
पटना। बिहार की सत्ता में हुए हालिया प्रशासनिक फेरबदल और मंत्रिमंडल विस्तार ने राज्य के राजनैतिक तापमान को एक बार फिर से चरम पर पहुँचा दिया है। एक ओर जहाँ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इसे ‘विकसित बिहार’ की ओर बढ़ता हुआ एक संतुलित कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इस विस्तार को ‘परिवारवाद की नई प्रयोगशाला’ करार दिया है।राजद के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने एक कड़ा आधिकारिक बयान जारी करते हुए एनडीए गठबंधन पर जमकर प्रहार किया। राजद का आरोप है कि जो गठबंधन कल तक ‘परिवारवाद’ के मुद्दे पर विपक्ष को घेरता था, आज वही गठबंधन खुद ‘पितृ धर्म’ निभाने में व्यस्त है। इस राजनैतिक बयानबाजी ने बिहार की सियासत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसमें अब न केवल चेहरों पर, बल्कि एनडीए की मौलिक विचारधारा और उसके दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
‘विरासत की राजनीति’ पर राजद का सीधा प्रहार
राजद प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने अपने आरोपों की धार को विशेष रूप से उन मंत्रियों पर केंद्रित किया है जो किसी भी राजनैतिक घराने के उत्तराधिकारी के रूप में देखे जा रहे हैं। राजद का दावा है कि इस मंत्रिमंडल विस्तार में एनडीए ने उन मूल्यों को तिलांजलि दे दी है जिनका वे सार्वजनिक मंचों से प्रचार करते थे। चित्तरंजन गगन ने सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश का नाम लेकर सत्ता पक्ष को घेरा है।
राजद का कहना है कि ये दोनों ही चेहरे फिलहाल बिहार विधानमंडल के किसी भी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) के सदस्य नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपना यह दर्शाता है कि एनडीए में अब योग्यता और लोकतांत्रिक संघर्ष के बजाय ‘विरासत’ को प्राथमिकता दी जा रही है। चित्तरंजन गगन ने कटाक्ष करते हुए कहा कि परिवारवाद पर ऊँचे स्वर में बोलने वाले नेता आज खुद अपने बेटों को सत्ता के शीर्ष पर पहुँचाकर अपना ‘पितृ धर्म’ निभाते नजर आ रहे हैं। यह स्थिति उन कार्यकर्ताओं के लिए निराशाजनक है जो वर्षों से पार्टी के लिए जमीन पर पसीना बहाते हैं, लेकिन जब फल की बारी आती है तो वह केवल ‘राजकुमारों’ के हिस्से में जाता है।
आधी आबादी की उपेक्षा और सामाजिक असंतुलन का आरोप
मंत्रिमंडल की संरचना को लेकर राजद का दूसरा सबसे बड़ा हमला महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर है। चित्तरंजन गगन ने स्पष्ट रूप से आरोप लगाया कि इस नवगठित मंत्रिमंडल में महिलाओं को उनका वाजिब हक और प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। राजद का तर्क है कि एक ओर जहाँ देश और राज्य में महिला सशक्तिकरण और 33 फीसदी आरक्षण की बातें की जा रही हैं, वहीं जब सत्ता में भागीदारी देने का समय आया तो एनडीए ने महिलाओं को हाशिए पर धकेल दिया।
राजद प्रवक्ता के अनुसार, इस मंत्रिमंडल विस्तार में सामाजिक समीकरणों को साधने का जो दावा किया जा रहा है, वह पूरी तरह खोखला है। महिलाओं की कम भागीदारी यह साबित करती है कि एनडीए की नीतियां केवल कागजों तक सीमित हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं की उपेक्षा का खामियाजा आने वाले समय में सत्ता पक्ष को भुगतना पड़ेगा, क्योंकि बिहार की जागरूक महिला मतदाता अब केवल नारों से खुश होने वाली नहीं हैं। वे अपनी राजनैतिक भागीदारी के प्रति पूरी तरह सचेत हैं।
भाजपा के ‘कोर वोटरों’ में निराशा का दावा
