
भागलपुर। बिहार में प्रखंड स्तर पर स्थापित किए जा रहे नए डिग्री कॉलेजों में उर्दू और मैथिली विषय को शामिल नहीं किए जाने को लेकर राजनीतिक और शैक्षणिक बहस तेज हो गई है। नाथनगर विधानसभा क्षेत्र से राजद के पूर्व विधायक प्रत्याशी रहे ने राज्य सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे भाषाई और शैक्षणिक भेदभाव बताया है। उन्होंने मांग की है कि बिहार के सभी 211 नवस्थापित डिग्री कॉलेजों में उर्दू और मैथिली विषय की पढ़ाई तत्काल शुरू की जाए, ताकि इन भाषाओं से जुड़े विद्यार्थियों और शिक्षकों को समान अवसर मिल सके।
जारी बयान में एस जेड हसन ने कहा कि बिहार सरकार ने प्रखंड स्तर पर डिग्री कॉलेज स्थापित करने का जो निर्णय लिया, वह शिक्षा विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। लेकिन इन कॉलेजों में जिन 17 विषयों को शामिल किया गया है, उनमें उर्दू और मैथिली को जगह नहीं देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि बिहार की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान में इन दोनों भाषाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, ऐसे में इन्हें नजरअंदाज करना लाखों विद्यार्थियों की भावनाओं के साथ अन्याय है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की इस नीति से न केवल उर्दू और मैथिली पढ़ने वाले छात्रों का भविष्य प्रभावित होगा, बल्कि उन योग्य शिक्षकों को भी नुकसान पहुंचेगा जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रोफेसर बनने की तैयारी की है। उनके अनुसार राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे युवा मौजूद हैं जिन्होंने उर्दू और मैथिली विषय में पीएचडी तथा अन्य उच्च डिग्रियां हासिल की हैं, लेकिन कॉलेजों में इन विषयों की पढ़ाई शुरू नहीं होने के कारण उनके रोजगार के अवसर सीमित हो रहे हैं।
एस जेड हसन ने कहा कि यह स्थिति केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि भाषा और संस्कृति से जुड़े अधिकारों का भी सवाल है। उन्होंने कहा कि उर्दू और मैथिली दोनों बिहार की ऐतिहासिक भाषाएं हैं और लाखों लोग इन्हें अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते और पढ़ते हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थानों में इन विषयों की उपेक्षा करना सामाजिक असंतुलन को बढ़ावा दे सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार इन विषयों को कॉलेजों में शामिल नहीं करती है तो आने वाले समय में छात्रों का इन भाषाओं की ओर रुझान कम हो सकता है। इससे भाषाई विरासत पर भी असर पड़ने की आशंका है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि शिक्षा नीति बनाते समय सभी भाषाओं और समुदायों के हितों को समान महत्व दिया जाए।
राजद नेता ने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था के कारण उर्दू और मैथिली से जुड़े विद्यार्थी खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि राज्य के कई छात्र केवल इसलिए इन विषयों की पढ़ाई आगे नहीं बढ़ा पा रहे क्योंकि कॉलेज स्तर पर पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने इसे “गहरी साजिश” बताते हुए कहा कि यदि किसी भाषा को शिक्षा व्यवस्था से धीरे-धीरे बाहर किया जाता है तो उसका सीधा असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है।
उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल परिवार की ओर से मांग करते हुए कहा कि सरकार तुरंत निर्णय लेकर उर्दू और मैथिली को डिग्री कॉलेजों के विषयों की सूची में शामिल करे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को किसी भी भाषा या समुदाय के साथ भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपनाना चाहिए।
एस जेड हसन ने बिहार के शिक्षाविदों, साहित्यकारों और सामाजिक संगठनों से भी इस मुद्दे पर आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह केवल किसी एक समुदाय या राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं बल्कि शिक्षा और भाषा संरक्षण से जुड़ा व्यापक सवाल है। यदि समाज सामूहिक रूप से आवाज उठाएगा तो सरकार पर सकारात्मक दबाव बनेगा और छात्रों को उनका अधिकार मिल सकेगा।
शिक्षा विशेषज्ञों का भी मानना है कि बिहार जैसे बहुभाषी राज्य में क्षेत्रीय और पारंपरिक भाषाओं को बढ़ावा देना जरूरी है। मैथिली भाषा पहले से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है और उर्दू को भी बिहार में दूसरी राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थानों में इन विषयों की अनुपस्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने की बात कही गई है। इसके बावजूद यदि कॉलेजों में इन विषयों को शामिल नहीं किया जाता तो यह नीति के उद्देश्यों के विपरीत माना जा सकता है। कई शिक्षकों का कहना है कि उर्दू और मैथिली साहित्य, इतिहास और संस्कृति के अध्ययन के लिए समर्पित विभागों की आवश्यकता है, ताकि नई पीढ़ी अपनी भाषाई विरासत से जुड़ी रह सके।
बिहार के कई जिलों में उर्दू और मैथिली बोलने वालों की बड़ी आबादी है। भागलपुर, दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार और मुजफ्फरपुर जैसे क्षेत्रों में इन भाषाओं की मजबूत उपस्थिति देखी जाती है। ऐसे में स्थानीय छात्रों को अपनी पसंद के विषयों में उच्च शिक्षा का अवसर मिलना जरूरी माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा बिहार की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था में बड़ा विषय बन सकता है। विपक्षी दल इसे सरकार की नीतियों से जोड़कर जनता के बीच ले जा सकते हैं, वहीं सरकार पर भी सभी भाषाई समुदायों को संतुलित प्रतिनिधित्व देने का दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल राज्य सरकार की ओर से इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन उर्दू और मैथिली विषय को लेकर उठ रही आवाजों ने शिक्षा जगत में नई बहस जरूर शुरू कर दी है। अब देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या फैसला लेती है और नए डिग्री कॉलेजों में इन भाषाओं को स्थान मिलता है या नहीं।


