
भागलपुर। बिहार के भागलपुर जिला अंतर्गत परबत्ता थाना क्षेत्र से एक बेहद हृदयविदारक और दुखद घटना सामने आई है, जहां एक बीमार मासूम बच्चे को इलाज के लिए शहर ला रहे माता-पिता के अरमान बीच रास्ते में ही बिखर गए। परबत्ता के मिर्जापरी गांव से अपने कलेजे के टुकड़े को बेहतर चिकित्सा सुविधा दिलाने की उम्मीद लेकर निकले परिजनों को क्या मालूम था कि रास्ते की भौगोलिक दूरी और समय की क्रूरता उनके बच्चे को उनसे हमेशा के लिए छीन लेगी। गंगा नदी पार करने के मुख्य मार्ग यानी बड़ी जहाज घाट के समीप अचानक बच्चे की हालत अत्यंत नाजुक हो गई और वह अचेत हो गया। स्थानीय नागरिकों की तत्परता और मानवीय सहयोग से बच्चे को तुरंत नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे बचाने के लिए सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) भी दिया। हालांकि, स्थिति में सुधार न होते देख उसे तुरंत जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (मायागंज अस्पताल) रेफर किया गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद इलाज के दौरान मासूम ने दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद से मिर्जापरी गांव और अस्पताल परिसर में पीड़ित परिवार के चीख-पुचार से माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया है।
गांव से इलाज के लिए निकले थे परिजन, रास्ते में ही मंडराया संकट
परबत्ता थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सुदूर मिर्जापरी गांव के निवासी अवधेश कुमार और उनकी पत्नी ज्वाला कुमारी का बच्चा पिछले कुछ समय से शारीरिक रूप से काफी अस्वस्थ चल रहा था। ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक चिकित्सा के साधनों की सीमित उपलब्धता और बाल रोग विशेषज्ञों के अभाव के कारण माता-पिता अपने बच्चे के गिरते स्वास्थ्य को लेकर लगातार चिंतित थे। शुक्रवार की सुबह जब बच्चे की शारीरिक स्थिति सामान्य से अधिक खराब होने लगी, तो अवधेश कुमार और ज्वाला कुमारी ने बिना कोई समय गंवाए उसे भागलपुर शहर स्थित एक बड़े शिशु रोग विशेषज्ञ के पास ले जाने का निर्णय लिया।
परिजनों ने बच्चे को कपड़ों में लपेटा और गांव से सवारी गाड़ी पकड़कर भागलपुर की ओर रवाना हुए। परबत्ता और नवगछिया के इलाकों से भागलपुर मुख्य शहर में प्रवेश करने के लिए गंगा नदी के घाटों का सफर तय करना पड़ता है। माता-पिता के मन में केवल एक ही तड़प थी कि किसी भी तरह वे जल्द से जल्द भागलपुर शहर की सीमा में प्रवेश कर जाएं ताकि उनके बच्चे को सही दवा और ऑक्सीजन सपोर्ट मिल सके। सफर की शुरुआत में बच्चा शांत था, लेकिन जैसे ही उनकी गाड़ी बड़ी जहाज घाट के पहुंच मार्ग के समीप पहुंची, अचानक बच्चे के शरीर में एक अजीब सी ऐंठन हुई और उसकी सांसों की गति असामान्य रूप से धीमी पड़ने लगी।
बड़ी जहाज घाट के समीप थमने लगीं सांसें, स्थानीय लोगों ने बढ़ाया हाथ
शहरी क्षेत्र में प्रवेश करने का मुख्य ट्रांजिट पॉइंट माना जाने वाला बड़ी जहाज घाट शुक्रवार को एक बेहद दर्दनाक मानवीय लाचारी का गवाह बना। ज्वाला कुमारी ने जैसे ही महसूस किया कि उसकी गोद में मौजूद बच्चे का शरीर ठंडा पड़ रहा है और वह कोई हलचल नहीं कर रहा है, वह जोर-जबरदस्ती से रोने और चिल्लाने लगी। मां की चीख सुनकर पति अवधेश कुमार भी बुरी तरह घबरा गए। उन्होंने गाड़ी को रुकवाया और बच्चे को हवा देने का प्रयास किया। बड़ी जहाज घाट के समीप यात्रियों और नाविकों की भारी भीड़ मौजूद थी।
सड़क के किनारे एक मां को अपने बच्चे को छाती से लगाकर बिलखते देख वहां मौजूद स्थानीय दुकानदार, राहगीर और घाट के कर्मी तुरंत दौड़कर उनके पास पहुंचे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय युवाओं ने तुरंत मानवीय संवेदना का परिचय दिया। बिना एक पल का समय गंवाए, स्थानीय लोगों ने अपनी मोटरसाइकिल और अन्य वाहनों की व्यवस्था की और पीड़ित माता-पिता को बच्चे के साथ तुरंत नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) की ओर रवाना किया। इस दौरान घाट पर मौजूद हर व्यक्ति मासूम की सलामती के लिए प्रार्थना कर रहा था, क्योंकि बच्चे का चेहरा पूरी तरह पीला पड़ चुका था।
प्राथमिक केंद्र में डॉक्टरों ने दिया सीपीआर, नाजुक हालत में मायागंज रेफर