राजद के हमलों का एक सिरा भारतीय जनता पार्टी के आंतरिक असंतोष से भी जुड़ा हुआ है। चित्तरंजन गगन ने अपने बयान में दावा किया कि इस मंत्रिमंडल विस्तार से भाजपा के पारंपरिक और ‘कोर’ मतदाताओं के बीच भारी निराशा व्याप्त है। उनका कहना है कि भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को उम्मीद थी कि इस बार उन लोगों को तरजीह मिलेगी जो पार्टी की विचारधारा के लिए समर्पित रहे हैं, लेकिन ‘परिवारवाद के बेहतर नजारे’ ने उन्हें सकते में डाल दिया है।
राजद का आरोप है कि भाजपा अब उन क्षेत्रीय दलों के नक्शेकदम पर चल रही है जिन्हें वह कल तक कोसती थी। अपने गठबंधन के साथियों को संतुष्ट करने और बड़े नेताओं के पुत्रों को सेटल करने की कवायद में भाजपा ने अपने उन सिद्धांतों के साथ समझौता कर लिया है, जो उसे अन्य दलों से अलग बनाते थे। चित्तरंजन गगन के अनुसार, एनडीए की इस ‘परिवारवादी’ कार्यशैली ने उन मतदाताओं का भरोसा तोड़ा है जो सुशासन और नीति-आधारित राजनीति की उम्मीद कर रहे थे।
एनडीए का बचाव और राजनैतिक वास्तविकता
हालांकि राजद के इन आरोपों पर सत्ता पक्ष का अपना तर्क है। एनडीए समर्थकों और राजनैतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह मानता है कि निशांत और दीपक प्रकाश जैसे युवाओं को शामिल करना ‘उत्तराधिकार’ से अधिक ‘युवा नेतृत्व’ को मौका देने का प्रयास है। निशांत जहाँ अपनी तकनीकी विशेषज्ञता (इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि) के साथ स्वास्थ्य जैसे जटिल विभाग को आधुनिक बनाने का विजन रखते हैं, वहीं दीपक प्रकाश अपनी उच्च शिक्षा और सांगठिनक समझ के साथ पंचायती राज व्यवस्था में नयापन ला सकते हैं।
संविधान के जानकारों का यह भी कहना है कि किसी भी व्यक्ति का बिना सदन का सदस्य रहे मंत्री बनना कोई गैर-कानूनी प्रक्रिया नहीं है। संविधान मंत्रियों को 6 महीने का समय देता है कि वे इस अवधि के भीतर किसी भी सदन की सदस्यता ग्रहण कर लें। एनडीए नेतृत्व का मानना है कि इन चेहरों को शामिल कर उन्होंने युवाओं और शिक्षित प्रोफेशनल्स को राजनीति की मुख्यधारा में जोड़ने का काम किया है। जहाँ तक महिलाओं की भागीदारी का सवाल है, सरकार का दावा है कि आने वाले समय में निगमों और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर महिलाओं को पर्याप्त स्थान देकर इस कमी को पूरा किया जाएगा।
सियासी दांव-पेच और भविष्य की राह
चित्तरंजन गगन के इस बयान ने बिहार में विपक्ष की रणनीति को स्पष्ट कर दिया है। राजद अब ‘परिवारवाद’ के हथियार का उपयोग एनडीए के खिलाफ ही करने की तैयारी में है। यह एक दिलचस्प मोड़ है, क्योंकि अब तक एनडीए तेजस्वी यादव और लालू परिवार पर इसी मुद्दे को लेकर हमलावर रहता था। अब राजद ने गेंद एनडीए के पाले में डाल दी है और वह जनता के बीच यह संदेश ले जाना चाहती है कि एनडीए और राजद की कार्यशैली में कोई मौलिक अंतर नहीं रह गया है।
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यह जुबानी जंग और तेज होने की उम्मीद है। राजद नेता जेड हसन और चित्तरंजन गगन जैसे प्रवक्ताओं के हमले यह संकेत दे रहे हैं कि विपक्ष अब एनडीए के ‘सुशासन’ और ‘सिद्धांतों’ की पोल खोलने के लिए हर छोटे-बड़े मुद्दे को राष्ट्रीय फलक पर ले जाएगा। अब देखना यह होगा कि सम्राट चौधरी की यह नई टीम राजद के इन तीखे सवालों का जवाब अपने काम से देती है या फिर केवल राजनैतिक बयानबाजी का यह दौर इसी तरह जारी रहता है। फिलहाल, पटना की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक, ‘विरासत बनाम विकास’ की यह बहस बिहार की नई राजनैतिक दिशा तय करती नजर आ रही है।


