अंग की बौद्धिक संपदा का डिजिटल दस्तावेजीकरण: भागलपुर में 11,614 प्राचीन पांडुलिपियों का हुआ सर्वे, कुप्पा घाट से मिले अनमोल हस्तलिखित ग्रंथ

भागलपुर। इतिहास के पन्नों में अपनी गहरी पैठ रखने वाली अंग जनपद की धरती एक बार फिर अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा के कारण चर्चा के केंद्र में है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के साझा तत्वावधान में संचालित ‘ज्ञान भारतम मिशन’ ने भागलपुर जिले में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जिले के विभिन्न कोनों में छिपी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने के क्रम में अब तक कुल 11,614 पांडुलिपियों का सफलतापूर्वक सर्वेक्षण किया जा चुका है। यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उन हजारों वर्षों के ज्ञान, दर्शन और साहित्य का प्रमाण है जो अब तक धूल भरी आलमारियों और मठों के बक्सों में कैद था। जिला प्रशासन की इस सक्रियता से अब भागलपुर की यह अनमोल विरासत डिजिटल रूप में सुरक्षित होकर वैश्विक शोधार्थियों के लिए सुलभ होने की दिशा में बढ़ चली है।

ज्ञान भारतम मिशन: प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल

​भागलपुर में इस वृहद सर्वेक्षण कार्य का नेतृत्व जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन कर रहे हैं। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को एक सूत्र में पिरोना है। सर्वेक्षण के दौरान चम्पापुर दिगंबर जैन मंदिर के प्राचीन ग्रंथों से लेकर भगवान पुस्तकालय की दुर्लभ कृतियों तक को खंगाला गया। इसके अलावा शाह मार्केट स्थित पीर दमड़िया की खानकाह, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी और भागलपुर संग्रहालय में संरक्षित हस्तलिखित दस्तावेजों को इस सूची में शामिल किया गया है।

​इन सभी दस्तावेजों की जानकारी ‘ज्ञान भारतम’ मोबाइल ऐप पर अपलोड की जा चुकी है। तकनीक का यह उपयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे न केवल डेटा सुरक्षित रहेगा, बल्कि यह भी पता चल सकेगा कि भागलपुर के किस हिस्से में किस विषय से संबंधित प्राचीन साहित्य मौजूद है। अंकित रंजन ने बताया कि यह मिशन केवल दस्तावेजीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका बड़ा लक्ष्य इन छिपे हुए तथ्यों को प्रकाश में लाकर उन पर शोध और प्रकाशन को बढ़ावा देना है।

पांडुलिपि की परिभाषा और पहचान के मानक

​अक्सर लोगों के मन में यह सवाल होता है कि आखिर किन दस्तावेजों को पांडुलिपि की श्रेणी में रखा जाता है। सर्वेक्षण टीम ने इसके लिए स्पष्ट मानक निर्धारित किए हैं। पांडुलिपि के अंतर्गत वे हस्तलिखित ग्रंथ या दस्तावेज आते हैं जिनका कोई विशेष सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक या साहित्यिक महत्व हो। सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि ये दस्तावेज कम से कम 75 वर्ष पुराने होने चाहिए।

​ये पांडुलिपियां केवल कागज पर ही नहीं, बल्कि ताड़पत्र, कपड़े, लकड़ी की छाल या अन्य प्राचीन सामग्रियों पर हाथ से लिखी होनी आवश्यक हैं। मशीनी छपाई वाले ग्रंथों को इस सर्वेक्षण से बाहर रखा गया है। भागलपुर में मिले संग्रहों में कई ऐसे ग्रंथ हैं जो सदियों पुराने हैं और उनमें अंग क्षेत्र की स्थानीय बोलियों, न्याय शास्त्र, आयुर्वेद और प्राचीन न्याय धर्म की विस्तृत जानकारी मौजूद है।

कुप्पा घाट में 705 नई पांडुलिपियों की खोज: अंग संस्कृति का खजाना

​सोमवार, 11 मई 2026 को इस सर्वेक्षण अभियान में एक नया अध्याय जुड़ा जब टीम महर्षि मेंहि आश्रम, कुप्पा घाट पहुँची। यहाँ आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ साहित्य का भी एक अद्भुत संसार मिला। जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने आश्रम के सहयोग से कुल 705 पांडुलिपियों का सर्वेक्षण कार्य पूर्ण किया। महर्षि मेंहि द्वारा लिखित और उनके द्वारा सहेजे गए इन हस्तलिखित ग्रंथों में अंग क्षेत्र की लोक संस्कृति, न्याय धर्म और लघु कथाओं का ऐसा संग्रह मिला है जो अब तक सार्वजनिक विमर्श से दूर था।

