
पटना, 3 मई। बिहार की पंचायतों में अब विकास की चर्चा केवल सड़कों और भवनों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अब यह लोगों के स्वास्थ्य और पोषण तक पहुंच चुकी है। राज्य के विभिन्न पंचायतों में जनप्रतिनिधियों द्वारा महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए कुपोषण, एनीमिया और कैल्शियम की कमी जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। इन पहलों के केंद्र में है—“सही पोषण”, जो ग्रामीण समाज को एक नई दिशा देने का कार्य कर रहा है।
सरकार द्वारा संचालित योजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के साथ-साथ स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका ने इन प्रयासों को जमीनी स्तर तक प्रभावी बनाया है। गांवों में पोषण वाटिका लगाने, स्तनपान को बढ़ावा देने और महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने जैसे कदम अब एक जन आंदोलन का रूप लेते जा रहे हैं। इन प्रयासों का असर भी धीरे-धीरे सामने आने लगा है, जहां पहले कुपोषण और एनीमिया की समस्या व्यापक थी, वहीं अब इसमें कमी देखने को मिल रही है।
पोषण वाटिका: हर घर में सेहत की हरियाली
नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड के तेलमर पंचायत में मुखिया विद्यानंद बिंद ने इस दिशा में एक अनूठी पहल की है। उन्होंने पंचायत में कुपोषण की समस्या को गंभीरता से समझा और इसका स्थायी समाधान खोजने के लिए पोषण वाटिका की अवधारणा को लागू किया। उनके प्रयासों से गांव के लोगों ने अपने घरों के आसपास खाली जमीन पर सब्जियां उगानी शुरू कीं।
विद्यानंद बिंद बताते हैं कि उन्हें पंचायती राज विभाग के प्रशिक्षण के दौरान पोषण के महत्व के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने इसे अपने पंचायत में लागू करने का निर्णय लिया। उन्होंने ग्राम सभाओं में लोगों को समझाया कि स्वस्थ जीवन के लिए संतुलित आहार कितना जरूरी है। आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं की मदद से महिलाओं को पोषण वाटिका लगाने के लिए प्रेरित किया गया।
उन्होंने अपने व्यक्तिगत संसाधनों से बीज खरीदकर विशेष रूप से दलित बस्तियों में वितरित किए, ताकि वहां के लोगों को भी पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो सके। इसका परिणाम यह हुआ कि अब इन क्षेत्रों में हरी पत्तेदार सब्जियों की उपलब्धता बढ़ी है, जिससे महिलाओं और बच्चों में एनीमिया की समस्या में कमी आने लगी है।
यह पहल केवल एक गांव तक सीमित नहीं रही, बल्कि आसपास के गांवों में भी लोग इससे प्रेरित होकर अपने घरों में पोषण वाटिका लगाने लगे हैं। “सही पोषण, देश रोशन” का नारा अब इन पंचायतों में एक जनचेतना बन चुका है।
स्तनपान पर जोर: ‘डिब्बे का दूध मुक्त पंचायत’ की पहल
दूसरी ओर, नवादा जिले के वारिसलीगंज प्रखंड के मोहद्दीनपुर पंचायत में मुखिया प्रभु प्रसाद ने एक अलग दिशा में काम करते हुए समाज में जागरूकता की नई लहर पैदा की है। उन्होंने अपने पंचायत को “डिब्बे का दूध मुक्त पंचायत” बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जो कि ग्रामीण स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रभु प्रसाद ने प्रशिक्षण के दौरान मिली जानकारी के आधार पर यह समझा कि नवजात शिशुओं के लिए मां का दूध सबसे उत्तम पोषण है। इसके बावजूद कई परिवारों में डिब्बे के दूध का उपयोग बढ़ रहा था, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। इस समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने स्वयं आगे आकर महिलाओं को स्तनपान के महत्व के बारे में जागरूक करना शुरू किया।
पोषण माह के दौरान उन्होंने आंगनबाड़ी केंद्रों पर आयोजित कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाई और महिलाओं को बताया कि जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल मां का दूध ही बच्चे के लिए पर्याप्त और सबसे सुरक्षित होता है। इसके साथ ही उन्होंने आयरन और कैल्शियम की गोलियों के सेवन, नियमित स्वास्थ्य जांच और पूरक पोषाहार के महत्व पर भी जोर दिया।
यह अभियान धीरे-धीरे पूरे पंचायत में फैल रहा है और अब लोग इस दिशा में सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं। पंचायत स्तर पर इसे औपचारिक रूप से “डिब्बे का दूध मुक्त पंचायत” घोषित करने की तैयारी भी की जा रही है।
जागरूकता और सामूहिक प्रयास से बदलाव
इन दोनों उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि जब जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याओं को समझकर समाधान के लिए सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो बदलाव संभव होता है। पंचायत स्तर पर चल रहे ये प्रयास केवल सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हैं, बल्कि यह समाज के भीतर से उठी एक जागरूकता की लहर है।
महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार केवल चिकित्सा सुविधाओं से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए पोषण, जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन भी उतना ही जरूरी है। बिहार के विभिन्न पंचायतों में चल रहे ये अभियान इसी दिशा में एक मजबूत कदम हैं।
कुपोषण से मुकाबले में नई उम्मीद
राज्य सरकार और पंचायत प्रतिनिधियों के संयुक्त प्रयासों से अब कुपोषण के खिलाफ एक सशक्त लड़ाई लड़ी जा रही है। पोषण वाटिका, स्तनपान जागरूकता और स्वास्थ्य कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीण समाज में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह से निरंतर प्रयास जारी रहे, तो आने वाले वर्षों में कुपोषण की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इससे न केवल बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा, बल्कि राज्य की समग्र विकास दर पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि बिहार की पंचायतों में शुरू हुई यह पोषण क्रांति एक नई उम्मीद लेकर आई है। यह पहल न केवल स्वास्थ्य सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह समाज को आत्मनिर्भर और जागरूक बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।


