तकनीक और एआई के जरिए जनजातीय विकास को नई दिशा देने की पहल, पटना में आयोजित हुई विशेष कार्यशाला

पटना, 20 मई 2026। बिहार में जनजातीय समुदायों के विकास को तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। जनजातीय गरिमा उत्सव 2026 के अवसर पर बिहार राज्य अनुसूचित जनजाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान, पटना द्वारा “तकनीक आधारित जनजातीय विकास” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में सरकार, तकनीकी संस्थानों, शोधकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और जनजातीय समाज के विकास में आधुनिक तकनीक की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम का उद्देश्य यह समझना था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा नवाचार और तकनीकी प्लेटफॉर्म के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, आजीविका, प्रशासन और सरकारी योजनाओं की पहुंच को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि यदि तकनीक का सही उपयोग किया जाए, तो दूरदराज के जनजातीय इलाकों में विकास की गति को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार सरकार के अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदायों के विकास के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उन योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

उन्होंने कहा कि तकनीकी नवाचार और शोध को जमीनी जरूरतों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सरकार की कोशिश है कि जनजातीय समाज को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए ताकि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकें।

मंत्री ने कहा कि बिहार के कई जनजातीय क्षेत्र अब भी संसाधनों और सूचनाओं की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में डिजिटल प्लेटफॉर्म और एआई आधारित तकनीकें सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने अधिकारियों और विशेषज्ञों से ऐसी कार्य योजनाएं तैयार करने की अपील की जो सीधे जमीनी स्तर पर असर डाल सकें।

कार्यक्रम में विभागीय सचिव ने भी प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समूहों तक सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाना आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई बार जानकारी के अभाव में लोग योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते।

उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक इस अंतर को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। यदि सही डेटा और तकनीकी साधनों का उपयोग किया जाए, तो सरकारी योजनाओं की मॉनिटरिंग और लाभार्थियों तक पहुंच दोनों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

कार्यशाला में विभिन्न तकनीकी संस्थानों और संगठनों के विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। के प्रोफेसर ने जनजातीय विकास में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि एआई आधारित तकनीक के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सेवाओं को दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि डेटा विश्लेषण और स्मार्ट टेक्नोलॉजी की मदद से जनजातीय समुदायों की जरूरतों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इससे योजनाओं को अधिक प्रभावी और लक्ष्य आधारित बनाया जा सकेगा।

आईआईटी पटना के सहायक प्रोफेसर ने ऊर्जा क्षेत्र में नवाचार आधारित विकास पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि सौर ऊर्जा और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग जनजातीय क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। दूरदराज के इलाकों में ऊर्जा उपलब्धता बढ़ने से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

कार्यक्रम में FILO ऐप के प्रतिनिधि ने जनजातीय शिक्षा में एआई के उपयोग पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि डिजिटल शिक्षा प्लेटफॉर्म और भाषा आधारित तकनीक के माध्यम से जनजातीय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है।

उन्होंने बताया कि कई जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षकों और संसाधनों की कमी है। ऐसे में एआई आधारित शिक्षण प्रणाली बच्चों को बेहतर सीखने का अवसर दे सकती है। इससे शिक्षा में असमानता कम करने में मदद मिलेगी।

यानी सी-डैक के प्रतिनिधि ने डिजिटल इंडिया और इनोवेटिंग इंटेलिजेंस विषय पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक के जरिए सरकारी सेवाओं को अधिक पारदर्शी और सुलभ बनाया जा सकता है।

गैर सरकारी संस्था के प्रतिनिधि ने ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ीकरण में तकनीक की भूमिका पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि तकनीक के माध्यम से कृषि, हस्तशिल्प और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देकर जनजातीय समुदायों की आर्थिक स्थिति मजबूत की जा सकती है।

कार्यशाला में वाधवानी एआई समूह की ने भी जनजातीय विकास में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि एआई आधारित मॉडल स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण, शिक्षा और प्रशासनिक निगरानी में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

जनजातीय कार्य मंत्रालय की तकनीकी टीम ने एआई चैटबॉट और FRA तकनीक विकास पर जानकारी साझा की। विशेषज्ञों ने बताया कि चैटबॉट जैसी तकनीकें स्थानीय भाषाओं में लोगों को योजनाओं की जानकारी देने में उपयोगी हो सकती हैं।

आईआईटी पटना की सहायक प्रोफेसर ने लुप्तप्राय जनजातीय भाषाओं और तकनीकी एकीकरण पर प्रस्तुति दी। उन्होंने कहा कि कई जनजातीय भाषाएं धीरे-धीरे खत्म होने के खतरे का सामना कर रही हैं। डिजिटल तकनीक और एआई के जरिए इन भाषाओं को संरक्षित किया जा सकता है।

कार्यक्रम में बिहार के 24 जनजातीय जिलों से आए प्रखंड कल्याण पदाधिकारी और विभागीय अधिकारी भी शामिल हुए। प्रतिभागियों ने जमीनी स्तर की चुनौतियों और तकनीकी समाधानों पर चर्चा की। कई अधिकारियों ने कहा कि यदि तकनीक को स्थानीय जरूरतों के अनुसार लागू किया जाए, तो जनजातीय क्षेत्रों में विकास की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में एआई और डिजिटल तकनीक जनजातीय विकास की दिशा बदल सकते हैं। हालांकि इसके लिए इंटरनेट पहुंच, डिजिटल साक्षरता और स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण जैसी चुनौतियों को भी दूर करना होगा। बिहार सरकार की यह पहल जनजातीय समुदायों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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