
बिहार के मध्य विद्यालयों में कार्यरत शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशक इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। राज्य के विभिन्न जिलों में तैनात हजारों अनुदेशकों को पिछले चार महीनों से मानदेय नहीं मिला है, जिससे उनके सामने रोजमर्रा की जिंदगी चलाना भी मुश्किल हो गया है। मात्र 16 हजार रुपये मासिक मानदेय पर काम करने वाले इन कर्मियों का कहना है कि फरवरी 2026 के बाद से अब तक उन्हें भुगतान नहीं किया गया है। लगातार वेतन बंद रहने के कारण अब हालात इतने खराब हो चुके हैं कि परिवार चलाना, बच्चों की पढ़ाई कराना और बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी चुनौती बन गया है।
अनुदेशकों के अनुसार शुरुआती दिनों में उन्होंने किसी तरह अपने मित्रों, रिश्तेदारों और परिचितों से उधार लेकर घर का खर्च चलाया। लेकिन चार महीने तक भुगतान नहीं मिलने के कारण अब लोगों ने भी आर्थिक मदद करने से मना करना शुरू कर दिया है। कई अनुदेशकों का कहना है कि लगातार उधारी बढ़ने से सामाजिक और मानसिक दबाव भी बढ़ गया है।
राज्य के विभिन्न हिस्सों से सामने आ रही जानकारी के अनुसार कई अनुदेशक किराए के मकान में रहकर नौकरी कर रहे हैं। ऐसे में मकान किराया, बिजली बिल, बच्चों की फीस और दैनिक खर्च का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। कुछ अनुदेशकों ने बताया कि घर में राशन तक की समस्या पैदा हो गई है और परिवार के सामने गंभीर स्थिति बन चुकी है।
भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों में स्थिति और अधिक जटिल हो गई है। विक्रमशिला सेतु के एक हिस्से के क्षतिग्रस्त होने के बाद कई शिक्षकों और अनुदेशकों को रोज लंबी दूरी तय कर स्कूल पहुंचना पड़ रहा है। गंगा नदी पार कर दूसरे जिले या प्रखंड तक ड्यूटी करने वाले कर्मियों का कहना है कि अब उनके यात्रा खर्च में भी भारी वृद्धि हो गई है। नाव और वैकल्पिक मार्गों के जरिए स्कूल पहुंचने में अधिक समय और पैसा दोनों खर्च हो रहे हैं।
कुछ अनुदेशकों ने बताया कि पहले जहां कम समय में स्कूल पहुंच जाते थे, वहीं अब कई घंटे यात्रा में लग जाते हैं। इससे मानसिक तनाव भी बढ़ रहा है। वेतन नहीं मिलने के कारण अतिरिक्त यात्रा खर्च उठाना उनके लिए और मुश्किल हो गया है। कई लोगों ने कहा कि अब स्थिति ऐसी हो गई है कि नौकरी जारी रखना भी कठिन लगने लगा है।
अनुदेशकों का आरोप है कि वे लगातार संबंधित अधिकारियों और विभाग से वेतन भुगतान की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला है। उनका कहना है कि जब भी वे जिला कार्यक्रम पदाधिकारी यानी डीपीओ कार्यालय पहुंचते हैं, तो उन्हें यही कहा जाता है कि पटना से राशि का आवंटन नहीं हुआ है। अधिकारी आवंटन की प्रतीक्षा का हवाला देकर उन्हें वापस भेज देते हैं।
इस स्थिति को लेकर अनुदेशकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि वे नियमित रूप से विद्यालयों में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, लेकिन समय पर मानदेय नहीं मिलने के कारण उनका मनोबल टूट रहा है। कई अनुदेशकों ने कहा कि सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मियों की स्थिति बेहद खराब है।
शारीरिक शिक्षा और स्वास्थ्य अनुदेशकों की भूमिका स्कूलों में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। ये अनुदेशक छात्रों को खेलकूद, योग, शारीरिक गतिविधियों और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता से जोड़ने का काम करते हैं। नई शिक्षा नीति और समग्र शिक्षा अभियान में भी बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर जोर दिया जा रहा है। इसके बावजूद इन अनुदेशकों को समय पर भुगतान नहीं मिलना कई सवाल खड़े कर रहा है।
कई अनुदेशकों ने बताया कि उनका मानदेय पहले से ही काफी कम है। 16 हजार रुपये में परिवार चलाना मुश्किल होता है, ऊपर से चार महीने तक वेतन नहीं मिलने से स्थिति और गंभीर हो गई है। कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें बच्चों की फीस भरने के लिए कर्ज लेना पड़ा, जबकि कई लोग दवाइयों और इलाज का खर्च तक नहीं उठा पा रहे हैं।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्कूलों में कार्यरत कर्मियों को समय पर भुगतान नहीं मिलेगा, तो इसका असर शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ेगा। आर्थिक तनाव का असर कर्मचारियों की कार्यक्षमता और मानसिक स्थिति पर पड़ता है। ऐसे में सरकार और शिक्षा विभाग को जल्द समाधान निकालने की जरूरत है।
अनुदेशकों ने सरकार से मांग की है कि लंबित वेतन का जल्द भुगतान सुनिश्चित किया जाए। साथ ही भविष्य में समय पर मानदेय भुगतान के लिए स्थायी व्यवस्था बनाई जाए ताकि उन्हें बार-बार आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को उनके मानदेय में बढ़ोतरी पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि वर्तमान महंगाई के दौर में इतनी कम राशि में परिवार चलाना बेहद कठिन है।
कई जिलों में अनुदेशक संगठन भी इस मुद्दे को लेकर सक्रिय हो गए हैं। संगठन के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि जल्द वेतन भुगतान नहीं हुआ तो राज्य स्तर पर आंदोलन की रणनीति बनाई जा सकती है। कुछ अनुदेशकों ने चेतावनी दी है कि लगातार अनदेखी होने पर वे सामूहिक विरोध प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।
वहीं अभिभावकों और स्थानीय लोगों का भी कहना है कि स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों और अनुदेशकों की समस्याओं का समाधान होना चाहिए। उनका मानना है कि शिक्षा व्यवस्था तभी मजबूत होगी जब उसमें काम करने वाले लोगों को आर्थिक और प्रशासनिक सुरक्षा मिलेगी।
फिलहाल बिहार के हजारों शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशक सरकार की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। चार महीने से वेतन बंद होने के कारण उनके सामने जीवनयापन का संकट गहरा चुका है। अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग और सरकार इस गंभीर समस्या का समाधान कितनी जल्दी निकाल पाती है और इन कर्मियों को राहत कब तक मिलती है।


