14 साल बाद लौटा ‘बहरूपिया’ बेटा निकला महाठग: बांका के हेचला गांव में बूढ़े मां-बाप से लूट लिए तीन लाख, फकीर के वेश में आए थे शिकारी

बौंसी (बांका)। भावनाओं के खेल में अक्सर इंसान अपनी तार्किक शक्ति खो देता है, और जब मामला औलाद से जुड़ा हो, तो आंखों पर ममता की पट्टी बंधना स्वाभाविक है। बांका जिले के बौंसी थाना क्षेत्र अंतर्गत हेचला गांव से एक ऐसी सनसनीखेज वारदात सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं और भरोसे को तार-तार कर दिया है। यहाँ एक परिवार की 14 साल पुरानी ममता को मोहरा बनाकर दो शातिर ठगों ने लाखों रुपये की चपत लगा दी। दिल्ली से लापता हुए बेटे का रूप धरकर आए एक युवक ने न केवल बूढ़े मां-बाप की आंखों में धूल झोंकी, बल्कि उनके जीवन भर की जमा-पूंजी भी डकार ली। यह मामला केवल ठगी का नहीं, बल्कि एक परिवार की उन उम्मीदों के कत्ल का है, जो पिछले डेढ़ दशक से अपने कलेजे के टुकड़े की राह देख रहे थे। 12 मई 2026 की इस घटना ने पूरे बौंसी इलाके में चर्चा और डर का माहौल पैदा कर दिया है कि कैसे बहरूपिये अब रिश्तों की आड़ में डकैती डाल रहे हैं।

सरंगी की धुन और ममता का सैलाब: शिकारी की पहली दस्तक

​हेचला गांव के रहने वाले अजीम अंसारी और उनकी पत्नी सयदा खातून के लिए वह दिन किसी चमत्कार से कम नहीं था, जब उनके घर के दरवाजे पर दो फकीर पहुंचे। गेरुआ वस्त्र, कंधे पर झोला और हाथ में सरंगी—उनका हुलिया किसी पहुंचे हुए साधु या फकीर जैसा था। लेकिन जैसे ही उनमें से एक युवक ने सयदा खातून को ‘मां’ कहकर पुकारा और खुद को उनका खोया हुआ बेटा सिकंदर अंसारी बताया, पूरे घर में खुशियों का सैलाब उमड़ पड़ा।

​मालूम हो कि अजीम अंसारी का पुत्र सिकंदर अंसारी करीब 14 वर्ष पहले दिल्ली में मजदूरी करने गया था और वहीं से संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गया था। परिवार ने उसे हर जगह ढूंढा, पुलिस की चौखट खटखटाई, लेकिन सिकंदर का कोई सुराग नहीं मिला। 14 साल के लंबे इंतजार के बाद जब एक युवक ने सिकंदर बनकर सामने खड़ा होने का दावा किया, तो बूढ़े माता-पिता ने कोई सवाल नहीं पूछा। युवक ने कुछ पुरानी धुंधली यादों और पारिवारिक संदर्भों का ऐसा ताना-बाना बुना कि सयदा खातून को यकीन हो गया कि उसकी कोख से जन्मा बेटा वापस लौट आया है। दूसरे युवक ने खुद को ‘सिकंदर’ का वफादार साथी बताया, जिसने उसे कठिन समय में सहारा दिया था।

भरोसे की नींव पर ठगी की इमारत: तीन लाख का ‘मायाजाल’

​परिवार ने दोनों युवकों को न केवल घर में पनाह दी, बल्कि उनकी खूब खातिरदारी भी की। गांव वालों के अनुसार, कुछ दिनों तक सब कुछ सामान्य रहा। कथित बेटा अपनी बनावटी कहानियों से परिवार का भरोसा जीतता रहा। जब उसे लगा कि अब मां-बाप उसकी हर बात पर आंख मूंदकर विश्वास करने लगे हैं, तो उसने अपना असली खेल शुरू किया।

​ठग ने धीरे-धीरे अपनी आर्थिक तंगी और ‘गंभीर बीमारी’ का रोना रोना शुरू किया। उसने बताया कि 14 साल के वनवास के दौरान उस पर काफी कर्ज हो गया है और उसकी सेहत भी ठीक नहीं रहती, जिसके इलाज के लिए बड़ी रकम की जरूरत है। ममता में अंधी मां और बेटे की वापसी से भावुक पिता ने अपनी जमीन, गहने और बरसों की बचत से जोड़कर रखे गए करीब तीन लाख रुपये धीरे-धीरे उस युवक के हाथों में सौंप दिए। युवक कभी व्यवसाय शुरू करने के नाम पर तो कभी पुराने साथियों का हिसाब चुकता करने के बहाने पैसे ऐंठता रहा। ठगी का यह सिलसिला कई दिनों तक चला और परिवार को इस बात की भनक तक नहीं लगी कि वे एक पेशेवर अपराधी को अपनी गाढ़ी कमाई भेंट कर रहे हैं।

