​बिहार में किसानों की डिजिटल पहचान का दूसरा अध्याय: विजय कुमार सिन्हा ने शुरू की फार्मर रजिस्ट्री, बिचौलियों का खेल होगा खत्म

पटना। बिहार के कृषि परिदृश्य में मंगलवार, 12 मई 2026 का दिन एक तकनीकी युगांतर के रूप में दर्ज हो गया है। राजधानी पटना के कृषि भवन स्थित सभागार से राज्य के कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने ‘फार्मर रजिस्ट्री’ के दूसरे चरण का विधिवत शुभारंभ किया। यह पहल राज्य के करोड़ों अन्नदाताओं को एक विशिष्ट डिजिटल पहचान प्रदान करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम मानी जा रही है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिए अब बिहार के किसानों को खाद, बीज, कृषि ऋण और फसल सहायता जैसी महत्वपूर्ण सुविधाओं के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे। डिजिटल इंडिया के विजन को धरातल पर उतारते हुए ‘एग्री स्टैक’ तकनीक के माध्यम से बिचौलियों की उस पुरानी दीवार को ढहाने की तैयारी पूरी कर ली गई है, जो वर्षों से सरकार और किसानों के बीच बाधक बनी हुई थी।

पांच किसानों को मिली पहली डिजिटल पहचान

​दूसरे चरण की शुरुआत के प्रतीक के रूप में कृषि मंत्री ने पटना जिला के फुलवारीशरीफ प्रखंड के पांच चयनित किसानों को उनकी फार्मर आई॰डी॰ सौंपी। इन लाभार्थियों में लछमिनिया देवी, सुनील कुमार सिंह, रामप्रवेश सिंह, अजय कुमार और उदय कुमार शामिल थे। इन किसानों के लिए यह आई॰डी॰ केवल एक सरकारी नंबर नहीं, बल्कि उनकी कृषि योग्य भूमि और उनके अधिकारों का एक डिजिटल दस्तावेज है। इस वितरण के साथ ही विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में राज्य के प्रत्येक पंजीकृत किसान के पास यह पहचान पत्र होगा, जो उन्हें वैश्विक कृषि मानकों और आधुनिक बाजार की सूचनाओं से सीधे जोड़ेगा।

एग्री-स्टैक: पारदर्शिता का डिजिटल सेतु

​समारोह को संबोधित करते हुए विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि बिहार के कृषि क्षेत्र के लिए यह एक ऐतिहासिक और गौरवशाली क्षण है। उन्होंने इस अभियान को एक ऐसी डिजिटल क्रांति करार दिया जो अन्नदाताओं के जीवन में खुशहाली और पारदर्शिता का नया सवेरा लेकर आएगी। कृषि मंत्री के अनुसार, यह पूरी पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस विजन का हिस्सा है जिसमें तकनीक के माध्यम से देश के अंतिम व्यक्ति को सशक्त बनाने का संकल्प लिया गया है।

​उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘एग्री-स्टैक’ कोई सामान्य सॉफ्टवेयर नहीं है, बल्कि यह सरकार और किसान के बीच एक अभेद्य और पारदर्शी सेतु है। यह तकनीक सुनिश्चित करेगी कि सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी अड़चन और बिना किसी कमीशनखोरी के सीधे पात्र किसान के खाते में पहुँचे। मंत्री ने कहा कि जब तकनीक और पसीने का मेल होगा, तभी बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था सही मायने में आत्मनिर्भर बनेगी और विकसित बिहार का सपना साकार होगा।

राजस्व और कृषि विभाग का अभूतपूर्व समन्वय

​इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत दो महत्वपूर्ण विभागों—कृषि और राजस्व एवं भूमि सुधार—का आपसी तालमेल है। विजय कुमार सिन्हा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान म्यूटेशन और परिमार्जन की प्रक्रिया को पोर्टल के जरिए युद्धस्तर पर सुधारा गया था। उसी सुदृढ़ आधारभूमि पर आज फार्मर रजिस्ट्री की यह भव्य इमारत खड़ी हो पाई है।

