
भागलपुर। बिहार के प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के उद्देश्य से सोमवार, 11 मई 2026 को भागलपुर के जिला समाहारणालय में सुशासन की एक जीवंत तस्वीर देखने को मिली। अवसर था बिहार सरकार की अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना ‘7 निश्चय-3: बढ़ेगा अपना बिहार’ के अंतर्गत संचालित ‘सबका सम्मान–जीवन आसान (Ease of Living)’ कार्यक्रम का। इस विशेष जनसुनवाई के दौरान जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी ने समीक्षा भवन में आम नागरिकों की समस्याओं को न केवल सुना, बल्कि उनके त्वरित और न्यायसंगत समाधान के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा भी निर्धारित की। यह कार्यक्रम राज्य सरकार की उस प्रतिबद्धता का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य सरकारी सेवाओं तक हर व्यक्ति की पहुंच को सुगम बनाना और उनके दैनिक जीवन में आने वाली प्रशासनिक अड़चनों को न्यूनतम करना है। सोमवार की इस सुनवाई में भागलपुर की जनता की उम्मीदों और प्रशासन की सक्रियता का एक अनूठा संगम दिखाई दिया, जहाँ फाइलों के बोझ से दबे आवेदनों को एक नया जीवन मिलता महसूस हुआ।
समीक्षा भवन में न्याय की गूँज: 30 आवेदनों का हुआ सूक्ष्म परीक्षण
समीक्षा भवन की दहलीज पर सोमवार को पहुंचे करीब 30 आवेदकों के चेहरों पर एक उम्मीद भरी चमक थी। नवल किशोर चौधरी ने स्वयं प्रत्येक आवेदक की समस्या को विस्तार से सुना। जनसुनवाई की मेज पर पहुंचे इन 30 मामलों में विविधता थी, लेकिन दर्द एक जैसा था—समय पर काम न होने की टीस। इनमें से सबसे अधिक मामले लंबित पेंशन और जटिल भूमि विवादों से जुड़े थे। जिलाधिकारी ने एक-एक फाइल का अवलोकन किया और संबंधित विभागीय अधिकारियों को तत्काल मौके पर तलब कर पूछा कि आखिर देरी की वजह क्या है।
पेंशन से संबंधित मामलों में उन्होंने स्पष्ट किया कि बुजुर्गों और असहाय लोगों की सामाजिक सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार की लापरवाही अक्षम्य है। उन्होंने निर्देश दिया कि पेंशन के वे मामले जो तकनीकी कारणों से अटके हैं, उन्हें 48 घंटों के भीतर दुरुस्त किया जाए। वहीं, भूमि विवाद के मामलों में उन्होंने अंचल अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे केवल फाइलों पर आदेश न दें, बल्कि धरातल पर जाकर मापी और सीमांकन की प्रक्रियाओं को पूर्ण करें ताकि विवाद का जड़ से अंत हो सके।
विकेंद्रीकृत सुशासन: प्रखंड से थाने तक सजीं चौपालें
’सबका सम्मान-जीवन आसान’ कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विकेंद्रीकृत प्रकृति है। यह सुनवाई केवल जिला मुख्यालय तक सीमित नहीं रही। सोमवार को भागलपुर के तमाम प्रखंडों, अंचलों, थानों और अन्य विभागीय कार्यालयों में भी इसी तर्ज पर जनसुनवाई आयोजित की गई। जिला प्रशासन का यह संदेश स्पष्ट था कि जनता को अपने छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों के लिए जिला मुख्यालय तक दौड़ न लगानी पड़े।
प्रखंड स्तर पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और प्रत्यक्ष मुलाकातों के जरिए खंड विकास अधिकारियों ने ग्रामीण जनता की समस्याओं को सुना। थानों में थानाध्यक्षों ने उन मामलों को प्राथमिकता दी जहाँ पारिवारिक विवाद या पड़ोसियों के बीच की तनातनी को आपसी संवाद से सुलझाया जा सकता था। अंचल कार्यालयों में राजस्व से जुड़ी अड़चनों को दूर करने के लिए विशेष काउंटर सक्रिय दिखे। यह ‘होल ऑफ गवर्नमेंट’ अप्रोच सुशासन की उस भावना को बल देती है जहाँ शासन स्वयं नागरिक के द्वार तक पहुँचता है, न कि नागरिक को शासन की खोज में भटकना पड़ता है।
मर्यादा और सुविधा: आवेदक के सम्मान पर विशेष ध्यान
