
नई दिल्ली, 21 मई 2026। खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने इस वर्ष ‘विश्व मधुमक्खी दिवस-2026’ को एक नए और आधुनिक अंदाज में मनाते हुए देशभर में वर्चुअल माध्यम से कई कार्यक्रम आयोजित किए। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत केवीआईसी ने मुंबई स्थित मुख्यालय, विभिन्न राज्य और मंडलीय कार्यालयों तथा पुणे स्थित केंद्रीय मधुमक्खी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (सीबीआरटीआई) में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कार्यक्रमों का आयोजन किया। इस अवसर पर मधुमक्खी पालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत माध्यम बताया गया।
कार्यक्रम को नई दिल्ली स्थित गांधी दर्शन कार्यालय से केवीआईसी अध्यक्ष मनोज कुमार ने वर्चुअल माध्यम से संबोधित किया। इस दौरान देशभर के मधुमक्खी पालक, वैज्ञानिक, विद्यार्थी, अधिकारी, कर्मचारी, प्रशिक्षार्थी और लाभार्थी ऑनलाइन जुड़े। कार्यक्रम के दौरान पुणे स्थित सीबीआरटीआई में आयोजित ‘हनी प्रदर्शनी’ का उद्घाटन भी डिजिटल माध्यम से किया गया। इस वर्ष विश्व मधुमक्खी दिवस की थीम “Bee Together for People and the Planet” रखी गई, जिसके तहत पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता में मधुमक्खियों की भूमिका पर विशेष चर्चा हुई।
कार्यक्रम में बोलते हुए मनोज कुमार ने कहा कि इस बार आयोजन को पूरी तरह वर्चुअल स्वरूप देने के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और ऊर्जा संरक्षण का संदेश प्रमुख प्रेरणा रहा। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यम अपनाने से न केवल यात्रा और ईंधन की बचत हुई, बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों से हजारों प्रतिभागियों की भागीदारी भी सुनिश्चित हो सकी। इससे समय, संसाधन और खर्च तीनों की बचत हुई।
उन्होंने कहा कि मधुमक्खियां केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कृषि व्यवस्था और पर्यावरण संतुलन की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। फसलों के परागण में उनकी भूमिका खेती की उत्पादकता को बढ़ाने में अहम होती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘श्वेत क्रांति से स्वीट क्रांति’ के विजन का उल्लेख करते हुए कहा कि इस सोच ने गांवों में स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता को नई दिशा दी है। आज मधुमक्खी पालन ग्रामीण युवाओं, किसानों और महिलाओं के लिए आय का मजबूत स्रोत बनता जा रहा है।
केवीआईसी अध्यक्ष ने बताया कि प्रधानमंत्री ने वर्ष 2016 में गुजरात के बनासकांठा से ‘स्वीट क्रांति’ का आह्वान किया था। उस समय उन्होंने कहा था कि जहां देश में श्वेत क्रांति ने डेयरी क्षेत्र को मजबूत किया, वहीं अब स्वीट क्रांति गांवों में नई आर्थिक ऊर्जा लेकर आएगी। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए केवीआईसी ने वर्ष 2017 में ‘हनी मिशन’ की शुरुआत की। आज यह मिशन ग्रामीण भारत में रोजगार सृजन और स्वरोजगार का एक बड़ा माध्यम बन चुका है।
उन्होंने जानकारी दी कि वर्ष 2017-18 से लेकर 2025-26 तक केवीआईसी द्वारा देशभर में लगभग 2.5 लाख बी-बॉक्स और बी-कालोनियों का वितरण किया जा चुका है। इस पहल से हजारों ग्रामीण परिवारों को रोजगार मिला है और शहद उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में लगभग 24,269 मीट्रिक टन शहद उत्पादन को बढ़ावा मिला। वहीं, वर्ष 2025-26 में शहद उत्पादन का अनुमान बढ़कर 5,512 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।
केवीआईसी के अनुसार भारतीय शहद की वैश्विक मांग भी लगातार बढ़ रही है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में केवीआईसी से जुड़े मधुमक्खी पालकों ने करीब 31 करोड़ रुपये मूल्य के शहद का निर्यात किया। भारतीय शहद अमेरिका, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात, इजराइल, सऊदी अरब, ओमान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, कतर और कोरिया रिपब्लिक सहित कई देशों में भेजा गया। अधिकारियों का कहना है कि भारतीय शहद की गुणवत्ता और प्राकृतिक उत्पादन पद्धति को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से स्वीकार्यता मिल रही है।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि मधुमक्खी पालन केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी प्रभावी माध्यम है। वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया की बड़ी आबादी कृषि उत्पादन पर निर्भर है और कृषि उत्पादन में परागण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मधुमक्खियां इस प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती हैं। यदि मधुमक्खियों की संख्या में गिरावट आती है तो इसका असर खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता पर भी पड़ सकता है।
कार्यक्रम के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े मधुमक्खी पालकों ने अपने अनुभव साझा किए। कई लाभार्थियों ने बताया कि ‘हनी मिशन’ से जुड़ने के बाद उनकी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कुछ प्रतिभागियों ने यह भी बताया कि खेती के साथ मधुमक्खी पालन शुरू करने से फसलों की पैदावार में भी सुधार हुआ। ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि मधुमक्खी पालन ने उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है।
विशेषज्ञों ने कार्यक्रम में आधुनिक बी-कीपिंग तकनीकों, शहद की गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार विस्तार पर भी चर्चा की। प्रशिक्षार्थियों को डिजिटल माध्यम से मधुमक्खी पालन के नए तरीकों और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी गई। कार्यक्रम में बैंक प्रतिनिधियों और राज्य सरकारों के अधिकारियों ने भी भाग लिया और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए सहयोग का भरोसा दिया।
मनोज कुमार ने देशभर के मधुमक्खी पालकों से अपील करते हुए कहा कि वे मधुमक्खी पालन को केवल शहद तक सीमित न रखें। उन्होंने कहा कि यह प्रकृति संरक्षण, खेती की उन्नति और ग्रामीण समृद्धि का सशक्त माध्यम है। उन्होंने युवाओं और किसानों से अधिक संख्या में इस क्षेत्र से जुड़ने का आह्वान किया ताकि ‘स्वीट क्रांति’ को देश के हर गांव तक पहुंचाया जा सके।
उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में गांवों और कुटीर उद्योगों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। मधुमक्खी पालन जैसे छोटे लेकिन प्रभावी उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में अहम योगदान दे सकते हैं। केवीआईसी आने वाले समय में भी प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और विपणन सहयोग के जरिए इस क्षेत्र को और मजबूत बनाने की दिशा में काम करता रहेगा।
विश्व मधुमक्खी दिवस-2026 के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम न केवल पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास का संदेश देने वाला रहा, बल्कि यह भी दर्शाता है कि आधुनिक तकनीक और डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर बड़े स्तर पर जनभागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। केवीआईसी का यह प्रयास ‘स्वीट क्रांति’ को नई गति देने और ग्रामीण भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


