​बिहार में अब ‘सुधा’ की तर्ज पर बिकेंगी सब्जियां: राम कृपाल यादव ने वेजफेड को दिया पायलट प्रोजेक्ट का निर्देश; बंद चीनी मिलें होंगी शुरू और पैक्स बनेंगे हाईटेक

पटना। बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहकारिता के माध्यम से नई ऊर्जा देने के लिए राज्य सरकार ने बड़े स्तर पर बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है। सहकारिता विभाग की कमान संभालने के बाद राम कृपाल यादव ने बुधवार को विभाग की पहली बड़ी समीक्षा बैठक की, जिसमें किसानों की आय बढ़ाने और सहकारी संस्थाओं को बिचौलियों से मुक्त करने के लिए कई कड़े निर्देश दिए गए। बैठक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सब्जियों के विपणन को लेकर रहा, जहाँ मंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य में ‘सुधा डेयरी’ की तर्ज पर ही सब्जियों की बिक्री का जाल बिछाया जाएगा। इसके साथ ही, मिथिलांचल की बंद पड़ी चीनी मिलों के पुनरुद्धार और पैक्सों के पूर्ण कंप्यूटरीकरण को लेकर भी समय-सीमा निर्धारित कर दी गई है। इस उच्चस्तरीय बैठक में विभाग के सचिव धर्मेन्द्र सिंह सहित वेजफेड और सहकारी बैंक के आला अधिकारी मौजूद रहे, जिन्होंने पीपीटी के माध्यम से योजनाओं की वर्तमान स्थिति का ब्योरा साझा किया।

सब्जी उत्पादकों के लिए ‘सुधा मॉडल’ बनेगा वरदान

​बिहार में सब्जी उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन भंडारण और सही बाजार न मिलने के कारण किसानों को अक्सर अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती है। इसी समस्या के स्थायी समाधान के लिए सहकारिता मंत्री ने ‘बिहार राज्य सब्जी प्रसंस्करण एवं विपणन फेडरेशन’ (वेजफेड) को ‘सुधा मॉडल’ अपनाने का निर्देश दिया है। जिस तरह सुधा डेयरी ने दूध के संग्रह, प्रसंस्करण और विक्रय का एक सशक्त नेटवर्क खड़ा किया है, ठीक उसी तरह वेजफेड अब राज्य के विभिन्न हिस्सों में सब्जी विक्रय केंद्र स्थापित करेगा।

​मंत्री ने इसके लिए एक पायलट परियोजना का प्रस्ताव जल्द से जल्द तैयार करने को कहा है। इस योजना के तहत किसानों से सीधे सब्जियां खरीदी जाएंगी, उनकी ग्रेडिंग और पैकिंग होगी और फिर वेजफेड के आउटलेट्स के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुँचाई जाएंगी। इससे उपभोक्ताओं को ताजी सब्जियां मिलेंगी और किसानों को उनकी मेहनत का वास्तविक मूल्य प्राप्त होगा। विपणन व्यवस्था मजबूत होने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

चीनी मिलों का पुनरुद्धार: सकरी और रैयाम में फिर गूंजेगी मिल की गूंज

​उत्तर बिहार के किसानों के लिए चीनी मिलें केवल उद्योग नहीं बल्कि उनकी आजीविका का मुख्य आधार रही हैं। मधुबनी जिले के सकरी और दरभंगा जिले के रैयाम स्थित बंद पड़ी चीनी मिलों को लेकर समीक्षा बैठक में विशेष चर्चा हुई। राम कृपाल यादव ने इन मिलों को पुनः संचालित करने की दिशा में आ रही बाधाओं को दूर करने और प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश दिया है।

​इन मिलों के शुरू होने से न केवल गन्ना उत्पादकों को फायदा होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। विभाग अब इन मिलों के तकनीकी और वित्तीय पहलुओं की जांच कर रहा है ताकि इनके संचालन के लिए एक टिकाऊ रणनीति तैयार की जा सके। मंत्री ने स्पष्ट किया कि चीनी मिलों का पुनरुद्धार सरकार की प्राथमिकता सूची में ऊपर है और इसके लिए संसाधनों की कमी नहीं होने दी जाएगी।

पैक्स कंप्यूटरीकरण और पारदर्शी व्यवस्था

​सहकारिता आंदोलन की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण कड़ी ‘प्राथमिक कृषि साख समिति’ (पैक्स) है। पैक्सों के कामकाज में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म करने के लिए कंप्यूटरीकरण योजना पर जोर दिया गया। बैठक में बताया गया कि कई पैक्सों में डिजिटल बुनियादी ढांचा तैयार हो चुका है, लेकिन जो शेष रह गए हैं, वहां युद्धस्तर पर काम पूरा करना होगा।

​कंप्यूटरीकरण होने से किसानों को खाद, बीज और ऋण प्राप्ति में आसानी होगी। साथ ही, अनाज अधिप्राप्ति के दौरान भुगतान की प्रक्रिया भी तेज और पारदर्शी बनेगी। मंत्री ने गेहूं अधिप्राप्ति अभियान की भी समीक्षा की और लक्ष्य प्राप्ति के लिए अधिकारियों को फील्ड में सक्रिय रहने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि पैक्स केवल अनाज खरीदने तक सीमित न रहें, बल्कि वे किसानों के लिए आधुनिक सेवा केंद्र के रूप में विकसित हों।

शहद और बुनकरों के लिए नई बाजार रणनीति

​बिहार का शहद अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। शहद उत्पादक सहकारी समितियों के उत्पादों को बेहतर बाजार मूल्य दिलाने के लिए मूल्य संवर्धन (Value Addition) पर जोर दिया गया। मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि वे शहद की ब्रांडिंग और पैकेजिंग के लिए प्रभावी रणनीति बनाएं। इसके अलावा, बुनकर सहयोग समितियों को लेकर भी विस्तार से चर्चा की गई। राज्य के बुनकरों को तकनीकी सहयोग और वित्तीय मदद उपलब्ध कराने के लिए विभाग अब व्यवहारिक और परिणामोन्मुखी प्रस्ताव तैयार करेगा, ताकि इस पारंपरिक उद्योग को आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुसार ढाला जा सके।

प्रशासनिक ढांचा और स्वावलंबी सहकारी समिति अधिकरण

​सहकारिता विभाग अब प्रशासनिक रूप से भी खुद को सशक्त कर रहा है। अनुमंडल स्तर पर विभागीय कार्यालयों के निर्माण का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है ताकि स्थानीय स्तर पर किसानों और सहकारी समितियों को विभागीय सहायता प्राप्त करने के लिए जिला मुख्यालय न जाना पड़े। इससे प्रशासनिक कार्यों की दक्षता बढ़ेगी।

​एक और महत्वपूर्ण निर्णय ‘बिहार राज्य स्वावलंबी सहकारी समिति अधिकरण’ (Tribunal) को लेकर लिया गया। मंत्री ने इसे यथाशीघ्र कार्यरत करने का निर्देश दिया है, ताकि सहकारी समितियों के बीच होने वाले कानूनी विवादों का निपटारा जल्द हो सके। इसके साथ ही, सभी स्तर के पदाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे नियमित रूप से समितियों का निरीक्षण करें। केवल कागजों पर चल रही समितियों को चिन्हित कर उन्हें क्रियाशील बनाया जाएगा ताकि सहकारिता आंदोलन का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँच सके। मंत्री ने साफ किया कि योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी भी स्तर पर देरी या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी।

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