​भागलपुर संग्रहालय में अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर ऐतिहासिक विलेख: नई टेराकोटा दीर्घा का उद्घाटन, पचासवें साल में प्रवेश के साथ गूंजी अंग संस्कृति की साख

भागलपुर, 18 मई 2026। ऐतिहासिक अंग प्रक्षेत्र की प्राचीन सभ्यता, पुरातात्विक समृद्धि और कलात्मक धरोहरों को संजोने वाले मुख्य केंद्र भागलपुर संग्रहालय में सोमवार को अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर एक भव्य और बहुआयामी समारोह का आयोजन किया गया। संग्रहालय परिसर तथा अंग संस्कृति प्रेक्षागृह के विन्यास में आयोजित इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम के दौरान समूचा परिसर अतीत के गौरव और आधुनिक रचनात्मकता के समागम से जीवंत हो उठा। ‘आओ चलें संग्रहालय की ओर’ के विशेष अभियान के तहत आयोजित इस समारोह में विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थाओं के सैकड़ों छात्र-छात्राओं, विश्वविद्यालय के शोधार्थियों, इतिहासकारों और प्रबुद्ध नागरिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

​इस वर्ष भागलपुर संग्रहालय के लिए यह उत्सव और भी ऐतिहासिक है, क्योंकि यह संस्थान अपने अस्तित्व के पचासवें वर्ष यानी ‘गोल्डन जुबली ईयर’ में विधिक रूप से प्रवेश कर रहा है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में कला, इतिहास और लोक संस्कृति को समर्पित कई नई कड़ियों को धरातल पर उतारा गया, जो आगामी नवंबर माह तक निरंतर विभिन्न रचनात्मक विन्यासों के माध्यम से संचालित होती रहेंगी।

टेराकोटा पुरावशेष दीर्घा: सुल्तानगंज, चंपानगर और ग्वारिडीह के पुरातात्विक साक्ष्यों का उद्घाटन

​इस अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस की सबसे मुख्य और स्थायी प्रशासनिक उपलब्धि ‘नव संकलित टेराकोटा पुरावशेष दीर्घा’ का भव्य उद्घाटन रहा। इस विशिष्ट दीर्घा का विधिक उद्घाटन जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी-सह-संग्रहालय अध्यक्ष अंकित रंजन ने प्रक्षेत्र के वरिष्ठ इतिहासविदों और प्रशासनिक पदाधिकारियों के साथ संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर संपन्न किया। इस नई गैलरी के भीतर अंग प्रक्षेत्र के ऐतिहासिक स्थलों— विशेष रूप से सुल्तानगंज, प्राचीन चंपानगर और कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा हाल ही में संरक्षित घोषित किए गए बिहपुर प्रखंड के ग्वारिडीह पुरातात्विक स्थल से उत्खनन व खोज के दौरान प्राप्त दुर्लभ पुरावशेषों को आम दर्शकों के अवलोकन के लिए वैज्ञानिक विधा के तहत प्रदर्शित किया गया है।

​दीर्घा के भीतर प्रदर्शित की गई सामग्रियों में प्राचीन मानव सभ्यता के तकनीकी और कलात्मक विकास की कड़ियां साफ तौर पर परिलक्षित हो रही हैं। गैलरी में पुरातात्विक महत्व वाली मिट्टी की अत्यंत दुर्लभ कलाकृतियों, विभिन्न कालखंडों के मृदभांडों (मिट्टी के बर्तनों), प्राचीन बच्चों के खेल के खिलौनों, लोक देवी-देवताओं की मूर्तियों, ऐतिहासिक व्यापारिक विनिमय में प्रयुक्त होने वाली मिट्टी की सील (मुहरों) और मौर्य व गुप्त कालीन स्थापत्य कला से जुड़ी पुरातन ईंटों को प्रदर्शित किया गया है। इन पुरावशेषों को देखने के लिए दिन भर शोधार्थियों और इतिहास के जिज्ञासुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही, जिन्होंने इन कलाकृतियों के ऐतिहासिक संरेखण को रेखांकित किया।

