वैश्विक संकट के बीच जैविक खेती पर बिहार का बड़ा फोकस, रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में उभरेगा ऑर्गेनिक डीएपी

बंगलौर/पटना, 21 मई 2026। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, उर्वरकों की बढ़ती कीमतों और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच बिहार सरकार अब प्राकृतिक और जैविक खेती को कृषि विकास का नया आधार बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इसी क्रम में बिहार के कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने बंगलौर का दौरा कर जैविक उर्वरकों और ऑर्गेनिक डीएपी की आधुनिक तकनीकों का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने ‘श्री श्री एग्रीकल्चर ट्रस्ट’ द्वारा विकसित पेटेंटेड जैविक डीएपी और अन्य जैविक खादों की विस्तृत जानकारी प्राप्त की तथा इसे किसानों के लिए भविष्य का मजबूत विकल्प बताया।

कृषि मंत्री का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण खाद और ईंधन की उपलब्धता तथा लागत को लेकर कई देशों में चिंता बढ़ रही है। मध्य पूर्व में जारी तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर उसके प्रभाव को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में उर्वरक और ईंधन की खपत में 50 प्रतिशत तक कमी लाने का आह्वान किया है। बिहार सरकार अब इसी दिशा में जैविक खेती को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है।

बंगलौर स्थित ‘श्री श्री एग्रीकल्चर ट्रस्ट’ में आयोजित बैठक के दौरान कृषि मंत्री ने वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के साथ लंबी चर्चा की। बैठक में जैविक डीएपी की उत्पादन प्रक्रिया, उसकी गुणवत्ता, खेती पर प्रभाव, लागत में कमी और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने की क्षमता पर विस्तार से विचार किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि यह जैविक उर्वरक रासायनिक खादों के मुकाबले पर्यावरण के लिए अधिक सुरक्षित और किसानों के लिए दीर्घकालिक रूप से लाभकारी साबित हो सकता है।

कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि आने वाले समय में जैविक उर्वरक खेती की दिशा बदल सकते हैं। उन्होंने कहा कि रासायनिक खादों के लगातार बढ़ते उपयोग ने मिट्टी की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित किया है। यदि कृषि को टिकाऊ बनाना है तो अब प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर बढ़ना समय की आवश्यकता बन चुकी है।

उन्होंने कहा कि बिहार सरकार पहले से ही राज्य में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है। कृषि रोड मैप के माध्यम से किसानों को जैविक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त करें और रासायनिक उर्वरकों पर उनकी निर्भरता घटे।

कृषि मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित हो रही है। कई इलाकों में मिट्टी की उर्वरता घट रही है और जल स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करना है तो खेती को पर्यावरण के अनुकूल बनाना होगा। जैविक उर्वरक इस दिशा में एक प्रभावी विकल्प साबित हो सकते हैं।

बंगलौर दौरे के दौरान कृषि मंत्री ने विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु रविशंकर से भी मुलाकात की और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। यह मुलाकात आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के 45 वर्ष पूरे होने और रविशंकर के 70वें जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित विशेष समारोह के दौरान हुई। इस समारोह में देश के कई प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक नेताओं ने भाग लिया।

कार्यक्रम में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत, महाराष्ट्र के सिंचाई मंत्री समेत महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के कई मंत्री मौजूद रहे। समारोह में कृषि, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को लेकर भी चर्चा हुई। कई नेताओं ने माना कि भविष्य में जैविक खेती और प्राकृतिक उर्वरकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जैविक खेती केवल स्वास्थ्य और पर्यावरण का विषय नहीं है, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता से भी जुड़ा मुद्दा है। देश हर साल बड़ी मात्रा में रासायनिक उर्वरकों के आयात पर भारी खर्च करता है। यदि जैविक विकल्पों का बड़े स्तर पर उत्पादन और उपयोग शुरू होता है तो इससे आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।

बिहार सरकार का मानना है कि जैविक खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगी। इससे किसानों की लागत कम होगी और खेती अधिक लाभकारी बन सकेगी। साथ ही जैविक उत्पादों की बाजार में बढ़ती मांग किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद करेगी। राज्य सरकार आने वाले समय में किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और विपणन सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना पर भी काम कर रही है।

कृषि मंत्री ने कहा कि बिहार के किसान हमेशा नई तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। यदि उन्हें सही मार्गदर्शन और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं तो राज्य जैविक खेती के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकता है। उन्होंने कहा कि बंगलौर में विकसित तकनीक बिहार के कृषि रोड मैप को और मजबूत बनाएगी।

विशेषज्ञों के अनुसार जैविक डीएपी का उपयोग मिट्टी की जैविक संरचना को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है। इससे फसलों की गुणवत्ता में सुधार, जल संरक्षण और भूमि की दीर्घकालिक उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। किसानों को इससे कम लागत में बेहतर उत्पादन मिलने की संभावना भी जताई जा रही है।

राज्य सरकार अब इस दिशा में संभावनाओं का अध्ययन कर रही है कि किस प्रकार इन जैविक उत्पादों को बिहार के विभिन्न जिलों तक पहुंचाया जाए। कृषि विभाग का मानना है कि यदि गांव स्तर पर जैविक उर्वरकों का उत्पादन और उपयोग बढ़ता है तो इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने विश्वास जताया कि बिहार के किसान इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने कहा कि जैविक खेती केवल एक विकल्प नहीं बल्कि भविष्य की आवश्यकता है। यदि राज्य में प्राकृतिक खेती को व्यापक स्तर पर अपनाया जाता है तो इससे किसानों की आय बढ़ेगी, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और देश को उर्वरकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी बड़ा कदम साबित होगा।

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