स्थानीय लोगों की मदद से जब अचेत बच्चे को आपातकालीन स्थिति में नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र के भीतर ले जाया गया, तो वहां तैनात चिकित्सा अधिकारियों ने तुरंत उसे अटेंड किया। डॉक्टरों ने जब बच्चे की नब्ज (पल्स) और स्टेथॉस्कोप के जरिए दिल की धड़कन की जांच की, तो स्थिति अत्यंत चिंताजनक पाई गई। सांसों की थमती गति को दोबारा चालू करने और कार्डियक अरेस्ट जैसी स्थिति से बाहर निकालने के लिए डॉक्टरों ने तुरंत आपातकालीन विधिक प्रक्रिया अपनाई।
चिकित्सकों की टीम ने बच्चे को टेबल पर लिटाकर उसकी छाती को कृत्रिम रूप से दबाना शुरू किया, जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में सीपीआर (CPR) कहा जाता है। काफी देर तक डॉक्टरों ने मुंह के जरिए कृत्रिम सांस देने और छाती को कंप्रेस करने की प्रक्रिया को जारी रखा। इस अथक प्रयास के बाद बच्चे के शरीर में हल्की सी हलचल महसूस हुई, लेकिन वहां वेंटिलेटर, बाल रोग आईसीयू (NICU/PICU) और उच्च स्तरीय जीवन रक्षक प्रणालियों की कमी थी। स्थानीय डॉक्टरों ने परिजनों को साफ बताया कि बच्चे को बचाने के लिए उसे तुरंत भागलपुर के सबसे बड़े अस्पताल जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (मायागंज अस्पताल) ले जाना होगा। डॉक्टरों ने त्वरित कागजी कार्रवाई पूरी करते हुए बच्चे को मायागंज के लिए रेफर कर दिया।
दादी का भावुक बयान: जन्म से ही शारीरिक रूप से बेहद कमजोर था मासूम
इस दुखद घटना के बाद मायागंज अस्पताल के बर्न और शिशु वार्ड के बाहर का नजारा किसी को भी रुला देने के लिए काफी था। बच्चे की मौत की आधिकारिक घोषणा होने के बाद वार्ड के बाहर बैठी उसकी वृद्ध दादी सुमित्रा देवी का रो-रोकर बुरा हाल था। सुमित्रा देवी ने आंसुओं से भीगी आवाज में वहां मौजूद लोगों और मीडिया कर्मियों को बताया कि उनका पोता जन्म के समय से ही शारीरिक रूप से अत्यंत कमजोर और अल्पविकसित था। उसका वजन भी सामान्य बच्चों की तुलना में काफी कम था, जिसके कारण वह अक्सर बीमार रहता था।
सुमित्रा देवी ने बताया कि परिवार के लोग अपनी सीमित आर्थिक क्षमता के बावजूद बच्चे की परवरिश और उसके इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। गांव के डॉक्टरों से लगातार परामर्श लिया जा रहा था, लेकिन कमजोरी के कारण उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। शुक्रवार को जब उसकी हालत बिगड़ी, तो पूरा परिवार उम्मीद की एक आखिरी किरण लेकर भागलपुर शहर के बड़े डॉक्टरों की शरण में आ रहा था। दादी ने रोते हुए कहा कि यदि रास्ते में गंगा नदी के घाट पर जाम न मिला होता और सांसें न उखड़ी होतीं, तो शायद डॉक्टरों के पास थोड़ा और समय होता और उनका कुलदीपक आज जिंदा होता।
इलाज के दौरान तोड़ा दम, मिर्जापरी गांव में पसरा मातमी सन्नाटा
रेफरल एम्बुलेंस के जरिए जब अवधेश कुमार अपनी पत्नी के साथ बच्चे को लेकर मायागंज अस्पताल के शिशु आपातकालीन वार्ड में पहुंचे, तो वहां तैनात सीनियर डॉक्टरों और रेजिडेंट डॉक्टरों ने तुरंत उसे आईसीयू बेड पर शिफ्ट किया। डॉक्टरों ने ऑक्सीजन सैचुरेशन को सुधारने के लिए मास्क लगाया और जीवन रक्षक दवाइयों के इंजेक्शन दिए। लगभग आधे घंटे से अधिक समय तक डॉक्टरों की पूरी टीम ने बच्चे को बचाने के लिए हर संभव चिकित्सकीय प्रयास किए। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। गंभीर रूप से कमजोर हो चुके बच्चे के आंतरिक अंगों ने काम करना बंद कर दिया था और इलाज के दौरान ही उसकी धड़कनें हमेशा के लिए खामोश हो गईं।
जैसे ही डॉक्टर ने बाहर आकर अवधेश कुमार के कंधे पर हाथ रखकर बच्चे के शांत होने की सूचना दी, मां ज्वाला कुमारी अस्पताल के फर्श पर गिरकर अचेत हो गई। पिता अवधेश कुमार भी अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए और दीवार के सहारे बैठकर फफक-फफक कर रोने लगे। अस्पताल के अन्य मरीजों और तीमारदारों ने पीड़ित माता-पिता को संभालने का प्रयास किया, लेकिन उनके दुख की गहराई के सामने सांत्वना के शब्द बौने साबित हो रहे थे। कानूनी और विधिक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद, मृत बच्चे के शव को परिजनों को सौंप दिया गया। अवधेश कुमार अपने मृत बच्चे को बाहों में समेटे हुए एम्बुलेंस से वापस अपने पैतृक गांव मिर्जापरी के लिए रवाना हो गए। इस मनहूस खबर के गांव पहुंचते ही पूरे मिर्जापरी इलाके के घरों में चूल्हे नहीं जले हैं और हर कोई इस गरीब परिवार पर टूटे दुखों के पहाड़ से स्तब्ध है।


