
भागलपुर: सुल्तानगंज नगर परिषद के सभापति राजकुमार गुड्डू की अंतिम यात्रा ने पूरे शहर को गहरे शोक में डुबो दिया। जिस दिन उनका 43वां जन्मदिन था, उसी दिन उनकी अंतिम विदाई निकली। यह संयोग नहीं बल्कि एक ऐसा दर्द बन गया, जिसने पूरे सुल्तानगंज को रुला दिया। जन्मदिन पर जहां परिवार और समर्थकों के बीच खुशियों का माहौल होना चाहिए था, वहीं उसी दिन उनके पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया।
गंगा किनारे बसे सुल्तानगंज शहर में रविवार को हर तरफ मातम पसरा रहा। बाजारों में सन्नाटा दिखाई दिया, लोगों की आंखें नम थीं और हर जुबान पर केवल एक ही चर्चा थी—“जिस दिन जन्म हुआ, उसी दिन विदाई हो गई।”
हजारों लोगों ने दी अंतिम विदाई
सुबह जैसे ही राजकुमार गुड्डू का पार्थिव शरीर उनके आवास से अंतिम यात्रा के लिए बाहर निकला, हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। शहर के अलग-अलग इलाकों से लोग अपने लोकप्रिय जनप्रतिनिधि को अंतिम विदाई देने पहुंचे।
अंतिम यात्रा सुल्तानगंज बाजार से होते हुए नमामि गंगे घाट तक पहुंची। रास्ते भर लोगों ने फूल बरसाकर श्रद्धांजलि दी। कई लोग अपने घरों और दुकानों के बाहर खड़े होकर नम आंखों से अंतिम दर्शन करते दिखाई दिए।
यात्रा के दौरान “राजकुमार गुड्डू अमर रहें” और “जब तक सूरज चांद रहेगा, राजकुमार गुड्डू तेरा नाम रहेगा” जैसे नारे लगातार गूंजते रहे।
12 वर्षीय बेटे ने दी मुखाग्नि
अंतिम संस्कार के दौरान सबसे भावुक दृश्य उस समय देखने को मिला जब राजकुमार गुड्डू के 12 वर्षीय बेटे राजवीर कुमार ने अपने पिता को मुखाग्नि दी।
घाट पर मौजूद लोग उस पल को देखकर खुद को रोक नहीं पाए। मासूम बेटे की आंखों में आंसू थे और पूरे माहौल में केवल सिसकियां सुनाई दे रही थीं।
परिवार के लोग बेसुध नजर आए। पत्नी, मां और रिश्तेदारों का रो-रोकर बुरा हाल था। कई लोगों की आंखें उस समय भर आईं जब बेटे ने कांपते हाथों से अपने पिता को अंतिम विदाई दी।
28 अप्रैल की घटना ने बदल दी जिंदगी
राजकुमार गुड्डू पर 28 अप्रैल को जानलेवा हमला हुआ था। बताया जाता है कि नगर परिषद कार्यालय में घुसकर अपराधियों ने उन पर गोलीबारी की थी।
हमले में नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण प्रसाद भी गंभीर रूप से घायल हुए थे। बाद में उनकी भी मौत हो गई थी।
घटना के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई थी। राजकुमार गुड्डू को गंभीर हालत में इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां वे कई दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करते रहे।
करीब 11 दिनों तक चले इलाज के बाद आखिरकार उन्होंने दम तोड़ दिया। संयोग ऐसा रहा कि जिस दिन उनका जन्मदिन था, उसी दिन उन्होंने अंतिम सांस ली।
पूरे शहर में शोक का माहौल
राजकुमार गुड्डू की मौत के बाद सुल्तानगंज पूरी तरह शोक में डूबा नजर आया। कई दुकानदारों ने स्वेच्छा से अपनी दुकानें बंद रखीं।
स्थानीय लोगों का कहना था कि राजकुमार गुड्डू केवल एक जनप्रतिनिधि नहीं थे, बल्कि आम लोगों से जुड़े नेता थे। वे हमेशा लोगों के सुख-दुख में शामिल रहते थे।
उनकी अंतिम यात्रा में सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों, व्यापारियों, युवाओं और महिलाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिली।
सुरक्षा के रहे पुख्ता इंतजाम
अंतिम यात्रा के दौरान प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। घर से लेकर नमामि गंगे घाट तक जगह-जगह पुलिस बल तैनात किया गया था।
सुल्तानगंज पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था की कमान संभाली हुई थी ताकि अंतिम यात्रा शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके।
घाट और प्रमुख चौक-चौराहों पर भारी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद रहे।
घाट पर भावुक हुआ माहौल
नमामि गंगे घाट पर जब अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो उठा।
कई बुजुर्ग लोगों ने कहा कि शहर ने एक ऐसा व्यक्ति खो दिया, जिसने हमेशा लोगों की मदद की। युवाओं ने उन्हें अपना मार्गदर्शक बताया।
महिलाएं भी लगातार रोती नजर आईं। घाट पर मौजूद कई लोग खुद को संभाल नहीं पा रहे थे।
कृष्ण भूषण प्रसाद को भी किया गया याद
अंतिम यात्रा और श्रद्धांजलि सभा के दौरान कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण प्रसाद को भी लोगों ने याद किया।
लोगों ने कहा कि वे भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए हमले का शिकार हुए थे। शहर के लोगों ने दोनों दिवंगत व्यक्तियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
कई लोगों ने अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग भी उठाई।
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में शोक
राजकुमार गुड्डू के निधन पर विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने शोक व्यक्त किया।
स्थानीय नेताओं ने कहा कि उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी। कई लोगों ने उन्हें जनता के बीच रहने वाला नेता बताया।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है।
लोगों की जुबान पर एक ही सवाल
अंतिम यात्रा के दौरान कई लोगों की जुबान पर एक ही सवाल था—“आखिर ऐसा क्यों हुआ?”
लोगों का कहना था कि जिस व्यक्ति का जन्मदिन था, उसी दिन उसकी अंतिम यात्रा निकलना बेहद दुखद और असहनीय है।
कई लोगों ने इसे किस्मत का सबसे क्रूर खेल बताया।
शहर ने खोया अपना लोकप्रिय चेहरा
राजकुमार गुड्डू को सुल्तानगंज में एक लोकप्रिय जनप्रतिनिधि माना जाता था। स्थानीय लोग बताते हैं कि वे आम लोगों के बीच लगातार सक्रिय रहते थे और क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर आवाज उठाते थे।
उनके निधन से शहर में एक खालीपन महसूस किया जा रहा है।
यादों में जिंदा रहेंगे राजकुमार गुड्डू
अंतिम संस्कार के बाद भी लोगों की भीड़ घाट पर बनी रही। कई लोग देर तक गंगा किनारे बैठकर उन्हें याद करते रहे।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि राजकुमार गुड्डू और कृष्ण भूषण प्रसाद की यादें हमेशा सुल्तानगंज के लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगी।
शहर के लोगों का कहना है कि समय भले गुजर जाए, लेकिन इस घटना का दर्द लंबे समय तक लोगों के दिलों में बना रहेगा।


