी पहल करते हुए अब तक 43 बच्चों का सफलतापूर्वक बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराया है। राज्य सरकार की मुख्यमंत्री बाल थैलेसीमिया योजना के तहत यह उपलब्धि हासिल की गई है। अब जल्द ही पांच और बच्चों को इलाज के लिए तमिलनाडु के वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज भेजा जाएगा।

स्वास्थ्य मंत्री निशांत ने रविवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि बिहार सरकार गंभीर और दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित बच्चों को बेहतर इलाज और सुरक्षित भविष्य देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य सिर्फ इलाज उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे बच्चों और उनके परिवारों को आर्थिक और मानसिक राहत देना भी है।

स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि मुख्यमंत्री बाल थैलेसीमिया योजना के अंतर्गत अब तक सात अलग-अलग बैचों में कुल 43 बच्चों का सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराया जा चुका है। इसके अलावा अब थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित पांच और बच्चों का नया बैच वेल्लोर भेजे जाने की तैयारी चल रही है। यह योजना के तहत भेजा जाने वाला आठवां बैच होगा।

उन्होंने कहा कि थैलेसीमिया एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें मरीज को बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। लंबे समय तक इलाज नहीं मिलने पर यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है। ऐसे में बोन मैरो ट्रांसप्लांट बच्चों के लिए स्थायी इलाज का सबसे प्रभावी विकल्प माना जाता है।

सरकार के अनुसार मुख्यमंत्री बाल थैलेसीमिया योजना को वर्ष 2024 में मंजूरी मिली थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में 6 अगस्त 2024 को इस योजना को मंत्रिमंडल की स्वीकृति दी गई थी। इसके बाद 4 अक्टूबर 2024 को योजना के तहत पहला बैच इलाज के लिए वेल्लोर भेजा गया था, जिसमें 13 बच्चे शामिल थे।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस योजना के जरिए उन परिवारों को सबसे अधिक राहत मिली है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और महंगे इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं थे। बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसी प्रक्रिया पर लाखों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन राज्य सरकार इस पूरी प्रक्रिया का खर्च खुद उठा रही है।

स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि सरकार प्रति मरीज लगभग 15 लाख रुपये खर्च कर रही है। इस राशि में सिर्फ अस्पताल का इलाज ही नहीं बल्कि मरीज, डोनर और माता-पिता की हवाई यात्रा, वेल्लोर में रहने की व्यवस्था, भोजन और अन्य जरूरी खर्च भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास है कि किसी भी गरीब परिवार का बच्चा सिर्फ पैसे की कमी के कारण इलाज से वंचित न रह जाए। इसी सोच के तहत स्वास्थ्य विभाग लगातार ऐसी योजनाओं को मजबूत करने में लगा हुआ है।

थैलेसीमिया के अलावा सरकार हीमोफिलिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के इलाज पर भी विशेष ध्यान दे रही है। स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि इन बीमारियों के मरीजों को नियमित इलाज और देखभाल उपलब्ध कराने के लिए राज्य में छह एकीकृत डे-केयर केंद्र स्थापित किए गए हैं।

इन केंद्रों में थैलेसीमिया मरीजों को ब्लड ट्रांसफ्यूजन, जांच सुविधा, आयरन चेलेटिंग दवाएं और अन्य आवश्यक चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। वहीं हीमोफिलिया मरीजों को एंटी हेमोफिलिक फैक्टर ट्रांसफ्यूजन की सुविधा भी दी जा रही है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि थैलेसीमिया जैसी बीमारियों में समय पर इलाज और नियमित देखभाल बेहद जरूरी होती है। यदि मरीजों को सही समय पर उपचार नहीं मिले तो शरीर में कई गंभीर जटिलताएं विकसित हो सकती हैं। ऐसे में बिहार सरकार की यह पहल हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है।

मुख्यमंत्री बाल थैलेसीमिया योजना के तहत सिर्फ उन्हीं बच्चों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जाता है जिनका एचएलए मैच उनके भाई या बहन से हो जाता है। स्वास्थ्य विभाग ने इस उद्देश्य से वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के साथ समझौता भी किया है ताकि बच्चों को विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा सके।

विशेषज्ञों के अनुसार बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक जटिल प्रक्रिया होती है, जिसमें काफी समय और सावधानी की जरूरत होती है। इसके बाद मरीज को लंबे समय तक निगरानी में रखना पड़ता है। ऐसे में गरीब परिवारों के लिए यह इलाज लगभग असंभव हो जाता है। लेकिन सरकारी सहायता से अब कई परिवारों को राहत मिली है।

राज्य सरकार का दावा है कि आने वाले समय में इस योजना का दायरा और बढ़ाया जाएगा ताकि अधिक से अधिक बच्चों को लाभ मिल सके। स्वास्थ्य विभाग इस दिशा में भी काम कर रहा है कि राज्य के भीतर ही भविष्य में ऐसी उन्नत चिकित्सा सुविधाएं विकसित की जा सकें।

बिहार में थैलेसीमिया मरीजों की संख्या लगातार चिंता का विषय रही है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी के कारण कई मामलों का समय पर पता नहीं चल पाता। स्वास्थ्य विभाग अब लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाने पर भी जोर दे रहा है ताकि बीमारी की जल्द पहचान हो सके।

स्वास्थ्य मंत्री निशांत ने कहा कि सरकार का उद्देश्य सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं है बल्कि गंभीर बीमारियों से पीड़ित बच्चों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन देना है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक मजबूत तथा जनहितकारी बनाया जाएगा।

फिलहाल बिहार सरकार की यह पहल उन परिवारों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है जो वर्षों से अपने बच्चों के इलाज के लिए संघर्ष कर रहे थे। लगातार सफल हो रहे बोन मैरो ट्रांसप्लांट ने कई बच्चों को नई जिंदगी देने का काम किया है और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी सकारात्मक संदेश दिया है।

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