चंपत हुए ‘फकीर’, पीछे छोड़ गए आंसू और बदनामी

​जब करीब तीन लाख रुपये की मोटी रकम हाथ लग गई, तो उन शातिर ठगों ने वहां से निकलने की योजना बनाई। एक सुबह जब परिवार के सदस्य सोकर उठे, तो देखा कि ‘बेटा’ और उसका साथी गायब हैं। शुरुआत में परिवार को लगा कि शायद वे किसी काम से बाहर गए होंगे, लेकिन जब दोपहर तक वे नहीं लौटे और उनके मोबाइल नंबर भी बंद आने लगे, तो अजीम अंसारी को अनहोनी की आशंका हुई।

​घर के भीतर रखे गहनों और रुपयों की जांच की गई, तो पता चला कि नकदी के साथ-साथ कुछ कीमती सामान भी गायब है। तब जाकर इस पूरे षड्यंत्र का पर्दाफाश हुआ। वह युवक न तो सिकंदर अंसारी था और न ही उसका कोई साथी। वह एक पेशेवर ठग था, जिसने फकीर के वेश में इस परिवार की भावनाओं का सौदा किया था। हेचला गांव में जैसे ही यह खबर फैली, ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। हर कोई इस बात से हैरान था कि 14 साल बाद लौटे बेटे की पहचान करने में परिवार से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई।

ग्रामीण इलाकों में बहरूपियों का बढ़ता आतंक

​बांका के बौंसी और आसपास के सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह की वारदातों में इजाफा देखा जा रहा है। अपराधी अक्सर ऐसे परिवारों को चिन्हित करते हैं जिनका कोई सदस्य लंबे समय से लापता हो या बाहर रहता हो। वे गांव में घूम-घूमकर पहले जानकारी इकट्ठा करते हैं और फिर फकीर, बाबा या बहरूपिये का वेश धरकर प्रवेश करते हैं। हेचला गांव की इस घटना ने पुलिस प्रशासन के लिए भी एक नई चुनौती पेश कर दी है।

​अजीम अंसारी के घर हुई इस ठगी ने यह भी साबित कर दिया है कि डिजिटल युग में भी लोग पुरानी पद्धति के ठगों का शिकार हो रहे हैं। पुलिस का कहना है कि अपराधियों ने मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर इस घटना को अंजाम दिया। वे जानते थे कि 14 साल में इंसान का चेहरा बदल जाता है, इसलिए उन्होंने ‘फकीर’ के हुलिए का सहारा लिया ताकि चेहरे की बनावट को लेकर कोई शक न हो।

पुलिसिया तफ्तीश और साक्ष्यों की तलाश

​बौंसी थाना पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए घटनास्थल का मुआयना किया है। पीड़ित परिवार की ओर से लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है। पुलिस अब उन संदिग्ध युवकों के हुलिए और उनके आने-जाने के रास्तों के सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। चूंकि वे सरंगी लेकर गांव में घूम रहे थे, इसलिए पुलिस उन गांवों में भी पूछताछ कर रही है जहाँ वे पहले देखे गए थे।

​अजीम अंसारी और सयदा खातून की स्थिति अभी ऐसी नहीं है कि वे विस्तार से कुछ बता सकें। बेटे की वापसी की खुशी अब दोहरे दुख में बदल गई है—एक तो पैसा गया और दूसरा वह उम्मीद भी टूट गई कि उनका बेटा जीवित है और वापस आ सकता है। स्थानीय लोगों ने मांग की है कि ऐसे बहरूपियों और संदिग्धों पर नजर रखने के लिए ग्राम स्तर पर निगरानी समितियां बनाई जाएं।

भविष्य के लिए सबक: पहचान के बिना न करें भरोसा

​यह घटना बांका जिले के हर उस परिवार के लिए एक चेतावनी है जिसके सदस्य घर से दूर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कोई लंबे समय बाद वापस लौटता है, तो केवल भावनात्मक बातों पर यकीन न करें। आज के समय में डीएनए टेस्ट या आधार कार्ड जैसे कई तरीके हैं जिनसे पहचान की पुष्टि की जा सकती है।

​हेचला गांव की यह कहानी अब हर घर की चर्चा बन गई है। लोग अब किसी भी अनजान फकीर या साधु को गांव में प्रवेश देने से पहले कतरा रहे हैं। तीन लाख रुपये की यह ठगी अजीम अंसारी के परिवार के लिए एक ऐसी चोट है, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो पाएगी। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि वे जल्द ही इन शातिर ठगों को सलाखों के पीछे पहुँचाएंगे, लेकिन तब तक हेचला गांव के उस घर में केवल सन्नाटा और ठगे जाने का पछतावा ही शेष है।

​बांका में हुई इस घटना ने रिश्तों की पवित्रता और सुरक्षा के मानकों पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है। क्या हमारा कानून और पुलिसिया तंत्र इन ‘इमोशनल ठगों’ के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई कर पाएगा, या फिर ऐसे ही बहरूपिये ममता का कत्ल करते रहेंगे? इस सवाल का जवाब अब पुलिस की आने वाली जांच रिपोर्ट पर टिका है।

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