​भागलपुर संग्रहालय में अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस की धूम: नई टेराकोटा दीर्घा का लोकार्पण, विरासत और लोक कला के रंग में रंगे विद्यार्थी

भागलपुर, 18 मई 2026। ऐतिहासिक अंग प्रक्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पुरातात्विक संपदा और ऐतिहासिक चेतना को जीवंत रखने के मुख्य केंद्र भागलपुर संग्रहालय में अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर एक भव्य और बहुआयामी सांस्कृतिक व अकादमिक विलेख का आयोजन किया गया। वर्ष 2026 के अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के लिए वैश्विक स्तर पर निर्धारित की गई विशेष थीम ‘म्यूजियम यूनाइटिंग अ डिवाईडेड वर्ल्ड’ (विभाजित विश्व को जोड़ते संग्रहालय) को धरातल पर उतारते हुए इस समारोह के तहत विभिन्न रचनात्मक, शैक्षणिक और सम्मानपरक गतिविधियों की एक लंबी श्रृंखला आयोजित की गई। इस वृहद् आयोजन का मुख्य उद्देश्य आम जनमानस, विशेष रूप से युवा पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक जड़ों से जोड़ना और समाज के हर तबके के भीतर अपनी साझी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति अपनत्व व गौरव की भावना को पूरी कड़ाई से संधारित करना था। सुबह से ही संग्रहालय परिसर के भीतर कलाकारों, इतिहासकारों, शोधार्थियों और स्कूली बच्चों की भारी चहल-पहल देखी गई, जिसने पूरे माहौल को एक उत्सव के रूप में तब्दील कर दिया।

‘आओ चलें संग्रहालय की ओर’ अभियान के तहत उमड़ा जनसैलाब

​समारोह के प्रथम मुख्य विन्यास के रूप में ‘आओ चलें संग्रहालय की ओर’ नामक एक विशेष जागरूकता सह आमंत्रण कार्यक्रम का संचालन किया गया। इस अनूठे अभियान के तहत भागलपुर शहर और इसके सीमावर्ती ग्रामीण इलाकों के विभिन्न स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थियों, विश्वविद्यालय के शोधार्थियों, स्थानीय चित्रकारों, शिल्पकारों और आम नागरिकों को संग्रहालय प्रक्षेत्र का सघन भ्रमण कराया गया।

​इस भ्रमण प्रविधि का मुख्य ध्येय पाठ्यपुस्तकों में दर्ज इतिहास को भौतिक पुरावशेषों के माध्यम से प्रत्यक्ष दिखाना था। प्रगणकों और संग्रहालय के गाइडों ने आगंतुकों को विभिन्न दीर्घाओं में प्रदर्शित प्राचीन सिक्कों, मूर्तियों, अस्त्र-शस्त्रों और ऐतिहासिक विलेखों की पृष्ठभूमि से विस्तार से अवगत कराया। युवाओं और शोधार्थियों ने प्राचीन काल की निर्माण विधाओं और शिल्पकला के नमूनों को देखकर अपनी संशयों का निवारण किया, जिससे ऐतिहासिक पर्यटन को एक नया और व्यावहारिक आयाम प्राप्त हुआ।

नव संकलित ‘टेराकोटा पुरावशेष दीर्घा’ का गरिमापूर्ण लोकार्पण

​इस ऐतिहासिक दिवस की सबसे बड़ी और स्थायी उपलब्धि संग्रहालय के भीतर एक पूर्णतः नवनिर्मित और नव संकलित ‘टेराकोटा पुरावशेष दीर्घा’ (मिट्टी की प्राचीन कलाकृतियों की गैलरी) का विधिक लोकार्पण रहा। इस नई दीर्घा के भीतर अंग प्रक्षेत्र की प्राचीन मिट्टी से निर्मित कतिपय दुर्लभ मूर्तियों, बर्तनों, खिलौनों और पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त धार्मिक व सामाजिक विन्यास को दर्शाने वाली कलाकृतियों को आधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियों के तहत संरक्षित कर प्रदर्शित किया गया है।

​तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, प्राचीन काल में टेराकोटा कला आम जनमानस के दैनिक जीवन, उनकी धार्मिक आस्थाओं और कलात्मक अभिरुचियों का सबसे मुख्य और सुलभ माध्यम हुआ करती थी। इस नव संकलित दीर्घा के खुलने से अब देश-विदेश से आने वाले इतिहासकारों और पर्यटकों को प्राचीन सभ्यता के क्रमिक विकास को एक ही स्थान पर समझने में भारी सुगमता होगी।

