
भागलपुर/मुंगेर/बेगूसराय। बिहार के परिवहन और निर्माण क्षेत्र के लिए बुधवार, 06 मई 2026 की सुबह एक नई मुसीबत लेकर आई है। विक्रमशिला सेतु के क्षतिग्रस्त होने के बाद जिस मुंगेर रेल-सह-सड़क पुल को ‘लाइफलाइन’ मानकर भारी वाहनों का दबाव डायवर्ट किया गया था, अब उस पर भी ग्रहण लग गया है। बेगूसराय जिला प्रशासन ने पुल की सुरक्षा और उसकी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए भारी वाहनों के परिचालन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। इस एक फैसले ने अंग प्रदेश और सीमांचल के बीच चल रहे बालू और गिट्टी के विशाल कारोबार की कमर तोड़ दी है। मुंगेर पुल पर लगी इस पाबंदी का सीधा असर न केवल झारखंड और बिहार के अंतर्राज्यीय व्यापार पर पड़ा है, बल्कि कोसी और सीमांचल के जिलों में चल रही विकास योजनाओं की रफ्तार भी थमने के कगार पर पहुँच गई है। ट्रकों के पहिये जहां के तहां थम गए हैं और मंडियों में निर्माण सामग्री की कमी के कारण कीमतों में उछाल आने की प्रबल आशंका पैदा हो गई है।
व्यापारिक गलियारे में सन्नाटा: बालू और गिट्टी की आपूर्ति चेन ध्वस्त
मुंगेर पुल पर भारी वाहनों की रोक के कारण झारखंड स्थित पाकुड़ और मिर्जाचौकी से आने वाली गिट्टी का प्रवाह रुक गया है। इसके साथ ही भागलपुर और बांका जिले से खगड़िया, कोसी और सीमांचल के जिलों में भेजी जाने वाली बालू का कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। गौरतलब है कि विक्रमशिला सेतु पर आवागमन बंद होने के बाद प्रशासन ने भारी वाहनों को मुंगेर पुल के रास्ते उत्तर बिहार और सीमांचल के जिलों में जाने की अनुमति दी थी। लेकिन अब यह विकल्प भी बंद हो जाने से ट्रांसपोर्टरों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
झारखंड की गिट्टी और बिहार के बांका-भागलपुर की बालू उत्तर बिहार की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए रीढ़ की हड्डी मानी जाती है। खगड़िया, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया और अररिया जैसे जिलों में निर्माण सामग्री की आपूर्ति इसी मार्ग से होती थी। अब पुल पर भारी वाहनों की पाबंदी के कारण सैकड़ों ट्रक सड़कों के किनारे खड़े हो गए हैं। कारोबारियों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो करोड़ों रुपये का नुकसान होगा और मजदूरों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाएगा।
बेगूसराय प्रशासन का कड़ा फैसला: सुरक्षा के साथ समझौता नहीं
मुंगेर पुल पर भारी वाहनों को रोकने का निर्णय बेगूसराय जिला प्रशासन द्वारा लिया गया है। मंगलवार को बेगूसराय प्रशासन ने एक आधिकारिक विज्ञप्ति जारी कर स्पष्ट किया कि मुंगेर रेल-सह-सड़क पुल की सुरक्षा और संवेदनशीलता सर्वोपरि है। प्रशासन का मानना है कि इस महत्वपूर्ण सेतु पर लगातार भारी वाहनों के अत्यधिक दबाव के कारण इसके क्षतिग्रस्त होने की प्रबल आशंका बनी हुई है। विक्रमशिला सेतु के स्लैब गिरने की घटना से सबक लेते हुए प्रशासन अब किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है।
बेगूसराय के डीएम श्रीकांत शास्त्री ने इस संबंध में सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित पदाधिकारियों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि किसी भी परिस्थिति में ओवरलोड और भारी वाहनों को पुल पर प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाए। प्रशासन की ओर से पुल के दोनों ओर चेक पॉइंट्स को और अधिक मजबूत किया जा रहा है ताकि भारी वाहनों की आवाजाही को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सके। इस प्रशासनिक कड़ाई के बाद अब केवल हल्के और मध्यम श्रेणी के वाहनों को ही पुल से गुजरने की छूट मिल रही है।