50 कलाकृतियों की भव्य चित्र प्रदर्शनी और मंजूषा कला कार्यशाला का विन्यास

​संग्रहालय के मुख्य दीर्घा प्रक्षेत्र में इतिहास, कला, साहित्य और पारंपरिक शिल्प जैसे गंभीर और संवेदनशील विषयों पर आधारित एक विशेष चित्र प्रदर्शनी का सांगठनिक आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी के भीतर कुल 50 उत्कृष्ट कलाकृतियों और चित्रों को प्रदर्शित किया गया था। इन चित्रों के माध्यम से मानव सभ्यता के क्रमिक विकास और अंग संस्कृति के गौरवशाली अध्यायों को कैनवास पर उकेरा गया था, जिसे दर्शक अत्यंत उत्सुकता और आदर के साथ निहारते नजर आए।

​इसके साथ ही, युवा प्रतिभाओं के कौशल संवर्धन और रचनात्मक विकास के लिए एक दिवसीय कला कार्यशाला का भी सफल संपादन किया गया। इस कार्यशाला में किलकारी (बिहार बाल भवन), मंजूषा चित्रकला संस्थान और सुंदरवती महिला महाविद्यालय (एसएम कॉलेज) के छात्र-छात्राओं ने पूरी ऊर्जा के साथ अपनी सहभागिता दर्ज की। कार्यशाला के भीतर बच्चों की तूलिका से अद्भुत कलात्मक विलेख सामने आए; किसी छात्र ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ऐतिहासिक चित्रों को कागज पर पूरी जीवंतता के साथ उतारा, तो किसी ने हस्तशिल्प के माध्यम से बापू के दर्शन को त्रिविमीय रूप में जीवंत कर दिया। कतिपय छात्रों ने भागलपुर के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास को कैनवास पर स्थान दिया, जबकि कई छात्राओं ने संग्रहालय की दीवारों पर भागलपुर की विशिष्ट पहचान मानी जाने वाली पारंपरिक ‘मंजूषा कला’ के रेखांकनों और लोकगाथाओं का सुंदर प्रदर्शन कर कलात्मक वातावरण का निर्माण किया।

वैश्विक थीम पर विचार गोष्ठी: विभाजित विश्व को जोड़ने में संग्रहालयों की भूमिका

​सांस्कृतिक गतिविधियों के समानांतर, बौद्धिक चेतना और अकादमिक विमर्श को गति देने के लिए संग्रहालय के मुख्य प्रेक्षागृह में एक उच्चस्तरीय ‘विचार गोष्ठी’ (सेमिनार) का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी वर्ष 2026 के अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस हेतु निर्धारित की गई वैश्विक थीम ‘म्यूजियम यूनाइटिंग अ डिवाईडेड वर्ल्ड’ (विभाजित विश्व को जोड़ते संग्रहालय) पर आधारित थी। गोष्ठी के मुख्य वक्ताओं में तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता, डॉ. पवन शेखर, डॉ. बिहारी लाल चौधरी तथा एस. एम. कॉलेज के इतिहास विभाग के डॉ. हिमांशु शेखर शामिल थे।

​इन अकादमिक कप्तानों ने अपने व्याख्यानों के माध्यम से स्पष्ट किया कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां विभिन्न वैचारिक और भौगोलिक कारणों से दूरियां बढ़ रही हैं, वहां संग्रहालय साझा अतीत और सांस्कृतिक विरासत का दर्शन कराकर संपूर्ण मानवता को एक सूत्र में पिरोने का विधिक कार्य करते हैं। वक्ताओं ने भागलपुर के स्थानीय पुरातात्विक स्थलों की वर्तमान अवस्थिति और इतिहास विषय की आधुनिक महत्ता पर गंभीर नीतिगत विचार साझा किए। व्याख्यान सत्र के समापन के उपरांत वहां उपस्थित विभिन्न महाविद्यालयों के शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं के साथ एक जीवंत चर्चा-परिचर्चा (संवाद सत्र) का भी आयोजन किया गया, जिसमें युवाओं के इतिहास से जुड़े तकनीकी प्रश्नों का तार्किक निवारण किया गया।

संरक्षण और सेवा का सम्मान: ग्वारिडीह के संग्रहकर्ता से लेकर ग्राउंड स्टाफ तक की कड़ियां