​सर्वेक्षण के दौरान कुप्पा घाट के आध्यात्मिक गुरुओं का भी भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ। इस मौके पर गुरुसेवी स्वामी भागीरथ महाराज, स्वामी नाथु बाबा, स्वामी पंकज बाबा और स्वामी उदय बाबा उपस्थित रहे। इन पांडुलिपियों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि महर्षि मेंहि ने किस प्रकार अध्यात्म को लोक कथाओं और सरल भाषा के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया था। इन दस्तावेजों का डिजिटल होना शोधार्थियों के लिए नए द्वार खोलेगा।

स्वामित्व का अधिकार और प्रोत्साहन की योजना

​सर्वेक्षण को लेकर आम लोगों और संस्थाओं के मन में एक बड़ा संशय यह रहता है कि क्या जानकारी साझा करने पर उनके दस्तावेज सरकार ले लेगी। अंकित रंजन ने इस भ्रम को पूरी तरह दूर करते हुए स्पष्ट किया है कि पांडुलिपि का भौतिक अधिकार हमेशा उसी व्यक्ति या संस्था के पास रहेगा जिसके पास वह वर्तमान में मौजूद है। सरकार केवल उसकी डिजिटल जानकारी और फोटो ऐप पर दर्ज कर रही है ताकि उसका रिकॉर्ड सुरक्षित रहे।

​इसके साथ ही, जिला प्रशासन ने एक अनूठी प्रोत्साहन योजना भी शुरू की है। यदि कोई व्यक्ति अपने पास रखे वास्तविक और महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की जानकारी ‘ज्ञान भारतम’ ऐप के माध्यम से साझा करता है, तो जिला प्रशासन उसकी सराहना करेगा। वास्तविक और ऐतिहासिक रूप से मूल्यवान पांडुलिपियों की सूचना देने वाले व्यक्तियों को जिला प्रशासन द्वारा सार्वजनिक रूप से सम्मानित भी किया जाएगा। इसका उद्देश्य लोगों के भीतर अपनी विरासत को लेकर गौरव की भावना जगाना और उन्हें संरक्षण के प्रति प्रेरित करना है।

भागलपुर संग्रहालय में पुस्तकालय का नया सवेरा

​पांडुलिपि सर्वेक्षण के साथ-साथ भागलपुर की साहित्यिक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। भागलपुर संग्रहालय में नवनिर्मित पुस्तकालय का लोकार्पण आगामी 14 मई को होने जा रहा है। सहायक संग्रहालयाध्यक्ष अंकित रंजन ने जिले के तमाम विद्वानों, लेखकों और पुस्तक प्रेमियों से एक विशेष अपील की है। उन्होंने आग्रह किया है कि यदि किसी के पास कला, संस्कृति या इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं, तो वे उन्हें संग्रहालय के इस पुस्तकालय को दान कर सकते हैं।

​इस मुहिम का असर भी दिखने लगा है। सोमवार को गुरुसेवी स्वामी भागीरथ महाराज ने महर्षि मेंहि आश्रम द्वारा प्रकाशित कई महत्वपूर्ण पुस्तकों को संग्रहालय के पुस्तकालय हेतु भेंट किया। इन पुस्तकों के जुड़ने से संग्रहालय की साहित्यिक निधि और अधिक समृद्ध हुई है। 14 मई को होने वाले लोकार्पण समारोह में केवल फीता नहीं काटा जाएगा, बल्कि इस अवसर पर कई सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन भी होगा, जिससे शहर के बौद्धिक वातावरण को नई दिशा मिलेगी।

विरासत को बचाने का सामूहिक संकल्प

​भागलपुर में 11,614 पांडुलिपियों का आंकड़ा यह बताता है कि यह जिला प्राचीन काल में शिक्षा और दर्शन का कितना बड़ा केंद्र रहा होगा। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की इस धरती पर ज्ञान की धारा कभी रुकी नहीं, बस समय की धूल ने उसे थोड़ा ओझल कर दिया था। अब ‘ज्ञान भारतम मिशन’ उस धूल को हटाकर हमारी जड़ों से हमें दोबारा जोड़ने का काम कर रहा है। प्रशासन का यह प्रयास और आम जनता का सहयोग मिलकर भागलपुर को एक बार फिर से ‘ज्ञान की नगरी’ के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है।

​इन पांडुलिपियों में छिपा ज्ञान जब दुनिया के सामने आएगा, तो निश्चित रूप से अंग क्षेत्र के इतिहास और यहाँ की महान विभूतियों के बारे में कई नए तथ्य उजागर होंगे। फिलहाल, सर्वेक्षण की यह रफ़्तार और संग्रहालय में नए पुस्तकालय की तैयारी भागलपुर के सांस्कृतिक गौरव को एक नए शिखर पर ले जाने का वादा करती है।

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