​वर्तमान में राज्य में कुल 4 करोड़ 54 लाख जमाबंदी कायम है। कृषि विभाग के पोर्टल पर अब तक 88 लाख 40 हजार किसानों का ई-के०वाई०सी० सफलतापूर्वक पूर्ण किया जा चुका है। इनमें से 47 लाख 85 हजार किसानों की फार्मर आई०डी० तैयार हो चुकी है, जबकि शेष 40 लाख 54 हजार किसानों का पंजीकरण इस दूसरे चरण में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। राजस्व विभाग के भूमि रिकॉर्ड को कृषि विभाग के किसान डेटाबेस से जोड़ना एक जटिल कार्य था, जिसे अधिकारियों के समन्वय ने सरल बना दिया है।

प्रथम चरण की सफलता और राष्ट्रीय प्रोत्साहन

​बिहार ने फार्मर रजिस्ट्री के प्रथम चरण में जो कीर्तिमान स्थापित किया है, उसकी गूँज राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दे रही है। राज्य ने अब तक 55 प्रतिशत से अधिक का लक्ष्य हासिल कर लिया है। इसमें पी०एम०-किसान योजना के 23 लाख 79 हजार लाभार्थी किसान भी शामिल हैं, जिनमें से 28 प्रतिशत की आई०डी० बनाई जा चुकी है।

​बिहार के इस उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए भारत सरकार ने राज्य को 269 करोड़ 88 लाख रूपये की भारी-भरकम प्रोत्साहन राशि प्रदान की है। यह राशि उन अधिकारियों और कर्मचारियों की निष्ठा का परिणाम है जिन्होंने गांव-गांव जाकर डेटा संकलन और ई-के०वाई०सी० की प्रक्रिया को अंजाम दिया। कृषि मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह प्रोत्साहन राशि विभाग के मनोबल को बढ़ाएगी और दूसरे चरण के मिशन को और अधिक गति प्रदान करेगी।

रियल टाइम डेटा और दफ्तरों से मुक्ति

​मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के दूरगामी फायदों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका मूल उद्देश्य पूरी पारदर्शिता बरतना है। फार्मर आई॰डी॰ बन जाने के बाद किसानों को अपनी खेती से जुड़ी हर जानकारी और योजनाओं का लाभ लेने के लिए किसी सरकारी कार्यालय की चौखट नहीं लांघनी होगी। उन्हें रियल टाइम में यह पता चलेगा कि उनकी जमीन की स्थिति क्या है और वे किन लाभों के हकदार हैं।

​सबसे बड़ी राहत जमीन के परिमार्जन को लेकर मिलेगी। फार्मर रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूर्ण होते ही किसानों की जमीन का डेटा स्वतः अपडेट (परिमार्जन) हो जाएगा, जिससे भविष्य में भूमि संबंधी विवादों और सरकारी बाधाओं में कमी आएगी। यह व्यवस्था किसानों को अपनी ही जमीन पर फसल उत्पादन का असली हकदार और स्वतंत्र निर्णय लेने वाला मालिक बनाएगी।

यू०पी०आई० की तर्ज पर बदलेगी कृषि व्यवस्था

​कृषि विभाग के प्रधान सचिव नर्मदेश्वर लाल ने फार्मर रजिस्ट्री की तुलना यू०पी०आई० (UPI) क्रांति से की। उन्होंने याद दिलाया कि जब देश में डिजिटल भुगतान की शुरुआत हुई थी, तब लोगों को उसका महत्व समझ नहीं आया था, लेकिन आज वही यू०पी०आई० पूरी दुनिया में भारत की पहचान है। फार्मर आई॰डी० भी आने वाले समय में कृषि क्षेत्र का ‘यू०पी०आई०’ साबित होगी। उन्होंने राज्य के सभी किसानों से अपील की कि वे योजनाओं का निरंतर लाभ सुनिश्चित करने के लिए अपनी आई॰डी० अनिवार्य रूप से बनवाएं।

​समारोह के अंत में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव जय सिंह, कृषि विभाग के विशेष सचिव बीरेन्द्र प्रसाद यादव, कृषि निदेशक सौरभ सुमन यादव और उद्यान निदेशक अभिषेक कुमार सहित अन्य वरीय अधिकारियों ने भी इस मिशन को सफल बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई। दूसरे चरण के इस शुभारंभ ने यह साफ कर दिया है कि बिहार का कृषि क्षेत्र अब पारंपरिक ढर्रे को छोड़कर डेटा-आधारित आधुनिक खेती की ओर बढ़ चुका है, जहाँ बिचौलियों के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहेगा।

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