​बिहार में अगले छह महीने में पूरी तरह डिजिटल होगा अपराध अनुसंधान: सीआईडी एडीजी पारसनाथ ने आधुनिक तकनीकी खाके का किया अनावरण

पटना, 18 मई 2026। बिहार में कानून-व्यवस्था की प्रणालियों को आधुनिक चुनौतियों के अनुरूप ढालने और आपराधिक मामलों के निपटारे में अभूतपूर्व तेजी लाने के लिए विधि-व्यवस्था के ढांचे में एक बड़ा युगांतरकारी परिवर्तन होने जा रहा है। राज्य के भीतर संचालित होने वाले संपूर्ण अपराध अनुसंधान (क्राइम इन्वेस्टिगेशन) के प्रक्रम को आगामी 5 से 6 महीनों के भीतर पूरी तरह से डिजिटल ग्रिड के अंतर्गत लाने की एक वृहद् नीतिगत योजना तैयार की गई है। पुलिस मुख्यालय स्थित सरदार पटेल भवन के मुख्य सभागार में सोमवार को आयोजित एक विशेष प्रेस वार्ता के दौरान अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) के अपर महानिदेशक (एडीजी) पारसनाथ ने इस महत्वाकांक्षी डिजिटल रोडमैप का विस्तृत खाका देश के सामने रखा।

​उन्होंने स्पष्ट किया कि समकालीन दौर में अपराधियों पर प्रभावी नकेल कसने और न्याय प्रणालियों को सुदृढ़ करने का एकमात्र सशक्त जरिया वैज्ञानिक अनुसंधानों को बढ़ावा देना और जांच में लगने वाले समय को न्यूनतम स्तर पर संधारित करना है। सीआईडी इस दिशा में न केवल नए तकनीकी उपकरणों और पोर्टल्स का समावेश कर रही है, बल्कि मैदानी स्तर पर तैनात जांच अधिकारियों को इन प्रणालियों के संचालन के लिए कड़ा प्रशिक्षण भी प्रदान कर रही है ताकि वास्तविक दोषियों के खिलाफ समयबद्ध विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।

वैज्ञानिक अनुसंधान विधा के तहत छह बैचों में 2018 पुलिस पदाधिकारियों का कड़ा प्रशिक्षण

​अपराध जांच की गुणवत्ता को वैश्विक मानकों के समकक्ष ले जाने के लिए सीआईडी के स्तर से मानव संसाधन के तकनीकी उन्नयन पर विशेष फोकस किया गया है। एडीजी पारसनाथ ने बताया कि विभाग द्वारा वर्तमान समय में 12 दिवसीय एक अत्यंत विशिष्ट और सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन किया जा रहा है। इस विशेष ट्रेनिंग मॉड्यूल का मुख्य ध्येय पारंपरिक और लिपिकीय प्रणालियों पर निर्भर रहने वाले पुलिस कर्मियों को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की बारीकियों, फॉरेंसिक साक्ष्य संकलन की विधियों और डिजिटल उपकरणों के विधिक उपयोग के प्रति पूरी तरह पारदर्शी और कुशल बनाना है।

​इस प्रशिक्षण अभियान की प्रगति रिपोर्ट साझा करते हुए उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष से शुरू हुए इस सांगठनिक प्रयास के तहत अब तक कुल 6 अलग-अलग बैचों के माध्यम से राज्य के 2018 पुलिस पदाधिकारियों को वैज्ञानिक अनुसंधान का कड़ा प्रशिक्षण मुहैया कराया जा चुका है। इन प्रशिक्षित अधिकारियों में थानों के अनुसंधानकर्ता, पुलिस निरीक्षक और तकनीकी विंग के कप्तान शामिल हैं। इस प्रशिक्षण विलेख के पूर्ण होने से थानों के स्तर पर दर्ज होने वाले आपराधिक मामलों के साक्ष्य संकलन में होने वाली मानवीय और तकनीकी त्रुटियों को पूरी तरह से ब्लॉक किया जा सकेगा, जिससे न्यायालयों में मामलों के कनविक्शन रेट (दोषसिद्धि दर) में उल्लेखनीय सुधार होना तय है।

सीसीटीएनएस प्रणालियों का सघन विस्तार: 968 थानों के आंकड़ों का लाइव विन्यास

​राज्य भर के थानों में सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान और पारदर्शी रिकॉर्ड प्रबंधन के लिए क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम (सीसीटीएनएस) को अपराध जांच का मुख्य आधार स्तंभ बनाया गया है। एडीजी ने आंकड़ों के माध्यम से स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में बिहार के कुल 968 थाने सीसीटीएनएस पोर्टल से पूरी कड़ाई के साथ एकीकृत हो चुके हैं, जहां अनुसंधानकर्ताओं द्वारा मामलों के हर एक अपडेट को सीधे सर्वर पर अपलोड किया जा रहा है। प्रक्षेत्र के शेष बचे हुए कतिपय थानों को भी आगामी कुछ ही सप्ताह के भीतर इस नेटवर्क ग्रिड से जोड़ने के लिए बुनियादी ढांचागत विन्यास को तेज कर दिया गया है।