कला, साहित्य और इतिहास के संमिश्रण पर आधारित भव्य चित्र प्रदर्शनी

​संग्रहालय के मुख्य दीर्घा गलियारे में इतिहास, कला, साहित्य, लोक संस्कृति और पारंपरिक शिल्प जैसे विविध संवेदनशील विषयों पर आधारित एक भव्य चित्र प्रदर्शनी का सांगठनिक आयोजन किया गया। इस विशेष प्रदर्शनी के भीतर कुल 50 उत्कृष्ट और नायाब कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया था, जो मानव सभ्यता के विभिन्न कालखंडों और वैचारिक क्रांतियों को कैनवास पर बयां कर रही थीं।

​प्रदर्शनी में शामिल कतिपय चित्रों में जहाँ प्राचीन वास्तुकला के महीन रेखांकन देखने को मिले, वहीं कुछ कलाकृतियों के माध्यम से मध्यकालीन साहित्य और लोक कथाओं के दृश्यों को आधुनिक विधा के तहत जीवंत करने का सफल प्रयास किया गया था। इस कलात्मक विलेख को देखने के लिए दिन भर कला प्रेमियों और समीक्षकों का तांता लगा रहा, जिन्होंने कलाकृतियों के पीछे छिपे दार्शनिक संदेशों की गहराई से सराहना की।

प्रेक्षागृह में गूंजी अंगिका लोक विधा, स्थानीय कलाकारों ने बांधा समां

​संग्रहालय के मुख्य प्रेक्षागृह (ऑडिटोरियम) के भीतर लोक कला और पारंपरिक संगीत को समर्पित एक अत्यंत गरिमापूर्ण सांस्कृतिक सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र के दौरान प्रक्षेत्र के स्थापित और नवोदित स्थानीय कलाकारों द्वारा लोक कला पर आधारित पारंपरिक लोक गायन की प्रस्तुतियां दी गईं। कलाकारों ने अपनी सुरीली आवाज और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के संमिश्रण से अंगिका प्रक्षेत्र के पारंपरिक गीतों, श्रम गीतों और ऐतिहासिक गाथाओं का सस्वर पाठ किया।

​इस सांस्कृतिक प्रस्तुति ने प्रेक्षागृह में उपस्थित आधुनिक पीढ़ी के दर्शकों को अपनी मिट्टी के मूल संगीत और लोक विधाओं की प्रगाढ़ता से सीधे जोड़ दिया। इस संगीत विलेख का मुख्य उद्देश्य यह संदेश देना था कि लोक कलाएं ही किसी भी समाज के जीवंत इतिहास की वास्तविक संवाहक होती हैं, जिन्हें संरक्षित रखना प्रत्येक नागरिक का विधिक और नैतिक उत्तरदायित्व है।

एक दिवसीय कला कार्यशाला: बच्चों के कैनवास पर उतरी मंजूषा और गांधीवादी विधा

​युवाओं के भीतर छिपी रचनात्मक प्रतिभा को तराशने के उद्देश्य से संग्रहालय परिसर के खुले प्रांगण में एक दिवसीय कला कार्यशाला (आर्ट वर्कशॉप) का आयोजन कड़ाई के साथ संधारित किया गया। इस कार्यशाला में भागलपुर के विभिन्न स्कूल-कॉलेजों के सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ अपनी शारीरिक और मानसिक सहभागिता दर्ज कराई। कार्यशाला के लिए मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषयों का निर्धारण किया गया था— अंग प्रक्षेत्र की विश्व प्रसिद्ध पारंपरिक ‘मंजूषा कला’, ‘भागलपुर की ऐतिहासिक विरासत’ और ‘महात्मा गांधी के विचार व दर्शन’।

​बच्चों ने अपनी तूलिका और रंगों के माध्यम से मंजूषा कला के पारंपरिक रेखांकनों, सांपों के प्रतीकों और बिहुला-विषहरी की लोकगाथा को नए आधुनिक विन्यासों में उकेरा। साथ ही, मिट्टी और कबाड़ से जुगाड़ की विधा के तहत महात्मा गांधी के चरखे, उनके तीन बंदरों और शांति के संदेशों पर आधारित सुंदर शिल्पों का निर्माण भी किया गया, जिन्हें बाद में संग्रहालय की अस्थायी प्रदर्शनी का हिस्सा बनाया गया।

विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों का वैचारिक विमर्श और व्याख्यान कार्यक्रम

