शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल को मिली ऊर्जा विभाग की कमान

पटना। बिहार की राजनीति में गुरुवार, 07 मई 2026 का दिन केवल नए चेहरों के उदय का ही साक्षी नहीं बना, बल्कि कई पुराने और मंझे हुए सियासतदानों के ‘राज्याभिषेक’ का भी गवाह रहा। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की मौजूदगी में जब 32 मंत्रियों ने शपथ ली, तो उनमें एक नाम ऐसा था जिसकी गूंज अंग जनपद से लेकर कोसी और सीमांचल तक सुनाई दी। भागलपुर जिले के गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र से जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के विधायक शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल अब बिहार सरकार के नए ऊर्जा मंत्री हैं。 लालू प्रसाद यादव के कभी बेहद करीबी रहे और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के कद्दावर सांसद रह चुके बुलो मंडल का नीतीश कुमार की टीम में शामिल होना और सीधे ‘पॉवर’ (ऊर्जा) विभाग की जिम्मेदारी मिलना, उनके लंबे राजनैतिक संघर्ष और व्यक्तिगत जनाधार की बड़ी जीत मानी जा रही है। 5 बार विधायक और 1 बार सांसद रहने का विशाल अनुभव रखने वाले बुलो मंडल को पहली बार मंत्री बनने का मौका मिला है, जो पूर्वी बिहार में एनडीए के राजनैतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख देगा।

महादेवपुर घाट के संघर्ष से सचिवालय के ‘पॉवर’ तक

​49 वर्षीय शैलेश कुमार, जिन्हें प्यार से लोग ‘बुलो मंडल’ कहते हैं, उनकी पहचान एक ‘ग्राउंड लीडर’ की रही है। भागलपुर जिले के नवगछिया अनुमंडल स्थित राघोपुर गांव के रहने वाले बुलो मंडल का राजनैतिक सफर बिहपुर विधानसभा सीट से शुरू हुआ था। साल 2000 में वे पहली बार राजद के टिकट पर विधायक बने थे。 इसके बाद 2005 के दो चुनावों (फरवरी और अक्टूबर) में लालू प्रसाद के विरोध के बावजूद उन्होंने अपनी व्यक्तिगत पैठ के दम पर बिहपुर में जीत का परचम लहराया。

​राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि बुलो मंडल को ऊर्जा विभाग (Energy Department) जैसी बड़ी जिम्मेदारी देना एक सोची-समझी रणनीति है। बिहार, जो बिजली आत्मनिर्भरता की राह पर अग्रसर है, वहां बुलो मंडल जैसे जमीन से जुड़े नेता की जरूरत थी जो ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति, जर्जर तारों और उपभोक्ताओं की समस्याओं को गहराई से समझ सके। उनके पास 22 साल का लंबा प्रशासनिक और विधायी अनुभव है। वे राजद में रहते हुए लालू परिवार के इतने करीब थे कि उन्हें तेजस्वी यादव को सीएम बनाने की मांग उठाने वाले पहले नेताओं में गिना जाता था。 अब, नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी की जोड़ी ने उनके इस अनुभव और जनाधार का उपयोग राज्य के ऊर्जा क्षेत्र को रोशन करने के लिए करने का फैसला किया है।

शाहनवाज हुसैन को हराने वाले ‘जायंट किलर’ की वापसी

​बुलो मंडल के राजनैतिक करियर का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक क्षण साल 2014 के लोकसभा चुनाव में आया। देश भर में चल रही ‘मोदी लहर’ के बीच भागलपुर संसदीय सीट पर बुलो मंडल ने वह करिश्मा कर दिखाया जिसकी कल्पना बड़े-बड़े दिग्गजों ने नहीं की थी। राजद के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए उन्होंने भाजपा के कद्दावर नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और तत्कालीन सांसद सैयद शाहनवाज हुसैन को कड़े मुकाबले में शिकस्त दे दी। इस जीत ने बुलो मंडल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और वे राजद के भीतर एक ‘जायंट किलर’ के रूप में स्थापित हुए।

​हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा。 इसके बाद, साल 2024 के लोकसभा चुनाव के समय टिकट न मिलने से नाराज होकर उन्होंने राजद का दामन छोड़ दिया और नीतीश कुमार की जदयू में शामिल हो गए。 नीतीश कुमार ने भी एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह बुलो मंडल का स्वागत किया और उन्हें अति-पिछड़ा वर्ग के बड़े चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया। साल 2025 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने एक और साहसिक कदम उठाया और गोपालपुर के कद्दावर लेकिन विवादित विधायक गोपाल मंडल का टिकट काटकर बुलो मंडल को मैदान में उतार दिया, जहाँ उन्होंने भारी मतों से जीत दर्ज की。 आज, उन्हें मंत्री पद देकर नीतीश कुमार ने यह साबित कर दिया है कि वे अपने वफादार और जनाधार वाले नेताओं का सम्मान करना जानते हैं।

गंगोता समुदाय के ‘अंग सम्राट’ और सामाजिक इंजीनियरिंग

​राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि बुलो मंडल को मंत्री बनाकर एनडीए ने अति-पिछड़ा वर्ग (EBC), विशेषकर गंगोता समुदाय को एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली संदेश दिया है। बुलो मंडल इसी गंगोता समाज से ताल्लुक रखते हैं, जिसका भागलपुर, खगड़िया और नवगछिया के इलाकों में निर्णयाक प्रभाव रहता है। राजद में रहते हुए भी वे इसी वर्ग के बड़े चेहरे थे, और अब जदयू में वे नीतीश कुमार की अति-पिछड़ा राजनीति के प्रमुख स्तंभ बनकर उभरे हैं।

​उनकी शैली एक आक्रामक और दबंग नेता की रही है, लेकिन 2025 के चुनावी हलफनामे के अनुसार, उनके खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला दर्ज नहीं है, जो उनकी छवि को एक बेदाग और विकासपरक नेता के रूप में निखारता है。 उनकी पत्नी वर्षा रानी भी राजनैतिक रूप से काफी सक्रिय रही हैं और साल 2015 में बिहपुर सीट से राजद विधायक के रूप में सदन पहुँच चुकी हैं。 बुलो मंडल की संपत्ति भी करीब 5.6 करोड़ रुपये की है, जो उनकी आर्थिक मजबूती को दर्शाती है。 कोसी-सीमांचल और अंग क्षेत्र में एनडीए के सामाजिक आधार को और मजबूत करने के लिए बुलो मंडल एक परफेक्ट उम्मीदवार माने जा रहे हैं।

ऊर्जा विभाग की चुनौतियां और भागलपुर के लिए उम्मीदें

​पहली बार मंत्री बने बुलो मंडल के सामने अब ऊर्जा विभाग की फाइलों में बंद विकास के पहियों को घुमाने की बड़ी चुनौती है। बिहार में ‘स्मार्ट मीटर’ लगाने की प्रक्रिया और बिजली की दरों को लेकर अक्सर विपक्ष हमलावर रहता है। एक जमीन से जुड़े नेता होने के नाते, जनता को उनसे काफी उम्मीदें हैं कि वे इन तकनीकी और आर्थिक मुद्दों का व्यावहारिक समाधान निकालेंगे।

​जाह्नवी (महादेवपुर) घाट से राघोपुर गांव तक, जहां बुलो मंडल का बचपन बीता है, वहां के लोग आज आतिशबाजी कर अपने ‘बुलो’ के मंत्री बनने का जश्न मना रहे हैं। भागलपुर जिले के लोगों को उम्मीद है कि अब उनके क्षेत्र में बिजली की कटौती कम होगी और ग्रामीण इलाकों में जर्जर बिजली के बुनियादी ढांचे में सुधार होगा। गंगा और कोसी के कटाव जैसी समस्याओं को भी बुलो मंडल प्रमुखता से उठाते रहे हैं, और अब मंत्री के रूप में उनके पास इन समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए राजनैतिक ‘पावर’ है। सम्राट चौधरी की इस ‘जंबो कैबिनेट’ में बुलो मंडल की एंट्री पूर्वी बिहार की राजनैतिक हनक को और बढ़ाएगी। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि 5 बार विधायक रहने का अनुभव रखने वाले बुलो मंडल बिहार के ऊर्जा विभाग को कितनी ऊंचाइयों पर लेकर जाते हैं।

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