
पटना, 18 मई 2026। बिहार में सामाजिक समरसता को प्रभावित करने वाले और न्यायालयों में मुकदमों का अंबार खड़ा करने वाले भूमि विवादों के स्थाई व त्वरित समाधान की दिशा में राज्य सरकार ने एक अत्यंत बड़ा और दूरगामी नीतिगत निर्णय लिया है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के स्तर से सूबे के भूमि न्यायाधिकरण के संगठनात्मक ढांचे को नया और शक्तिशाली स्वरूप प्रदान किया गया है। राज्य सरकार ने एक विधिक विलेख के माध्यम से बिहार भूमि न्यायाधिकरण (बिहार लैंड ट्रिब्यूनल) के सदस्यों की कुल निर्धारित संख्या को चार से बढ़ाकर अब सात कर दिया है। इसके समानांतर ही न्यायाधिकरण के भीतर रिक्त पड़े और पुनर्गठित किए गए पदों को भरने के उद्देश्य से पांच नए प्रतिष्ठित न्यायिक सदस्यों की विधिवत नियुक्ति भी कर दी गई है। इस बड़े प्रशासनिक विन्यास का मुख्य ध्येय लंबित वादों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करना और आम नागरिकों को न्याय प्राप्त करने के प्रक्रम में होने वाली दीर्घकालिक प्रशासनिक व मानसिक प्रताड़ना से विधिक मुक्ति दिलाना है।
अधिनियम 2009 के प्रावधानों के तहत पुनर्गठन, सचिव ने जारी की अधिसूचना
इस महत्वपूर्ण सांगठनिक बदलाव और विधिक प्रणालियों के विस्तार के संदर्भ में विस्तृत विवरणी साझा करते हुए राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने बताया कि राज्य सरकार बिहार की धरती पर भूमि संबंधी विसंगतियों और मुकदमों के बोझ को न्यूनतम करने के लिए पूरी कड़ाई के साथ प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आम जनमानस को सुगमता से और अत्यंत अल्प समय के भीतर न्याय उपलब्ध कराने की रणनीतियों के तहत ही यह बड़ा कदम उठाया गया है। राजस्व मंत्री के अनुसार, बिहार भूमि न्यायाधिकरण अधिनियम, 2009 के भीतर निहित विधिक प्रावधानों और शक्तियों का प्रयोग करते हुए ही न्यायाधिकरण के कुल सदस्यों की संचयी संख्या को पुनर्निर्धारित कर सात के स्तर पर संधारित किया गया है।
इस सांगठनिक सुदृढ़ीकरण से न्यायाधिकरण की कार्यक्षमता और विभिन्न पीठों (बेंचेज) के गठन की प्रविधि में अभूतपूर्व तेजी आएगी। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव जय सिंह के हस्ताक्षर से इस संदर्भ में आधिकारिक विधिक अधिसूचना प्रमंडलीय मुख्यालयों और संबंधित विभावों को प्रेषित कर दी गई है। अधिसूचना में साफ किया गया है कि यह निर्णय राज्य मंत्रिपरिषद और सक्षम प्राधिकारी की विधिक स्वीकृति के उपरांत ही धरातल पर क्रियान्वित किया गया है, जिससे भूमि विवादों के अपीलीय मामलों के निष्पादन के ग्राफ में बड़ा उछाल आना तय माना जा रहा है।
पांच नए न्यायिक सदस्यों की प्रतिनियुक्ति, सेवानिवृत्त न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल
बिहार भूमि न्यायाधिकरण, पटना को और अधिक सक्षम, निष्पक्ष और विधिक रूप से सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से जिन पांच नए न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की गई है, उनमें देश की न्यायपालिका और वकालत के क्षेत्र में लंबा व प्रतिष्ठित अनुभव रखने वाले कप्तानों को शामिल किया गया है। नियुक्त किए गए नए न्यायिक सदस्यों का आधिकारिक विलेख इस प्रकार है:
- मनोज कुमार: सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, किशनगंज। न्यायदान की प्रणालियों और राजस्व विलेखों की समीक्षा में इनका लंबा न्यायिक अनुभव रहा है।
- किशोर प्रसाद: सेवानिवृत्त प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पूर्णिया। सीमांचल और पूर्वी बिहार के भूमि संबंधी मुकदमों के व्यावहारिक विन्यासों पर इनकी गहरी कड़क पकड़ मानी जाती है।
- कुमार नवीनम: माननीय उच्च न्यायालय पटना के प्रतिष्ठित और वरिष्ठ अधिवक्ता। संवैधानिक मामलों और दीवानी कानूनों के विशेषज्ञ के रूप में इनकी साख संधारित है।
