सुल्तानगंज कांड का मास्टरमाइंड ढेर: मायागंज अस्पताल में 8 घंटे लावारिस पड़ा रहा रामधनी का शव; खौफ के साम्राज्य का अंत देख किसी ने नहीं दिया परिवार का साथ

भागलपुर। भागलपुर के सुल्तानगंज में ‘खाकी’ और प्रशासन को खुली चुनौती देने वाले कुख्यात अपराधी रामधनी यादव का अंत जितना हिंसक रहा, उसके शव की स्थिति उतनी ही एकाकी और उपेक्षित रही। बुधवार, 29 अप्रैल 2026 की सुबह भागलपुर के मायागंज स्थित जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (JLNMCH) के परिसर में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जो इस बात की तस्दीक करता है कि अपराध की उम्र और उसका सम्मान कितना क्षणिक होता है। जिस रामधनी यादव के नाम से सुल्तानगंज के ठेका माफिया और आम जनता थर-थर कांपती थी, उसका निर्जीव शरीर अस्पताल की एक स्ट्रेचर पर घंटों लावारिस हालत में पड़ा रहा। सुबह पांच बजे जब डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित किया, तब से लेकर दोपहर एक बजे तक उसके परिवार का कोई भी सदस्य शव का दावा करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। आठ घंटों के उस लंबे इंतजार ने यह साबित कर दिया कि समाज ने न केवल रामधनी को, बल्कि उसके पूरे रसूख को पूरी तरह नकार दिया है।

आठ घंटे का सन्नाटा और लावारिस पड़ा ‘आतंक’

​बुधवार की अलसुबह जब मायागंज अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के पास पुलिस का पहरा सख्त हुआ, तब यह स्पष्ट हो गया था कि एनकाउंटर में घायल रामधनी यादव ने दम तोड़ दिया है। सुबह ठीक पांच बजे मेडिकल बुलेटिन में उसकी मौत की पुष्टि कर दी गई। इसके बाद नियमानुसार शव को पोस्टमार्टम के लिए सुरक्षित क्षेत्र में रख दिया गया। आमतौर पर किसी हाई-प्रोफाइल अपराधी या राजनैतिक रसूख वाले व्यक्ति की मौत के बाद अस्पताल परिसर में समर्थकों और परिजनों का तांता लग जाता है, लेकिन रामधनी के मामले में तस्वीर बिल्कुल उलट थी।

​सुबह के पांच बजते-बजते सूरज की पहली किरण के साथ अस्पताल में मरीजों की भीड़ बढ़ने लगी, लेकिन रामधनी के स्ट्रेचर के पास केवल वर्दीधारी जवान तैनात थे। वह खौफ, जिसके दम पर उसने सालों तक नगर परिषद की सत्ता और संसाधनों पर कब्जा जमाया था, वह एक पल में हवा हो गया था। अस्पताल के कर्मचारी और वहां मौजूद आम नागरिक दबी जुबान में ईओ कृष्ण भूषण कुमार की हत्या की चर्चा कर रहे थे, लेकिन रामधनी के शव को देखने के लिए किसी की आंखों में सहानुभूति नहीं थी। आठ घंटे बीत जाने के बाद भी जब कोई सामने नहीं आया, तो अस्पताल प्रशासन ने कानूनी प्रक्रिया के तहत अगले कदम की तैयारी शुरू की थी।

बेटियों का आगमन: एएनएम प्रियंका और रूबी का भारी मन

​दोपहर के करीब एक बज रहे थे, जब अस्पताल परिसर में एक छोटी सी हलचल हुई। बांका के कटोरिया स्थित रेफरल अस्पताल में एएनएम (ANM) के पद पर कार्यरत रामधनी की बड़ी बेटी प्रियंका मायागंज पहुँची। एक तरफ प्रियंका का पेशा जीवन बचाने का है, तो दूसरी तरफ उसके पिता पर जीवन छीनने का काला दाग लगा था। प्रियंका के पहुँचने के कुछ ही देर बाद उसकी दूसरी बेटी रूबी भी असरगंज से मायागंज अस्पताल परिसर में दाखिल हुई।

​दोनों बेटियों के चेहरे पर दुख के साथ-साथ एक अजीब सी झिझक और अकेलापन साफ झलक रहा था। जिस पिता ने उन्हें पढ़ा-लिखाकर समाज में एक मुकाम दिया था, उसी पिता के कृत्यों ने उन्हें आज समाज की नजरों में कठघरे में खड़ा कर दिया था। प्रियंका और रूबी जब अपने पिता के पार्थिव शरीर के पास पहुँचीं, तो वहां कोई भी ऐसा समर्थ व्यक्ति या राजनैतिक सहयोगी मौजूद नहीं था, जो उनके आंसू पोंछ सके या प्रक्रिया में मदद कर सके। बेटियों ने पुलिस अधिकारियों से औपचारिकताएं पूरी करने के लिए बात की, जिसके बाद ही शव के पोस्टमार्टम की प्रक्रिया को गति मिल सकी।

जनाक्रोश और सामाजिक अलगाव: नहीं मिला ‘बाहरी’ सहयोग

​रामधनी यादव के एनकाउंटर के बाद पुलिस और खुफिया विभाग को यह अंदेशा था कि उसके परिजन और समर्थक अस्पताल परिसर या सुल्तानगंज की सड़कों पर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर सकते हैं। खुफिया इनपुट के आधार पर मायागंज अस्पताल से लेकर सुल्तानगंज के बाईपास स्थित रामधनी के आवास तक भारी पुलिस बल की तैनाती की गई थी। पुलिस को डर था कि शव को लेकर प्रदर्शन किया जा सकता है या इसे ‘फेक एनकाउंटर’ बताकर राजनैतिक रंग देने की कोशिश होगी।