20 टन का ‘नया नियम’: ट्रकों के लिए बनी बड़ी चुनौती
प्रशासन द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, मुंगेर पुल से केवल उन वाहनों को ही गुजरने की अनुमति दी गई है जिनका कुल भार 20 टन तक है। निर्माण सामग्री ढोने वाले अधिकांश भारी ट्रक और डंपर, जो बालू और गिट्टी लेकर चलते हैं, उनका वजन आमतौर पर 20 टन से कहीं अधिक होता है। ऐसे में यह ’20 टन’ की सीमा व्यवहारिक रूप से बालू और गिट्टी के ट्रकों के लिए पूर्ण प्रतिबंध जैसा साबित हो रही है।
परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि एक खाली ट्रक का वजन ही इतना होता है कि उस पर लोड डालने के बाद वह आसानी से 25 से 30 टन की सीमा को पार कर जाता है। प्रशासन के इस मानक ने बड़े ट्रांसपोर्टर्स को मुंगेर मार्ग से पूरी तरह बाहर कर दिया है। अब ट्रांसपोर्टरों को खगड़िया या कोसी बेल्ट तक पहुँचने के लिए सुल्तानगंज या मुंगेर के वैकल्पिक और अधिक लंबे रास्तों की तलाश करनी होगी, जिससे ईंधन का खर्च और समय दोनों ही बढ़ जाएंगे।
कोसी और सीमांचल पर पड़ेगा सीधा असर
मुंगेर पुल पर भारी वाहनों की नो-एंट्री का सबसे घातक असर खगड़िया, कोसी और सीमांचल के जिलों पर पड़ने वाला है। इन क्षेत्रों में निजी और सरकारी दोनों ही स्तरों पर चल रहे निर्माण कार्य अब सामग्री के अभाव में लटक सकते हैं। खगड़िया से लेकर पूर्णिया तक बालू और गिट्टी की मांग हमेशा बनी रहती है। भागलपुर और बांका की बालू अपनी गुणवत्ता के कारण इन क्षेत्रों की पहली पसंद है।
अब जब आपूर्ति का मुख्य रास्ता बंद हो गया है, तो बाजार में कृत्रिम कमी पैदा होने की संभावना है। छोटे व्यापारी और ठेकेदार डरे हुए हैं कि निर्माण सामग्री की कमी के कारण प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ जाएगी। कोसी और सीमांचल के विकास की रफ्तार, जो पहले ही विक्रमशिला सेतु के संकट से धीमी हुई थी, अब मुंगेर पुल की पाबंदी के कारण और भी सुस्त पड़ सकती है। प्रशासन के इस निर्णय ने पूरे क्षेत्र के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को हिलाकर रख दिया है।
लॉजिस्टिक्स की नई समस्या और प्रशासनिक चुनौतियां
भारी वाहनों के इस नए प्रतिबंध ने सड़कों पर जाम और लॉजिस्टिक्स की नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। मुंगेर और बेगूसराय के सीमावर्ती इलाकों में ट्रकों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई हैं। कई ट्रक चालक इस उम्मीद में खड़े हैं कि शायद प्रशासन ढील दे, लेकिन डीएम श्रीकांत शास्त्री के सख्त निर्देशों के बाद पुलिस बल किसी भी भारी वाहन को पुल के पास फटकने नहीं दे रहा है।
प्रशासन के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि एक तरफ बुनियादी ढांचे की सुरक्षा है और दूसरी तरफ क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां। मुंगेर पुल न केवल एक संरचना है, बल्कि यह उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण व्यापारिक सेतु है। भारी वाहनों को वैकल्पिक मार्गों पर डायवर्ट करना भी आसान नहीं है, क्योंकि वे सड़कें भी अतिरिक्त भार को सहने के लिए तैयार नहीं हैं। फिलहाल, बेगूसराय प्रशासन पुल की मॉनिटरिंग कर रहा है और तकनीकी विशेषज्ञों की राय के आधार पर ही भविष्य का निर्णय लिया जाएगा। तब तक बालू और गिट्टी का कारोबार ‘डंप’ रहने के आसार हैं।