- रवीन्द्र पटवारी: सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, गया। मगध प्रक्षेत्र सहित विभिन्न जिलों में जटिल दीवानी मुकदमों के त्वरित निष्पादन के लिए जाने जाते हैं।
- रविन्द्र राय: माननीय उच्च न्यायालय पटना के वरिष्ठ और अनुभवी अधिवक्ता, जिन्हें भूमि कानूनों और राजस्व नियमावलियों के विधिक विश्लेषण का लंबा अनुभव प्राप्त है।
राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि इन पांचों नए विधिवेत्ताओं के न्यायाधिकरण ग्रिड में शामिल होने से लंबित वादों की कड़ियों को पूरी कड़ाई से समय सीमा के भीतर सुलझाया जा सकेगा, जिससे आम जनता को लंबे समय तक तारीखों के चक्रव्यूह में फंसकर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
लंबित वादों का त्वरित निपटारा और न्याय प्रणालियों का आधुनिकीकरण
बिहार के भीतर राजस्व और सिविल अदालतों के आंकड़ों का तकनीकी विश्लेषण करने पर यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि अधिकांश फौजदारी और दीवानी मुकदमों की मूल जड़ कहीं न कहीं भूमि विवादों, त्रुटिपूर्ण म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) और पैतृक संपत्तियों के अनियोजित संरेखण से जुड़ी होती है। भूमि न्यायाधिकरण के पास विभिन्न राजस्व न्यायालयों से अपील के माध्यम से आने वाले वादों का एक विशाल डेटाबेस लंबित संधारित है। सदस्यों की संख्या में इस अभूतपूर्व वृद्धि के बाद अब न्यायाधिकरण के भीतर एक साथ कई समानांतर खंडपीठों का संचालन सुगमता से किया जा सकेगा।
इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव यह होगा कि मुकदमों की दैनिक सुनवाई की संख्या दोगुनी हो जाएगी और जो वाद वर्षों से प्रशासनिक लालफीताशाही या कोरम के अभाव के कारण अटके हुए थे, उनका ऑन-स्पॉट विधिक निस्तारण संभव हो सकेगा। सरकार का मुख्य नीतिगत ध्येय यह है कि भूमि सुधारों के डिजिटल दौर में जब जमीनों के रिकॉर्ड्स को ऑनलाइन संधारित किया जा रहा है, तो उनके विधिक विवादों का फैसला भी पूरी तरह से हाई-टेक और पारदर्शी प्रणालियों के तहत अत्यंत तीव्र गति से सुनिश्चित किया जा सके ताकि नागरिकों का समय और धन दोनों सुरक्षित रहें।
राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता और भूमि सुधारों का एकीकृत ग्रिड
राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने कड़े शब्दों में संदेश जारी करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार भूमि विवादों के पूर्ण और स्थाई समाधान को अपने प्रशासनिक एजेंडे में सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर पर रख रही है। न्यायाधिकरण को मानव संसाधन और न्यायिक शक्तियों से पूरी तरह संपन्न बनाकर सरकार आम नागरिकों को त्वरित, प्रभावी और निष्पक्ष न्याय उपलब्ध कराने के अपने संकल्प को धरातल पर प्रमाणित कर रही है। यह नया ढांचागत विस्तार वास्तव में राज्य सरकार की अन्य भूमि सुधार पहलों जैसे कि डिजिटल लैंड सर्वे, परिमार्जन पोर्टल के सुदृढ़ीकरण और थानों व अंचलों में आयोजित होने वाले संयुक्त विवाद निवारण शिविरों के साथ एक एकीकृत ग्रिड के रूप में कार्य करेगा।
विभागीय सचिव जय सिंह ने सभी नए नियुक्त सदस्यों का स्वागत करते हुए निर्देश दिया है कि वे अविलंब न्यायाधिकरण में अपना योगदान संधारित कर लंबित मुकदमों के वर्गीकरण और उनकी त्वरित सुनवाई का कैलेंडर तैयार करें। सरकार की मंशा साफ है कि भूमि की विसंगतियों को पूरी तरह से ब्लॉक कर बिहार के ग्रामीण और शहरी प्रक्षेत्रों में एक पारदर्शी, सुरक्षित और विवाद-मुक्त माहौल का विन्यास तैयार किया जा सके, जिससे निवेश और आजीविका के नए मार्ग भी सुगम हो सकें। इस महत्वपूर्ण विधिक बदलाव के दौर में विभाग के सभी वरीय नीतिगत योजनाकार पूरी कड़ाई और मुस्तैदी के साथ अनुपालन सुनिश्चित करने में जुटे हुए हैं।