​लेकिन, हकीकत उम्मीदों से जुदा निकली। कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार जैसे ईमानदार और जांबाज अधिकारी की नृशंस हत्या ने आम लोगों के भीतर इतना गुस्सा भर दिया था कि रामधनी के परिवार के समर्थन में कोई एक व्यक्ति भी आगे नहीं आया। सूत्रों का कहना है कि परिवार की ओर से कुछ लोगों से संपर्क साधने की कोशिश की गई थी ताकि अस्पताल में भीड़ जुटाई जा सके, लेकिन ईओ की शहादत और अपराधियों की क्रूरता ने आम लोगों के मन में रामधनी के प्रति बची-खुची संवेदना भी खत्म कर दी थी। जब परिजनों को लगा कि उनका कोई भी मंसूबा सफल नहीं होने वाला और लोग उनके साथ खड़े नहीं होंगे, तब जाकर बेटियों ने अस्पताल पहुँचने का फैसला किया।

पोस्टमार्टम और सुल्तानगंज की आखिरी यात्रा

​बेटियों की मौजूदगी में दोपहर करीब दो बजे पोस्टमार्टम की कागजी कार्यवाही पूरी हुई। इसके बाद मेडिकल बोर्ड की निगरानी में शव का पोस्टमार्टम शुरू किया गया। पोस्टमार्टम हाउस के बाहर भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। करीब डेढ़ घंटे चली प्रक्रिया के बाद, दोपहर 3:30 बजे रामधनी यादव का शव उसकी बेटियों को सौंप दिया गया।

​एक साधारण एम्बुलेंस में पिता का शव लेकर प्रियंका और रूबी सुल्तानगंज के लिए रवाना हुईं। मायागंज से सुल्तानगंज के उस सफर के दौरान न कोई काफिला था, न ही कोई नारेबाजी। यह उस अपराधी की अंतिम यात्रा थी जिसने कुछ घंटे पहले तक खुद को कानून से ऊपर समझ रखा था। सुल्तानगंज पहुँचने पर भी पुलिस की कड़ी निगरानी रही ताकि अंतिम संस्कार के दौरान कोई गड़बड़ी न हो। प्रशासन ने परिवार को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि अंतिम संस्कार सादगी और शांति के साथ संपन्न होना चाहिए।

क्यों हुआ ऐसा अंत? उस जघन्य अपराध की याद

​रामधनी यादव के प्रति इस सामाजिक बहिष्कार की जड़ें मंगलवार की शाम को हुए उस वाकये में छिपी हैं, जिसने पूरे बिहार को झकझोर दिया था। मंगलवार शाम 4:05 बजे, जब सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में सरकारी कामकाज अपनी लय में था, तब रामधनी अपने दो साथियों के साथ मुख्य पार्षद (चेयरमैन) राजकुमार गुड्डू के चैंबर में घुसा था।

​सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान उस खौफनाक मंजर की गवाही देते हैं। बदमाशों ने पहले मुख्य पार्षद पर गोलियां चलाईं, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। लेकिन जब कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार ने बहादुरी दिखाते हुए अपराधियों को रोकने का प्रयास किया, तो रामधनी ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। उसने निहत्थे अधिकारी के सिर में एक के बाद एक तीन गोलियां उतार दीं। एक ऐसे अधिकारी की हत्या, जो शहर के विकास और पारदर्शिता के लिए लड़ रहा था, जनता के लिए असहनीय थी। यही कारण था कि जब रामधनी का शव अस्पताल में पड़ा था, तो सुल्तानगंज का हर नागरिक उसे एक अपराधी की मौत नहीं, बल्कि ‘पाप के अंत’ के रूप में देख रहा था।

न्याय की गूँज और प्रशासनिक संदेश

​रामधनी यादव की बेटियों का अस्पताल पहुँचना और शव को लेकर चुपचाप निकल जाना, इस बात का प्रमाण है कि बिहार में अब ‘बाहुबल’ की एक्सपायरी डेट आ चुकी है। जिस रामधनी ने राजनैतिक रसूख के दम पर अपनी पत्नी को डिप्टी चेयरमैन की कुर्सी तक पहुँचाया और अपने बेटों को राजनैतिक दलों में ऊंचे पदों पर बिठाया, अंत समय में वह रसूख उसकी मिट्टी को चार कंधे देने के लिए भीड़ भी नहीं जुटा सका।

​प्रशासन ने स्पष्ट संदेश दिया है कि अधिकारियों पर हमला करने वालों का हश्र यही होगा। मायागंज अस्पताल के उस सफेद स्ट्रेचर पर पड़ा रामधनी का शव आज बिहार के हर उस अपराधी के लिए एक चेतावनी है जो सोचता है कि वह कानून के रक्षकों का खून बहाकर चैन से रह पाएगा। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और पुलिसिया कार्रवाई के बाद अब यह मामला फाइलों में तो दर्ज रहेगा, लेकिन सुल्तानगंज की गलियों में यह ‘लोक-न्याय’ की एक ऐसी मिसाल बन गया है जहाँ अपराधी को उसके मरने के बाद भी समाज ने माफ नहीं किया।

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