शक्ति बाजार से बदली बिहार की महिलाओं की तकदीर, गांव की कला को मिला वैश्विक बाजार

महिला उद्यमिता की तस्वीर तेजी से बदल रही है। जो महिलाएं कभी सीमित संसाधनों और छोटे बाजारों तक सिमटी हुई थीं, वे अब अपनी कला और उत्पादों को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच तक पहुंचाने में सफल हो रही हैं। इस बदलाव के पीछे पंचायती राज विभाग और निजी संस्था सेंटर फॉर कैटलाइजिंग चेंज (सी-3) की संयुक्त पहल “शक्ति धारा” और “शक्ति बाजार” कार्यक्रम की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। इन कार्यक्रमों ने ग्रामीण महिलाओं को केवल प्रशिक्षण ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता, तकनीकी समझ और बाजार तक पहुंच का नया रास्ता भी दिखाया है।

पिछले वर्ष से शुरू किए गए इस अभियान के तहत महिला जनप्रतिनिधियों को विशेष प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पंचायत क्षेत्रों की महिला उद्यमियों के साथ जोड़ा गया। इसका उद्देश्य था कि गांवों में काम कर रहीं महिलाओं को व्यवसाय, ब्रांडिंग, डिजिटल मार्केटिंग और वित्तीय प्रबंधन जैसी जरूरी जानकारियों से लैस किया जाए, ताकि वे अपने उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचा सकें। इस पहल के तहत मुजफ्फरपुर, रोहतास और नालंदा जिलों की कुल 132 महिला जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण दिया गया।

“शक्ति बाजार” कार्यक्रम महिलाओं के लिए एक ऐसा मंच बनकर उभरा है, जहां उन्हें संरचित बाजार, डिजिटल कौशल, नेतृत्व क्षमता और वित्तीय जानकारी से जोड़ा जा रहा है। इस कार्यक्रम के जरिए ग्रामीण महिलाओं को यह समझाया जा रहा है कि आज के दौर में केवल उत्पाद बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी सही पैकेजिंग, प्रस्तुतीकरण और डिजिटल प्रचार भी उतना ही जरूरी है।

इस पहल का असर अब साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाले उत्पादों को नए बाजार मिले हैं, महिलाओं की आय बढ़ी है और गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। साथ ही पारंपरिक कला और स्थानीय उत्पादों को नई पहचान मिल रही है।

मुजफ्फरपुर में आयोजित जिला स्तरीय शक्ति बाजार कार्यक्रम इसका बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया। यहां केवल तीन महिला उद्यमियों ने मिलकर पांच लाख रुपये से अधिक के स्थानीय उत्पादों की रिकॉर्ड बिक्री की। यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि महिलाओं को सही प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो वे आर्थिक विकास में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

मधुबनी कला को मिला नया बाजार

मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी ब्लॉक की रहने वाली 45 वर्षीय अंजना लाभ की कहानी इस बदलाव की प्रेरणादायक मिसाल है। अंजना पिछले 25 वर्षों से मधुबनी पेंटिंग से जुड़ी हुई थीं, लेकिन उनका काम केवल सीमित क्षेत्रों तक ही पहुंच पाता था। पारंपरिक कला में निपुण होने के बावजूद उन्हें बाजार और प्रचार-प्रसार की जानकारी नहीं थी, जिससे उनकी आय भी सीमित थी।

शक्ति बाजार से जुड़ने के बाद अंजना ने डिजिटल मार्केटिंग, ग्राहक प्रबंधन, पैकेजिंग और उत्पाद प्रस्तुतीकरण जैसी तकनीकों को सीखा। इसके बाद उनके काम में बड़ा बदलाव आया। अब उनकी मधुबनी पेंटिंग केवल बिहार तक सीमित नहीं रही, बल्कि मुंबई, लखनऊ और वाराणसी जैसे शहरों तक पहुंच गई है।

