
भागलपुर जिले के सुल्तानगंज प्रखंड स्थित ए के गोपालन कॉलेज परिसर में रविवार को सामाजिक न्याय आंदोलन के बैनर तले आयोजित समता अधिकार सम्मेलन में सामाजिक बराबरी, संविधानिक अधिकार, शिक्षा, आरक्षण और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई। सम्मेलन में बिहार और देश के विभिन्न हिस्सों से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, पूर्व जनप्रतिनिधियों और युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करने और वंचित समुदायों के अधिकारों की रक्षा को लेकर कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
सम्मेलन में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उनके अलावा डुमरांव के पूर्व विधायक और इंकलाबी नौजवान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित कुशवाहा, बहुजन चिंतक डॉ. विलक्षण रविदास, सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार के संयोजक रिंकु यादव, मखदुमपुर के पूर्व विधायक सतीश दास, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर एवं लेखक डॉ. लक्ष्मण यादव, डॉ. अंजनी कुमार, ए के गोपालन कॉलेज के सचिव अर्जुन प्रसाद यादव और राजद के वरिष्ठ नेता रामचंद्र चौधरी भी मंच पर मौजूद रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत सामाजिक न्याय और समानता से जुड़े नारों के साथ हुई। सम्मेलन में बड़ी संख्या में छात्र, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। मंच संचालन सामाजिक न्याय आंदोलन के अध्यक्ष रामानंद पासवान ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि समाज में बराबरी और न्याय की लड़ाई अभी अधूरी है और इसे मजबूत जनभागीदारी के माध्यम से आगे बढ़ाने की जरूरत है।
मुख्य अतिथि उदय नारायण चौधरी ने अपने संबोधन में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के योगदान को विस्तार से याद किया। उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने देश के वंचित, पिछड़े और दलित समुदायों को अधिकार दिलाने के लिए जो संघर्ष किया, वह आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कहा कि संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की बुनियाद है। अगर संविधान की मूल भावना को कमजोर किया गया तो समाज में असमानता और बढ़ेगी।
उन्होंने केंद्र सरकार और भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्तमान समय में आर्थिक और सामाजिक असमानता तेजी से बढ़ रही है। उनका आरोप था कि नीतियों का लाभ आम लोगों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है और बड़े पूंजीपतियों को अधिक फायदा मिल रहा है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय की राजनीति का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक अधिकार और अवसर पहुंचाना है।
पूर्व विधायक अजित कुशवाहा ने कहा कि शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में बराबरी सुनिश्चित किए बिना सामाजिक न्याय की बात अधूरी रहेगी। उन्होंने युवाओं से लोकतांत्रिक अधिकारों और संविधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि सामाजिक बदलाव केवल भाषणों से नहीं बल्कि संगठित जनआंदोलन से संभव है।
डॉ. विलक्षण रविदास ने अपने संबोधन में बहुजन समाज की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि शिक्षा समाज में परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम है और जब तक समाज के कमजोर वर्गों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं पहुंचेगी, तब तक बराबरी का सपना अधूरा रहेगा। उन्होंने युवाओं को जागरूक और संगठित होने का संदेश दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर और लेखक डॉ. लक्ष्मण यादव ने सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब समाज के हर वर्ग को समान अवसर और सम्मान मिलेगा। उन्होंने शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में समान भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया।
सामाजिक न्याय आंदोलन के संयोजक रिंकु यादव ने कहा कि यह सम्मेलन केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज में बराबरी और अधिकार की लड़ाई को मजबूत करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों को संविधान और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाएगा।
कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा व्यवस्था, आरक्षण और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों को भी उठाया। कई वक्ताओं ने कहा कि समाज के कमजोर वर्गों को अब भी कई स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में संगठित आंदोलन और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
सम्मेलन में युवाओं की भागीदारी भी खास रही। बड़ी संख्या में छात्र और युवा सामाजिक न्याय, समान अवसर और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा सुनने पहुंचे। कार्यक्रम में मौजूद कई युवाओं ने कहा कि ऐसे आयोजन समाज और राजनीति को समझने का अवसर देते हैं।
इस दौरान मंच पर पूर्व गनगनिया मुखिया ओम प्रकाश पासवान, मो. मेराज, अरविंद यादव समेत कई सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। सामाजिक न्याय आंदोलन से जुड़े शंभू कुमार, अनिरुद्ध यादव और अन्य कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयोजन स्थल पर अलग-अलग सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की भी सक्रिय मौजूदगी देखने को मिली।
सम्मेलन के दौरान कई वक्ताओं ने यह भी कहा कि सामाजिक न्याय केवल चुनावी मुद्दा नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रशासनिक व्यवस्था से जोड़कर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक समाज के सभी वर्गों को बराबरी का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक वास्तविक विकास संभव नहीं है।
भागलपुर के सुल्तानगंज में आयोजित इस समता अधिकार सम्मेलन को सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कार्यक्रम ने एक बार फिर सामाजिक न्याय, संविधानिक अधिकार और बराबरी की बहस को केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में ऐसे आयोजनों के जरिए सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर जनजागरूकता बढ़ाने की कोशिश और तेज हो सकती है।


