मिट्टी जांच में बिहार अग्रणी, दो वर्षों में 8 लाख नमूनों की जांच से कृषि को नई दिशा

पटना, 3 मई। बिहार ने कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए मिट्टी जांच के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में अपनी पहचान मजबूत की है। कृषि विभाग द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, विगत दो वित्तीय वर्षों में राज्य में कुल 8 लाख मिट्टी के नमूनों की जांच की गई है। यह न केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि है, बल्कि राज्य की कृषि व्यवस्था में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने की दिशा में एक बड़ा कदम भी है।

वित्तीय वर्ष 2024-25 में जहां 5 लाख मिट्टी नमूनों की जांच की गई, वहीं वर्ष 2025-26 में 3 लाख नमूनों का विश्लेषण किया गया। इस व्यापक अभियान ने यह साबित किया है कि बिहार अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर वैज्ञानिक और डेटा आधारित खेती की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, हर तीन वर्ष में एक बार मिट्टी की जांच कराना आवश्यक होता है, जिससे किसानों को अपनी जमीन की वास्तविक स्थिति का पता चलता है और वे उसी के अनुसार खेती की रणनीति बना सकते हैं।

राज्य सरकार ने इस दिशा में बुनियादी ढांचे के विस्तार पर भी विशेष ध्यान दिया है। वर्ष 2025-26 में 25 जिलों में अनुमंडल स्तर पर 32 नई मिट्टी जांच प्रयोगशालाओं की स्थापना की गई है। इसके अलावा पहले से ही 14 अनुमंडल स्तरीय प्रयोगशालाएं कार्यरत हैं। इस तरह राज्य में मिट्टी जांच की सुविधा को गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

बिहार के सभी 38 जिलों में जिला स्तरीय मिट्टी जांच प्रयोगशालाएं पहले से ही संचालित हैं, जिससे किसानों को अपने जिले में ही जांच की सुविधा मिल रही है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक प्रमंडल में कुल 9 चलंत (मोबाइल) मिट्टी जांच प्रयोगशालाएं भी कार्यरत हैं, जो दूर-दराज के इलाकों में जाकर किसानों के खेतों से नमूने लेकर जांच करती हैं। ग्राम स्तर पर भी 72 प्रयोगशालाएं सक्रिय हैं, जो इस अभियान को जमीनी स्तर तक मजबूत बना रही हैं।

मिट्टी जांच की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए राज्य में तीन रेफरल प्रयोगशालाओं की व्यवस्था की गई है। इनमें केंद्रीय मिट्टी जांच प्रयोगशाला के साथ-साथ राज्य के दोनों कृषि विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाएं शामिल हैं। ये प्रयोगशालाएं जांच की सटीकता और गुणवत्ता की निगरानी करती हैं, जिससे किसानों को विश्वसनीय रिपोर्ट मिल सके।

मिट्टी जांच का सबसे बड़ा लाभ किसानों को “मृदा स्वास्थ्य कार्ड” के रूप में मिलता है। यह कार्ड किसानों के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज होता है, जिसमें उनके खेत की मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की विस्तृत जानकारी दी जाती है। इसके आधार पर किसानों को यह सलाह दी जाती है कि वे किस फसल के लिए कितना और किस प्रकार का उर्वरक इस्तेमाल करें।

राज्य सरकार ने इस प्रक्रिया को और सरल और आधुनिक बनाने के लिए डिजिटल तकनीक का सहारा लिया है। अब किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड व्हाट्सएप के माध्यम से भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे न केवल समय की बचत होती है, बल्कि किसानों को तुरंत जानकारी भी मिल जाती है। इस डिजिटल कार्ड में लगभग 106 फसलों के लिए उर्वरक संबंधी अनुशंसाएं शामिल होती हैं, जो किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रही हैं।

मिट्टी जांच के दौरान 12 महत्वपूर्ण पैरामीटरों—pH, EC, ऑर्गेनिक कार्बन (OC), नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटाश (K), जिंक (Zn), कॉपर (Cu), मैंगनीज (Mn), आयरन (Fe), सल्फर (S) और बोरॉन (B)—का विश्लेषण किया जाता है। इन सभी तत्वों की जानकारी से यह पता चलता है कि मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में हैं और किनकी कमी है।

नमूना संग्रहण की प्रक्रिया को भी पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाया गया है। कृषि विभाग के कर्मचारी खेतों में जाकर मिट्टी के नमूने लेते हैं और उस स्थान का फोटो, अक्षांश (Latitude) और देशांतर (Longitude) सहित पूरा विवरण मोबाइल ऐप पर अपलोड करते हैं। इससे डेटा की विश्वसनीयता बढ़ती है और किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना कम हो जाती है।

इस पहल का असर अब साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। जहां पहले किसान बिना जानकारी के अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते थे, वहीं अब वे संतुलित और जरूरत के अनुसार उर्वरक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे न केवल उत्पादन में वृद्धि हुई है, बल्कि खेती की लागत भी कम हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी जांच के आधार पर की गई खेती से भूमि की उर्वरता भी लंबे समय तक बनी रहती है। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से जहां मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती है, वहीं संतुलित उपयोग से मिट्टी स्वस्थ रहती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

राज्य सरकार की यह पहल किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक साबित हो रही है। कम लागत और अधिक उत्पादन के कारण किसानों को बेहतर मुनाफा मिल रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है। यही कारण है कि इसे कृषि क्षेत्र में एक “मौन क्रांति” के रूप में देखा जा रहा है।

बिहार में मिट्टी जांच की यह व्यापक व्यवस्था न केवल वर्तमान की जरूरतों को पूरा कर रही है, बल्कि भविष्य की टिकाऊ कृषि व्यवस्था की नींव भी रख रही है। यदि इसी तरह से वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा मिलता रहा, तो आने वाले समय में बिहार देश के कृषि मानचित्र पर और भी मजबूत स्थिति में दिखाई देगा।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि मिट्टी जांच की इस पहल ने बिहार के किसानों को नई दिशा दी है। यह केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि खेती के तरीके को बदलने वाली एक बड़ी पहल है, जो आने वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र में और भी सकारात्मक बदलाव लाएगी।

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