आज अंजना एक सफल महिला उद्यमी के रूप में पहचान बना चुकी हैं। उनके पास जीएसटी सर्टिफिकेट, कलाकार कार्ड और उद्यम रजिस्ट्रेशन भी है। सोशल मीडिया के माध्यम से वे अपने उत्पादों का प्रचार कर रही हैं और उनकी सालाना आय लगभग चार लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। अंजना कहती हैं कि पहले वे केवल एक कलाकार थीं, लेकिन अब वे खुद को आत्मनिर्भर व्यवसायी के रूप में देखती हैं।

मखाना स्नैक्स से मिली नई पहचान

मुजफ्फरपुर की बीरपुर पंचायत की रहने वाली नीतू कुमारी की कहानी भी काफी प्रेरणादायक है। नीतू “वोम्पो” नामक ब्रांड की संस्थापक हैं और पिछले छह वर्षों से मखाना आधारित स्नैक्स, अचार और अन्य स्थानीय उत्पाद तैयार कर रही थीं। हालांकि बाजार की जानकारी और उचित मार्गदर्शन के अभाव में उनका कारोबार आसपास की दुकानों तक ही सीमित था।

शक्ति बाजार कार्यक्रम से जुड़ने के बाद नीतू को व्यवसाय विस्तार, ब्रांडिंग और डिजिटल प्रचार की जानकारी मिली। उन्होंने अपने उत्पादों की गुणवत्ता और पैकेजिंग पर काम किया। इसका परिणाम यह हुआ कि अब उनका जीएसटी रजिस्ट्रेशन हो चुका है और उन्हें खादी मॉल में स्थायी स्टॉल भी मिल गया है।

नीतू बताती हैं कि पहले उनकी सालाना आय करीब ढाई लाख रुपये थी, लेकिन अब यह बढ़कर चार लाख रुपये तक पहुंच गई है। उनका कहना है कि सही प्रशिक्षण और सहयोग मिलने से उनके व्यवसाय को नई दिशा मिली है और अब वे अपने उत्पादों को बड़े स्तर पर बेच पा रही हैं।

बावन बूटी कला की बढ़ती पहचान

नालंदा जिले की 30 वर्षीय गुड़िया देवी भी इस बदलाव की मिसाल बन चुकी हैं। गोवारा पंचायत के नेप्पुरा गांव की रहने वाली गुड़िया पारंपरिक बावन बूटी कला में निपुण हैं। पहले उनका काम सीमित स्तर तक ही पहचाना जाता था, लेकिन शक्ति धारा कार्यक्रम से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया।

ऑनलाइन प्रशिक्षण के दौरान गुड़िया ने उद्यमिता, डिजिटल मार्केटिंग और ग्राहक संपर्क के तरीके सीखे। इसके बाद उन्होंने अपने उत्पादों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित करना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी।

गुड़िया ने बेंगलुरु में आयोजित इंट्रेप्रेनारी मेला 2.0 में अपनी कला का प्रदर्शन किया, जहां लोगों ने उनके काम की खूब सराहना की। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और आज वे पहले से दोगुनी कमाई कर रही हैं। गुड़िया का कहना है कि पहले वे झिझक महसूस करती थीं, लेकिन अब उन्हें अपनी कला और मेहनत पर गर्व है।

महिलाओं के लिए बदलाव की नई राह

विशेषज्ञों का मानना है कि शक्ति बाजार जैसी पहलें केवल महिलाओं की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रही हैं। इन कार्यक्रमों से महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ा है और वे अब अपने फैसले खुद लेने लगी हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक कला और स्थानीय उत्पादों को नया बाजार मिलने से रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। कई महिलाएं अब अपने साथ अन्य महिलाओं को भी जोड़ रही हैं, जिससे गांवों में छोटे स्तर पर रोजगार का सृजन हो रहा है।

यह पहल यह साबित कर रही है कि यदि महिलाओं को सही मंच, तकनीकी प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग मिले तो वे केवल आत्मनिर्भर ही नहीं बनतीं, बल्कि पूरे समाज और समुदाय के आर्थिक विकास की मजबूत आधारशिला भी बन सकती हैं। बिहार की ग्रामीण महिलाएं अब अपनी कला और मेहनत के दम पर देश और दुनिया में नई पहचान बना रही हैं।

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