
कोलकाता। जब कोई यात्री ट्रेन में सवार होकर आराम से अपनी यात्रा करता है—कभी खिड़की से बाहर के दृश्यों का आनंद लेते हुए, तो कभी अपनी सीट पर सुकून से सोते हुए—तो शायद ही उसे यह एहसास होता है कि उस सहज और सुरक्षित यात्रा के पीछे कितनी बड़ी इंजीनियरिंग प्रक्रिया और सतत प्रयास काम कर रहे होते हैं। पूर्व रेलवे ने पिछले तीन वर्षों में इसी दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जिसने रेल पटरियों के बुनियादी ढांचे को नई मजबूती और आधुनिकता प्रदान की है।
महाप्रबंधक मिलिंद देऊस्कर के नेतृत्व में पूर्व रेलवे ने ट्रैक रखरखाव और नवीनीकरण के क्षेत्र में अपने ही पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए अभूतपूर्व प्रगति दर्ज की है। इस अवधि में रेलवे ने अपनी मूल संरचना—रेल पटरियों और स्लीपरों—को मजबूत करने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया, जिससे न केवल ट्रेनों की गति और स्थिरता में सुधार हुआ, बल्कि यात्रियों को अधिक आरामदायक अनुभव भी मिला।
रेलवे द्वारा किए गए कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण पहल “थ्रू रेल रिन्यूअल (प्राइमरी)” रही है, जिसके तहत पुरानी और घिस चुकी पटरियों को नई, मजबूत स्टील रेलों से बदला गया। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023-24 में जहां यह कार्य 283.49 टन किलोमीटर तक सीमित था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 375.35 टन किलोमीटर हो गया। इसके बाद 2025-26 में यह आंकड़ा 577.31 टन किलोमीटर तक पहुंच गया, जो इस क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि को दर्शाता है।
इसी तरह “थ्रू स्लीपर रिन्यूअल (प्राइमरी)” यानी टीएसआर (पी) के तहत भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई। 2023-24 में 213.16 टन किलोमीटर का कार्य 2024-25 में बढ़कर 256.23 टन किलोमीटर हुआ और 2025-26 में यह 350.92 टन किलोमीटर के उच्च स्तर तक पहुंच गया।
यदि प्राथमिक और माध्यमिक दोनों प्रकार के ट्रैक नवीनीकरण को एक साथ देखा जाए, तो यह प्रगति और भी प्रभावशाली नजर आती है। कुल ट्रैक नवीनीकरण 290.46 टन किलोमीटर से बढ़कर 384.68 टन किलोमीटर हुआ और हाल ही में यह रिकॉर्ड 583.93 टन किलोमीटर तक पहुंच गया है।
इन तकनीकी सुधारों का सीधा लाभ यात्रियों को मिला है। नई और मजबूत पटरियों के कारण ट्रेन के डिब्बों में झटके और कंपन कम हो गए हैं, जिससे यात्रा अधिक आरामदायक हो गई है। इसके साथ ही, ट्रेनों की गति में भी सुधार हुआ है, जिससे समय की पाबंदी बेहतर हुई है और यात्रियों का समय बच रहा है।
पूर्व रेलवे ने केवल सीधी पटरियों पर ही नहीं, बल्कि जटिल संरचनाओं जैसे “टर्नआउट्स” पर भी विशेष ध्यान दिया है। टर्नआउट वह स्थान होता है जहां ट्रेन एक ट्रैक से दूसरे ट्रैक पर जाती है, और यहां सुगमता और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
थ्रू टर्नआउट रिन्यूअल के क्षेत्र में भी रेलवे ने शानदार प्रगति की है। वर्ष 2023-24 में 378.88 समतुल्य इकाइयों का कार्य 2024-25 में बढ़कर 513.88 इकाइयों तक पहुंचा और 2025-26 में यह 664.00 इकाइयों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।
इसके अलावा, रेलवे ने पर्यावरण और कार्यस्थल की स्वच्छता पर भी ध्यान दिया है। स्क्रैप धातु के निपटान में भी रिकॉर्ड प्रगति दर्ज की गई है। 2023-24 में 33,037.98 मीट्रिक टन स्क्रैप हटाया गया, जो 2024-25 में बढ़कर 37,569.5 मीट्रिक टन और 2025-26 में 39,287.00 मीट्रिक टन तक पहुंच गया। इससे न केवल कार्यस्थल साफ-सुथरा हुआ, बल्कि संचालन की दक्षता भी बढ़ी है।
इन सभी उपलब्धियों के पीछे पूर्व रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग का अथक परिश्रम और समर्पण है। प्रधान मुख्य इंजीनियर विक्रम गुप्ता के मार्गदर्शन में इंजीनियरों और कर्मचारियों की टीम दिन-रात काम करते हुए यह सुनिश्चित करती है कि यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहे।
रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिबराम माझि ने कहा कि पिछले तीन वर्षों की यह उपलब्धि विभाग की “सुरक्षा पहले” की नीति का प्रमाण है। उन्होंने बताया कि हर किलोमीटर ट्रैक के नवीनीकरण और हर टर्नआउट के सुधार के साथ रेलवे एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहा है, जहां यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मिलेंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का बुनियादी ढांचा सुधार भारतीय रेलवे को वैश्विक मानकों के करीब ले जाता है। इससे न केवल यात्रियों की सुविधा बढ़ती है, बल्कि माल ढुलाई और आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलती है।
अंततः, पूर्व रेलवे की यह पहल केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि यात्रियों के विश्वास को मजबूत करने का भी प्रयास है। सुरक्षित पटरियां, तेज गति और आरामदायक सफर—ये सभी मिलकर भारतीय रेलवे को एक नई पहचान दे रहे हैं। आने वाले समय में इस तरह के और प्रयास यात्रियों के अनुभव को और बेहतर बनाएंगे और रेलवे को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएंगे।