अक्सर सरकारी कार्यालयों में आने वाले आम नागरिक उपेक्षा का शिकार महसूस करते हैं, लेकिन सोमवार की जनसुनवाई में इस परिपाटी को बदलते देखा गया। ‘सबका सम्मान’ के नारे को चरितार्थ करते हुए समीक्षा भवन और अन्य केंद्रों पर आवेदकों के लिए बैठने की समुचित और सम्मानजनक व्यवस्था की गई थी। भीषण गर्मी को देखते हुए शुद्ध पेयजल और सुलभ शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की गई थी, ताकि दूर-दराज के गांवों से आए लोगों को किसी प्रकार की शारीरिक कठिनाई न हो।
इसके साथ ही, प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ाते हुए सभी शिकायतों का विधिवत पंजीकरण डिजिटल पोर्टल पर किया गया। प्रत्येक आवेदक को एक विशिष्ट पंजीकरण संख्या के साथ प्राप्ति रसीद उपलब्ध कराई गई। यह रसीद केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह आवेदक और प्रशासन के बीच एक औपचारिक अनुबंध है, जो यह सुनिश्चित करता है कि आपकी समस्या अब रिकॉर्ड पर है और इसकी मॉनिटरिंग सीधे जिला और राज्य स्तर से की जा रही है। पंजीकरण की यह व्यवस्था बिचौलियों के प्रभाव को शून्य करने में अत्यंत सहायक सिद्ध हो रही है।
7 निश्चय-3: विकसित बिहार की नई आधारशिला
नवल किशोर चौधरी ने बैठक के दौरान उपस्थित अधिकारियों को ‘7 निश्चय-3’ के लक्ष्यों की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि ‘बढ़ेगा अपना बिहार’ का सपना तभी साकार होगा जब राज्य का हर नागरिक अपने जीवन में प्रशासनिक सुगमता का अनुभव करेगा। ‘इज ऑफ लिविंग’ यानी जीवन का आसान होना केवल एक नारा नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक विकास की अनिवार्य शर्त है। यदि एक किसान को अपनी जमीन की रसीद कटवाने या एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को अपनी पेंशन शुरू कराने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है, तो वह विकास की मुख्यधारा से पिछड़ जाता है।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे लंबित आवेदनों को केवल ‘पेंडिंग’ सूची में न डालें, बल्कि उनके समाधान के लिए ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ तैयार करें। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि निष्पक्षता सुशासन की पहली शर्त है। किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में आए बिना केवल न्याय और नियमों के आधार पर ही फाइलों का निपटारा होना चाहिए। प्रशासन की इस सक्रियता ने भागलपुर के आम जनों में यह विश्वास पैदा किया है कि उनकी शिकायतों को न केवल सुना जा रहा है, बल्कि उन पर प्रभावी कार्रवाई भी हो रही है।
जमीनी विवाद और पेंशन: दो मुख्य चुनौतियां
भागलपुर जिले की भौगोलिक और सामाजिक संरचना में भूमि विवाद एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। जनसुनवाई में आए आवेदनों का बड़ा हिस्सा इसी ओर इशारा कर रहा था। नवल किशोर चौधरी ने राजस्व अधिकारियों को कड़े लहजे में कहा कि वे राजस्व ग्रामों के नक्शों और खतियानों का नियमित मिलान करें। यदि कहीं कोई जानबूझकर गड़बड़ी पाई जाती है, तो संबंधित कर्मी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई से भी गुरेज नहीं किया जाएगा।
पेंशन से जुड़े मामलों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए। उन्होंने बैंकिंग संस्थानों और डाकघरों के साथ भी समन्वय बिठाने का निर्देश दिया ताकि लाभार्थियों के खातों में राशि पहुँचने में कोई तकनीकी बाधा न आए। सोमवार की यह जनसुनवाई भागलपुर जिला प्रशासन की उस कार्यसंस्कृति का दर्पण है, जहाँ तकनीक और मानवीय संवेदना का मेल सुशासन की नई इबारत लिख रहा है। आने वाले सप्ताहों में इन 30 मामलों के निष्पादन की स्थिति यह तय करेगी कि ‘सबका सम्मान-जीवन आसान’ अभियान भागलपुर की जनता के लिए कितना फलदायी साबित होता है। फिलहाल, प्रशासनिक मुस्तैदी ने यह साफ कर दिया है कि भागलपुर में अब किसी की फरियाद अनसुनी नहीं रहेगी।