​समारोह के उत्तरार्ध में समाज और संस्थान के प्रति उत्कृष्ट अवदान देने वाले व्यक्तियों के लिए एक विशेष सम्मान कार्यक्रम का विन्यास किया गया। इसके तहत बिहपुर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल ग्वारिडीह से प्राप्त प्राचीन सामग्रियों का निरंतर निस्वार्थ संग्रहण करने और उन सभी बहुमूल्य पुरावशेषों को सुरक्षित रूप से भागलपुर संग्रहालय को सौंपने के सराहनीय विलेख के लिए जयरामपुर निवासी अविनाश चौधरी को मंच पर आमंत्रित किया गया। जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने उन्हें अंगवस्त्र और विशेष स्मृतिचिन्ह प्रदान कर उनके इस ऐतिहासिक संरक्षण कार्य की सार्वजनिक सराहना की।

​इसके अतिरिक्त, संस्थान के भीतर कार्य-संस्कृति को सुदृढ़ करने, कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाने और अपने कार्य क्षेत्र के प्रति अपनत्व की भावना को जागृत करने के अनूठे उद्देश्य से भागलपुर संग्रहालय में प्रतिनियुक्त विभिन्न श्रेणियों के कर्मियों को भी मंच से सम्मानित किया गया। अपने दायित्वों के कुशल निर्वहन और उत्कृष्ट सेवा के लिए संग्रहालयाध्यक्ष अंकित रंजन द्वारा सफाई कर्मी रेणु देवी, माली अमरजीत कुमार, सुरक्षा कर्मी अरविंद कुमार, होमगार्ड के जवान नंदकिशोर दास तथा लिपिकीय संवर्ग के नरेंद्र कुमार एवं अनुराग कुमार को अंगवस्त्र, प्रशंसापत्र और स्मृतिचिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इस सांगठनिक पहल की उपस्थित जनसमूह द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसा की गई।

गोल्डन जुबली वर्ष के संकल्प और भागलपुर संग्रहालय का भावी नीतिगत रोडमैप

​समारोह के मुख्य सांगठनिक उद्बोधन के दौरान जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी-सह-संग्रहालयाध्यक्ष अंकित रंजन ने संग्रहालय की महत्ता और इसके भावी विकास के रोडमैप को विस्तार से साझा किया। उन्होंने अपने संबोधन में कड़ाई से रेखांकित किया कि यदि किसी भी समाज या भौगोलिक क्षेत्र के इतिहास, उसकी अंतर्निहित चेतना और संस्कृति को करीब से जानना और महसूस करना हो, तो स्थानीय संग्रहालयों का भ्रमण सबसे अनिवार्य विधा है, क्योंकि संग्रहालय अलग-अलग समय, कालखंडों और संस्कृतियों को एक साथ जोड़ने वाले पुल के रूप में कार्य करते हैं।

​उन्होंने घोषणा की कि भागलपुर संग्रहालय इस वर्ष अपने गौरवशाली पचासवें साल (गोल्डन जुबली) में प्रवेश कर चुका है। इस ऐतिहासिक वर्षगांठ के उपलक्ष्य में केवल आज ही नहीं, बल्कि आगामी नवंबर माह तक निरंतर विभिन्न प्रकार की शैक्षणिक, अकादमिक और रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन कड़ाई के साथ संधारित किया जाएगा। इस दीर्घकालिक मुहिम के माध्यम से राज्य और देश भर के शोधार्थियों, विद्यार्थियों, कलाकारों और आम नागरिकों को भागलपुर संग्रहालय के इस डिजिटल और भौतिक ग्रिड से जोड़ा जाएगा ताकि वे अंग क्षेत्र की कला, साहित्य, इतिहास और प्राचीन धरोहरों को समझने की व्यापक मुहिम का सक्रिय हिस्सा बन सकें।

​उन्होंने स्पष्ट किया कि कला और अपनी धरोहरों के संरक्षण में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से जुड़े जमीनी व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें उचित सम्मान, मंच और प्रशासनिक सहयोग देने की नीति पर संग्रहालय सक्रियता से काम कर रहा है। इसके साथ ही, उन्होंने यह सुखद संकेत भी दिए कि निकट भविष्य में आधारभूत संरचना के आधुनिकीकरण के उपरांत भागलपुर संग्रहालय में कई अन्य नई पुरावशेष दीर्घाओं (गैलरीज) को भी आम जनता के अवलोकनार्थ लाइव कर दिया जाएगा, जिसके लिए प्रशासनिक विलेखों की तैयारी अंतिम चरण में है। स्कूली बच्चों और युवाओं को इस ऐतिहासिक विधा से जोड़ने के लिए रचनात्मक प्रतियोगिताओं का दौर भी निरंतर जारी रखा जाएगा।

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