
भागलपुर। बिहार की लाइफलाइन और उत्तर-दक्षिण बिहार को जोड़ने वाले विक्रमशिला महासेतु के स्लैब गिरने की घटना अब केवल एक हादसा नहीं, बल्कि ‘इंजीनियरिंग के भ्रष्टाचार और लापरवाही’ की एक बड़ी दास्तां बनती जा रही है। शुक्रवार, 08 मई 2026 को बिहार राज्य पुल निर्माण निगम और सीमा सड़क संगठन (BRO) के अभियंताओं की संयुक्त जांच रिपोर्ट ने उन कड़वे सत्यों को उजागर कर दिया है, जिसे अब तक फाइलों में दबाकर रखा गया था। जांच दल ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा है कि इस सेतु के निर्माण के दौरान कार्य एजेंसी यूपी ब्रिज कॉरपोरेशन लिमिटेड ने सुरक्षा मानकों को पूरी तरह धता बता दिया था। यह पुल अपनी उम्र पूरी करने से पहले ही इसलिए जवाब दे रहा है क्योंकि इसकी संरचना में इस्तेमाल की गई तकनीक और सामग्री के बीच कोई तालमेल नहीं था। अभियंताओं की इस रिपोर्ट ने अब न केवल निर्माण एजेंसी, बल्कि उस समय के निगरानी तंत्र पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्तमान में पुल के मलबे और उसकी आंतरिक दरारों की जो तस्वीर सामने आई है, वह किसी भी तकनीकी विशेषज्ञ को डराने के लिए काफी है।
स्लैब सपोर्ट में बड़ी चूक: ‘बैलेंसिंग’ के नाम पर हुआ खिलवाड़
बीआरओ और पुल निगम के अभियंताओं ने जब गिरे हुए स्लैब स्थल की गहराई से पड़ताल की, तो उन्हें एक ऐसी गड़बड़ी मिली जो सीधे तौर पर डिजाइन की विफलता को दर्शाती है। जांच में पाया गया कि स्लैब को रखने वाली जगह (Support Area) बेहद छोटी थी। तकनीकी भाषा में कहें तो बीम के ऊपर स्लैब का जो ‘सिटिंग एरिया’ होना चाहिए था, वह मानकों से काफी कम रखा गया था। इसी संकीर्ण आधार के कारण स्लैब अपना संतुलन खो बैठा और गंगा की लहरों में जा गिरा।
इंजीनियर अब इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या यह जानलेवा गड़बड़ी पुल के अन्य 50 से अधिक स्लैबों में भी दोहराई गई है? विशेष रूप से उन पिलरों के पास सघन जांच की जा रही है जहाँ की साइड वॉल (तटबंदी) अब दरकने लगी है। यदि अन्य पिलरों पर भी स्लैब का आधार इसी तरह कमजोर पाया गया, तो भविष्य में कोई बड़ी त्रासदी होने से इनकार नहीं किया जा सकता। यह खुलासा भागलपुर के उन हजारों मुसाफिरों के लिए डरावना है जो रोजाना इस पुल से गुजरते हैं।
‘गंगा की लहरों जैसा उबड़-खाबड़ पुल’: एक्सपर्ट ने उठाए डिजाइन पर सवाल
पुल निर्माण निगम के स्ट्रक्चरल इंजीनियर और विख्यात ब्रिज एक्सपर्ट आलोक भौमिक ने इस पूरे मामले में निर्माण एजेंसी को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि गड़बड़ी केवल एक जगह नहीं है, बल्कि पूरे पुल का ढांचा ही दोषपूर्ण प्रतीत होता है। एक्सपर्ट ने पुल के ‘लेवल डिजाइन’ पर तंज कसते हुए कहा कि सेतु की सड़क को देखने पर ऐसा महसूस होता है मानो गंगा की लहरें उठ रही हों। सड़क का स्तर एक समान न होना यह साबित करता है कि निर्माण के समय न तो सही नक्शे का पालन किया गया और न ही उचित ग्रेडिंग तकनीक अपनाई गई।
आलोक भौमिक ने सवाल उठाया कि उस वक्त इस तरह का दोषपूर्ण नक्शा किसने पास किया और किस आधार पर इसे तकनीकी स्वीकृति मिली? उनके अनुसार, इन पुराने सवालों के जवाब अब शायद ही कभी मिलें, लेकिन इसका खामियाजा आज की जनता भुगत रही है। उन्होंने साफ कहा कि अब पुरानी गलतियों को कोसने के बजाय नई तकनीक के माध्यम से पुल को ‘लाइफ सपोर्ट’ पर रखकर बचाने की कोशिश करनी होगी ताकि परिवहन पूरी तरह ठप न हो।
बीम के भीतर ‘एलीगेटर क्रैकिंग’: कमजोर आधार की गवाही
बीआरओ के अधिकारियों ने जब बीम के अंदरूनी ‘बॉक्स’ (Box Girder) की जांच की, तो वहां की स्थिति और भी विकट पाई गई। अधिकारियों ने बताया कि बीम के भीतर ‘एलीगेटर क्रैकिंग’ (Alligator Cracking) हो रही है। तकनीकी रूप से यह वह स्थिति है जब कंक्रीट की सतह मगरमच्छ की खाल की तरह फटने लगती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्रैकिंग तीन मुख्य कारणों से होती है:
- पुल पर क्षमता से अधिक भारी यातायात का निरंतर दबाव।
- निर्माण के समय इस्तेमाल किया गया कमजोर और मानक से नीचे का आधार।
- पुल की खराब जल निकासी व्यवस्था, जिसके कारण पानी कंक्रीट के भीतर रिसकर लोहे के सरियों को जंग लगा रहा है।
हालांकि, राहत की एक बात यह सामने आई है कि बीम का सबसे अंदरूनी हिस्सा अभी भी काफी हद तक दुरुस्त है। इसी मजबूत हिस्से को आधार बनाकर अब पुल को फिर से परिचालन योग्य (Motorable) बनाने की तैयारी चल रही है।
बेली ब्रिज या स्टील पाइल? पटना में होगा अंतिम फैसला
पुल को तत्काल चालू करने के लिए गुरुवार को भी इंजीनियरों की टीम ने पुल के फर्श की सूक्ष्म नापी की है। वर्तमान स्थिति और तकनीकी डेटा को संकलित कर एक विस्तृत रिपोर्ट पटना मुख्यालय को भेज दी गई है। अब सरकार और तकनीकी समिति के सामने दो मुख्य विकल्प हैं:
- बेली ब्रिज मॉडल (Bailey Bridge Model): इसमें प्री-फैब्रिकेटेड स्टील स्ट्रक्चर का उपयोग कर बीम के ऊपर एक नया रास्ता तैयार किया जाएगा।
- स्टील पाइल ब्रिज मॉडल (Steel Pile Bridge Model): यह अधिक स्थायी समाधान हो सकता है, लेकिन इसमें लागत और समय अधिक लगेगा।
पटना से हरी झंडी मिलते ही और राशि जारी होते ही काम युद्धस्तर पर शुरू कर दिया जाएगा। तब तक भागलपुर और नवगछिया के बीच के यातायात को केवल जलमार्ग और वैकल्पिक रास्तों के भरोसे ही रहना होगा। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि जब तक पुल की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, तब तक भारी वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध जारी रहेगा। यूपी ब्रिज कॉरपोरेशन की इस ऐतिहासिक कोताही ने आज भागलपुर को परिवहन के एक बड़े संकट में धकेल दिया है, जिससे उबरने में अभी महीनों का समय लग सकता है।