​इस डिजिटल एकीकरण के कारण अब कोई भी वरीय अधिकारी या विधिक प्राधिकारी किसी भी मामले की प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर), केस डायरी की दैनिक प्रविष्टियों, चार्जशीट (आरोप पत्र) और अंतिम प्रपत्र (फाइनल फॉर्म) सहित अन्य सभी अनिवार्य कानूनी दस्तावेजों की विवरणी को वास्तविक समय में ऑनलाइन देख और मॉनिटर कर सकता है। इस प्रणाली के क्रियान्वयन से जांच में होने वाली लेटलतीफी के आंकड़ों में भारी सुधार देखा जा रहा है, जिसे वर्तमान वर्ष की पहली तिमाही के संकलित आंकड़ों से समझा जा सकता है:

  • दर्ज प्राथमिकियां (FIR): चालू वर्ष के जनवरी माह में सीसीटीएनएस पोर्टल पर संधारित एफआईआर की संचयी संख्या जहां 26 हजार 335 दर्ज थी, वहीं अप्रैल 2026 तक इसमें क्रमिक प्रगति होते हुए यह ग्राफ बढ़कर 26 हजार 981 तक पहुंच गया है।
  • आरोप पत्र (Charge Sheet): चार्जशीट दाखिल करने की विधा में भी डिजिटल प्रणालियों के कारण उल्लेखनीय तेजी आई है। जनवरी माह में कूटबद्ध आरोप पत्रों की संख्या 26 हजार 660 थी, जो पुलिस की कड़ाई और ऑनलाइन मॉनिटरिंग के बल पर अप्रैल प्रक्षेत्र में छलांग लगाकर 37 हजार 631 के मजबूत स्तर पर संधारित हुई है।
  • केस डायरी प्रविष्टियां: जांच की निरंतरता को प्रमाणित करने वाली केस डायरी की डिजिटल एंट्री के मामलों में भी एक बड़ा उछाल देखा गया है, जिसका संचयी आंकड़ा अप्रैल माह के अंत तक 1 लाख 14 हजार 552 प्रविष्टियों के रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुका है।

‘ई-साक्ष्य’ पोर्टल: इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स की विधिक शुचिता और पूर्ण पारदर्शिता का कवच

​तकनीकी साक्ष्यों के संकलन में विश्वसनीयता बहाल करने और अदालतों में उनकी विधिक वैधता को अकाट्य बनाने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा विकसित किए गए विशिष्ट “ई-साक्ष्य” (e-Sakshya) पोर्टल को बिहार पुलिस के अनुसंधान विन्यास में कड़ाई से अनिवार्य कर दिया गया है। एडीजी पारसनाथ ने इस पोर्टल की तकनीकी खूबियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक अपराधों में मोबाइल फुटेज, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग्स, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) और अन्य डिजिटल विलेख सबसे मुख्य साक्ष्य साबित होते हैं। इन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ किसी भी स्तर पर होने वाली संभावित छेड़छाड़ या कतिपय मानवीय विसंगतियों को रोकने के लिए ई-साक्ष्य पोर्टल एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है।

​चालू वर्ष के जनवरी से लेकर अप्रैल माह तक की संक्षिप्त अवधि के भीतर ही इस हाई-टेक पोर्टल पर राज्य के विभिन्न थानों से जुड़े कुल 68 हजार 844 मामलों के डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को सुरक्षित रूप से अपलोड किया जा चुका है। इसके साथ ही, प्रणालियों के अंतर्विभागीय मिलान को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से इनमें से 13 हजार 587 डिजिटल दस्तावेजों को सीधे उनके संबंधित एफआईआर नंबरों के साथ विधिक रूप से लिंक (एकीकृत) भी कर दिया गया है। इस पारदर्शी प्रविधि के कारण अब मुकदमों की सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के मुकर जाने या तकनीकी आधार पर उनके खारिज होने की संभावनाएं पूरी तरह से समाप्त हो जाएंगी।

मिशन वात्सल्य, ई-प्रिजन और आईसीजेएस के त्रिकोणीय ग्रिड से सुगम हुआ समन्वय

​बिहार पुलिस अनुसंधान की इस पूरी डिजिटल संरचना को केवल थानों तक सीमित न रखकर न्यायपालिका, कारागारों और सामाजिक कल्याण विभावों के साथ एक अभेद्य त्रिकोणीय ग्रिड के रूप में जोड़ा जा रहा है। इस सांगठनिक समावेशन के तहत निम्नलिखित पोर्टल्स का उपयोग निरंतर डेटा अपडेट करने और ऑनलाइन सर्विलांस के लिए किया जा रहा है:

  • मिशन वात्सल्य पोर्टल: सुदूर अंचलों से गुमशुदा हुए या किसी अपराध के पीड़ित हुए नाबालिग बच्चों के मामलों में यह पोर्टल अत्यंत संवेदनशील भूमिका निभा रहा है। इस पोर्टल के विन्यास के तहत पीड़ित बच्चों के पूर्ण शारीरिक विवरण, उनके पारिवारिक इतिहास और ताजा तस्वीरों को अनिवार्य रूप से तत्काल फीड करना होता है, जिससे देश भर के किसी भी कोने में पहचान स्थापित होने पर बच्चों की त्वरित घर वापसी और पुनर्वास सुगमता से सुनिश्चित किया जा सके।
  • ई-प्रिजन प्रणाली (e-Prison): यह पूरी तरह से एक ऑनलाइन और केंद्रीकृत जेल प्रबंधन प्रणाली है। इस डिजिटल विलेख के माध्यम से राज्य की सभी जेलों की आंतरिक अवस्थिति, कैदियों की वर्तमान जेल अवधि, उनकी पेशी के कैलेंडर, स्वास्थ्य विवरणी और कारागार के भीतर की गतिविधियों का संपूर्ण डेटा कंप्यूटर नेटवर्क के माध्यम से संकलित और सुरक्षित रखा जा रहा है, जिससे जेलों से संचालित होने वाले आपराधिक नेटवर्कों को ब्लॉक करने में मदद मिल रही है।
  • इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS): एडीजी ने आईसीजेएस को आधुनिक न्याय व्यवस्था का सबसे क्रांतिकारी माध्यम बताया। इस एकीकृत प्रणाली की मदद से फौजदारी न्याय प्रणाली से जुड़े सभी पांच सबसे अनिवार्य और मुख्य अंग— माननीय अदालतें, पुलिस महकमा, फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL), सरकारी अस्पताल व स्वास्थ्य विंग और जेल प्रशासन— आपस में एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए समन्वय स्थापित कर पाते हैं। इसके कारण फाइलों के डाक से भेजने या रिपोर्ट आने में होने वाले महीनों के विलंब को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।

एनसीआरबी के ‘नाफिस’ (NAFIS) वेब आधारित फिंगरप्रिंट ग्रिड से अपराधियों की धरपकड़ तेज

​प्रेस वार्ता के अंतिम तकनीकी सत्र के दौरान अपराधियों की त्वरित पहचान और उनकी धरपकड़ के लिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा संधारित किए गए नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम यानी “नाफिस” (NAFIS) वेब आधारित पहचान प्रणाली के सफल उपयोग की जानकारी दी गई। एडीजी पारसनाथ ने बताया कि इस केंद्रीयकृत फिंगरप्रिंट डेटाबेस का उपयोग राज्य के सभी थानों और अपराध शाखाओं द्वारा संदिग्धों, अज्ञात शवों और गिरफ्तार किए गए अपराधियों के उंगलियों के निशानों के डिजिटल मिलान के लिए पूरी कड़ाई के साथ किया जा रहा है।

​जब भी किसी घटना स्थल या चोरी, डकैती व मर्डर के प्रक्षेप से फॉरेंसिक टीमों द्वारा कोई फिंगरप्रिंट संकलित किया जाता है, तो उसे तुरंत नाफिस के डिजिटल ग्रिड पर अपलोड कर सर्च में डाल दिया जाता है। यह प्रणाली पलक झपकते ही देश भर के लाखों जेलों और थानों के रिकॉर्ड से मिलान कर अपराधी का पूरा पुराना आपराधिक इतिहास और उसका मूल पता स्क्रीन पर लाइव कर देती है। इस तकनीक के कारण अंतर-राज्यीय और शातिर पहचान बदलकर रहने वाले अपराधियों के छिपने के रास्ते पूरी तरह ब्लॉक हो चुके हैं। सीआईडी मुख्यालय के अनुसार, इन सभी डिजिटल टूल्स, ऑनलाइन पोर्टल्स, अत्याधुनिक मोबाइल एप्लिकेशनों और डेटाबेस प्रणालियों के सांगठनिक एकीकरण के बल पर बिहार पुलिस आने वाले 5 से 6 महीनों के भीतर अपनी पूरी अनुसंधान प्रविधि को शत-प्रतिशत पेपरलेस और डिजिटल करने की कवायद को पूरा करने के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

  • ये भी पढ़े..

    NIFT प्रवेश परीक्षा में भागलपुर के गौरव कुमार सिंह का शानदार प्रदर्शन, हासिल की ऑल इंडिया 577वीं रैंक

    Share Add as a preferred…

    “राबड़ी आवास पर घमासान: ‘हर हाल में बंगला खाली होगा’, सम्राट के ऐलान के बीच कोर्ट जाने की तैयारी में RJD?”

    Share Add as a preferred…