
पटना। बिहार की सियासत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और बैलेट पेपर (मतपत्र) को लेकर चल रही पुरानी बहस एक बार फिर गरमा गई है। बिहार विधान परिषद के भोजपुर-बक्सर स्थानीय प्राधिकार उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रत्याशी सोनू कुमार की शानदार जीत के बाद विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। चुनावी नतीजे घोषित होने के तुरंत बाद कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को बधाई देते हुए तेजस्वी यादव ने देश की चुनावी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने दावा किया कि यदि देश और राज्य में मशीनों की जगह पारंपरिक मतपत्रों के जरिए मतदान कराया जाए, तो एनडीए के लिए चुनावी वैतरणी पार करना नामुमकिन हो जाएगा और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ेगा। इस बयान ने स्थानीय निकाय चुनाव की जीत को सीधे राष्ट्रीय चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जोड़ दिया है।
भोजपुर-बक्सर उपचुनाव में राजद की जीत और जश्न का माहौल
भोजपुर-बक्सर स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र का यह उपचुनाव महागठबंधन और एनडीए दोनों के लिए ही प्रतिष्ठा की लड़ाई बना हुआ था। इस मुकाबले में राजद उम्मीदवार सोनू कुमार राय ने जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के प्रत्याशी कन्हैया प्रसाद को पटखनी देकर विधान परिषद का टिकट हासिल किया है। कन्हैया प्रसाद, जेडीयू विधायक राधा चरण साह के पुत्र हैं, जिसके कारण इस सीट पर दोनों पक्षों ने अपनी पूरी राजनीतिक ताकत झोंक रखी थी। सोनू कुमार की जीत के बाद पटना स्थित राजद प्रदेश कार्यालय से लेकर आरा और बक्सर के सुदूर गांवों तक जश्न का माहौल देखा गया। कार्यकर्ताओं ने गुलाल उड़ाकर और मिठाइयां बांटकर इस जीत का स्वागत किया।
तेजस्वी यादव ने इस सफलता को जमीनी कार्यकर्ताओं के कड़े परिश्रम और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अटूट भरोसे की जीत बताया। उन्होंने सोशल मीडिया और प्रेस बयानों के माध्यम से कहा कि यह परिणाम जमीनी हकीकत को बयां करता है। स्थानीय निकाय के मतदाताओं, जिनमें मुख्य रूप से त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के वार्ड सदस्य, मुखिया, बीडीसी और जिला परिषद सदस्य शामिल होते हैं, उन्होंने धनबल और प्रशासनिक दबाव को दरकिनार करते हुए विपक्ष की नीतियों पर अपनी मुहर लगाई है। विपक्ष इस जीत को आगामी राजनीतिक बदलावों के एक बड़े संकेत के रूप में देख रहा है।
बैलेट पेपर बनाम ईवीएम: विपक्ष की पुरानी मांग को फिर मिली धार
इस स्थानीय उपचुनाव में मिली सफलता को आधार बनाकर तेजस्वी यादव ने चुनावी निष्पक्षता के बड़े मुद्दे को हवा दी है। उन्होंने कहा कि राजद और पूरा विपक्षी गठबंधन लंबे समय से यह मांग करता आ रहा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में जनता का अटूट विश्वास बनाए रखने के लिए मतपत्रों की वापसी अनिवार्य है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जब कभी भी मतदान बैलेट पेपर के माध्यम से होता है, तो परिणाम पूरी तरह से पारदर्शी और चौंकाने वाले होते हैं। भोजपुर-बक्सर का यह उपचुनाव भी बैलेट पेपर के जरिए ही हुआ था, जिसने यह साबित कर दिया कि जब मशीन का दखल नहीं होता, तब जनता की असली पसंद खुलकर सामने आती है।