​सांस्कृतिक गतिविधियों के समानांतर, बौद्धिक और अकादमिक चेतना को जागृत करने के लिए एक उच्चस्तरीय ‘विचार गोष्ठी’ (सेमिनार) का सफल संपादन किया गया। इस गोष्ठी में तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) और सुंदरवती महिला (एस.एम.) कॉलेज के विभिन्न विभागों के वरिष्ठ प्राध्यापकों, भाषाविदों और इतिहासकारों ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए। व्याख्यान का मुख्य केंद्र बिंदु अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस 2026 की मूल थीम ‘म्यूजियम यूनाइटिंग अ डिवाईडेड वर्ल्ड’ पर आधारित था।

​अकादमिक कप्तानों ने अपने विलेखों में विस्तार से स्पष्ट किया कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ वैचारिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तरों पर दूरियां बढ़ रही हैं, वहाँ संग्रहालय अतीत की साझी विरासतों और मानवीय मूल्यों का दिग्दर्शन कराकर पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोने का काम कर सकते हैं। व्याख्यान के अंतिम चरण में उपस्थित शोधार्थियों और वक्ताओं के बीच एक गहन और जीवंत चर्चा-परिचर्चा (क्वेश्चन-आंसर सेशन) का भी आयोजन हुआ, जिसमें इतिहास के आधुनिक प्रासंगिकता पर गंभीर नीतिगत विचार साझा किए गए।

टेराकोटा के अनूठे संग्रहकर्ता अविनाश कुमार चौधरी का नागरिक सम्मान

​समारोह के मुख्य आधिकारिक मंच से इतिहास और पुरातत्व के संरक्षण के क्षेत्र में व्यक्तिगत स्तर पर अद्वितीय योगदान देने वाले प्रबुद्ध नागरिक को सम्मानित करने की विधा पूरी की गई। पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के प्राचीन टेराकोटा (मिट्टी के पुरावशेषों) के कड़े संग्रहकर्ता अविनाश कुमार चौधरी को उनकी दीर्घकालिक साधना और खोजपरक प्रवृत्तियों के लिए मंच पर आमंत्रित किया गया।

​संग्रहालय प्रशासन और मुख्य अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से उन्हें एक विशेष प्रशंसापत्र, पारंपरिक राजकीय अंगवस्त्र और एक सुंदर स्मृतिचिन्ह (मोमेंटो) हस्तगत कराकर पूरी गरिमा के साथ सम्मानित किया गया। अविनाश कुमार चौधरी ने अपने जीवन काल में सुदूर क्षेत्रों से कतिपय ऐसी दुर्लभ प्राचीन कलाकृतियों को नष्ट होने से बचाया है जो इस क्षेत्र के इतिहास के विलेखों को मुकम्मल करने में मुख्य साक्ष्य साबित हुई हैं। उनके इस निस्वार्थ अवदान को समाज के लिए एक प्रेरक मिसाल बताया गया।

अग्रिम पंक्ति के संग्रहालय कर्मियों का उत्साहवर्धन और मंच से विधिक सम्मान

​समारोह के अंतिम और सबसे मर्मस्पर्शी प्रक्रम के तहत संस्थान के प्रति अपनत्व की भावना को व्यावहारिक रूप से जागृत करने और निचले स्तर के कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने के लिए एक अभूतपूर्व सम्मान कार्यक्रम आयोजित किया गया। आमतौर पर चर्चाओं से दूर रहने वाले लेकिन संग्रहालय की सुरक्षा और सुंदरता को चौबीसों घंटे संधारित रखने वाले ग्रास-रूट स्तर के कर्मियों यथा सफाईकर्मियों, मालियों, आंतरिक व बाहरी सुरक्षाकर्मियों, होमगार्ड के जवानों और लिपिकीय स्टाफ को मुख्य मंच पर सप्रेम आमंत्रित किया गया।

​इन सभी कर्मियों को उनके द्वारा दी जा रही निरंतर और त्रुटिहीन सेवाओं के लिए प्रशासनिक मंच से तालियों की गूंज के बीच सम्मानित किया गया। इस सांगठनिक पहल का मुख्य उद्देश्य यह संदेश देना था कि किसी भी ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा और उसकी साख को बनाए रखने में इन अग्रिम पंक्ति के कर्मियों का पसीना और उनकी निष्ठा सबसे बुनियादी स्तंभ होती है। इस सम्मान को पाकर सभी कर्मियों के चेहरे खिल उठे और उन्होंने पूरी प्रतिबद्धता के साथ संग्रहालय की संपदा को सुरक्षित रखने का अपना संकल्प दोहराया।

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