अपने दावों को मजबूती देने के लिए तेजस्वी यादव ने पूर्व के बिहार विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का भी हवाला दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि विधानसभा चुनाव के दौरान जब पोस्टल बैलेट पेपर (डाक मतपत्रों) की गिनती हुई थी, तब महागठबंधन के उम्मीदवार 150 से अधिक सीटों पर स्पष्ट रूप से बढ़त बनाए हुए थे। लेकिन जैसे ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के वोटों की गिनती और प्रशासनिक मशीनरी का प्रभाव शुरू हुआ, खेल पूरी तरह बदल गया। उन्होंने सत्तारूढ़ दल पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि तंत्र, यंत्र, षड्यंत्र और छल-कपट के गठजोड़ से महागठबंधन के कई जीतने वाले प्रत्याशियों को जबरन हरा दिया गया था। विपक्ष का मानना है कि ईवीएम की व्यवस्था में तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर हेरफेर की गुंजाइश बनी रहती है, जो जनमत का गला घोटने का काम करती है।
मतगणना की सुस्त रफ्तार पर प्रशासनिक घेराबंदी
तेजस्वी यादव ने निर्वाचन आयोग और ईवीएम की कार्यप्रणाली पर एक और व्यावहारिक सवाल उठाया। उन्होंने मतगणना की प्रक्रिया में लगने वाले अत्यधिक समय को लेकर प्रशासनिक तंत्र को घेरा। उन्होंने कहा कि अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि ईवीएम के इस्तेमाल से चुनाव प्रक्रिया तेज होती है और समय की बचत होती है। लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट दिखाई देती है। आज के समय में जब मशीनों के जरिए वोटों की गिनती होती है, तब भी अंतिम परिणाम घोषित होने में रात के एक से दो बज जाते हैं। कई बार तो मतगणना की प्रक्रिया अगले दिन सुबह तक खिंच जाती है।
इस सुस्त रफ्तार पर सवाल उठाते हुए उन्होंने पूछा कि अगर मशीनों के युग में भी परिणाम आने में इतनी देरी हो रही है, तो फिर बैलेट पेपर से चुनाव कराने में क्या आपत्ति है? मतपत्रों की गिनती में भले ही थोड़ा अधिक समय लगे, लेकिन वह प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी होती है और उम्मीदवारों व उनके एजेंटों के सामने एक-एक वोट की भौतिक रूप से जांच की जा सकती है। तेजस्वी यादव के अनुसार, जब तक चुनावी प्रक्रिया से मशीनों को हटाकर जनता के हाथों में मतपत्र नहीं सौंपे जाते, तब तक पूर्ण पारदर्शिता का दावा केवल कागजी बनकर रह जाएगा।
राजनीतिक संतुलन और सत्तारूढ़ दल का पलटवार
विपक्ष के इन तीखे हमलों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए सत्तारूढ़ एनडीए और निर्वाचन आयोग के तर्कों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भाजपा और जदयू के प्रवक्ताओं ने तेजस्वी यादव के इन आरोपों को ‘हार की हताशा का अग्रिम बहाना’ करार दिया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि जब विपक्ष किसी चुनाव में जीत हासिल करता है, जैसे कि इस भोजपुर-बक्सर उपचुनाव में हुआ, तब उन्हें चुनावी प्रक्रिया और बैलेट पेपर पर कोई आपत्ति नहीं होती। लेकिन जब वे आम चुनाव या विधानसभा चुनाव में जनता का विश्वास खो देते हैं, तो अपनी कमियों को छिपाने के लिए ईवीएम पर दोष मढ़ना शुरू कर देते हैं।
सत्तारूढ़ दल का तर्क है कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ईवीएम पूरी तरह से सुरक्षित और छेड़छाड़ से परे हैं। देश की सर्वोच्च अदालत ने भी कई बार ईवीएम की विश्वसनीयता पर मुहर लगाई है और वीवीपैट (VVPAT) पर्चियों के मिलान की व्यवस्था को मजबूत किया है। एनडीए नेताओं के अनुसार, डिजिटल युग में बैलेट पेपर की ओर लौटना देश को पीछे धकेलने जैसा होगा, जिससे बूथ कैप्चरिंग और मतपेटियां लूटने का पुराना दौर वापस आ सकता है। बहरहाल, भोजपुर-बक्सर की एक सीट पर मिली यह जीत राजद के लिए संजीवनी की तरह काम कर रही है, जिसने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर सरकार को घेरने का एक और मौका दे दिया है। आने वाले समय में यह बहस बिहार की राजनीतिक गलियारों में और अधिक उग्र होने के संकेत दे रही है।


